भोपाल। 
मध्यप्रदेश की राजनीति के शिखर पुरुष रहे कमलनाथ और उनके पुत्र नकुलनाथ का राजनीतिक भविष्य आज गहरे संकट के बादलों से घिरा नजर आ रहा है। सबकी खबर में वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल और रवीन्द्र जैन के साथ एक पॉडकॉस्ट में यह साफ संकेत मिले हैं कि करीब पांच दशकों तक प्रदेश और देश की राजनीति में दबदबा रखने वाले कमलनाथ अब अपनी "आखिरी खंदक की लड़ाई" लड़ रहे हैं। कभी कांग्रेस के सबसे बड़े संकटमोचक और 'फंड मैनेजर' माने जाने वाले कमलनाथ की स्थिति आज पार्टी के भीतर हाशिए पर दिखती है, क्योंकि राहुल गांधी की नई टीम में पुराने दिग्गजों के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है।
छिंदवाड़ा के मजबूत गढ़ को भी नहीं बचा सके थे नाथ
सबसे बड़ी चुनौती छिंदवाड़ा के उस गढ़ को लेकर है, जिसे कभी अभेद्य माना जाता था लेकिन हालिया झटकों ने वहां कमलनाथ की पकड़ को कमजोर साबित कर दिया है। नकुलनाथ को लेकर राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उनमें वह जननेता वाला "करंट" या चुंबकीय शक्ति नहीं है जो उनके पिता में रही है। केवल पिता के नाम और विरासत के सहारे राजनीति में स्थापित होने का दौर अब खत्म हो चुका है, जिसे मुख्यमंत्री मोहन यादव के हालिया बयानों ने भी हवा  है।
बड़ी सौदेबाजी या सुरक्षित विदाई ! 
चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से उभरी कि कमलनाथ के हालिया बयान, जिनमें वे केंद्र सरकार की नीतियों के साथ खड़े नजर आए, उनकी किसी बड़ी राजनीतिक सौदेबाजी या सुरक्षित विदाई की छटपटाहट हो सकते हैं। एक समय था जब दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की जोड़ी मध्य प्रदेश कांग्रेस की धुरी हुआ करती थी, लेकिन अब जीतू पटवारी जैसी नई पीढ़ी के उभार और राहुल गांधी के सीधे हस्तक्षेप ने इन दिग्गजों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। निष्कर्ष यही निकलता है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में अब "नाथ" युग का सूर्यास्त करीब है और उनके उत्तराधिकारी के रूप में नकुलनाथ का भविष्य फिलहाल धुंधला नजर आता है।