भोपाल, सबकी खबर। 
देशभर में चल रहे छात्र आंदोलन और मीडिया की भूमिका को लेकर वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कई अहम टिप्पणियां की हैं। सबकी खबर के साथ एक पॉडकॉस्ट में उन्होंने मौजूदा पत्रकारिता, आंदोलन की दिशा और सरकार की प्रतिक्रिया पर अपनी राय रखी। राजेश बादल ने कहा कि उन्हें पत्रकारिता करते हुए लगभग 50 वर्ष हो चुके हैं और उन्होंने पत्रकारिता का स्वर्णकाल भी देखा है तथा वर्तमान दौर को पतनकाल के रूप में देख रहे हैं। उनके अनुसार पत्रकारिता पर बाजार, राजनीति और आर्थिक दबाव बढ़ने से मीडिया की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। उन्होंने हाल के दिनों में आंदोलन की कवरेज के दौरान कुछ पत्रकारों के साथ हुई कथित मारपीट की घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारों पर हमला उचित नहीं माना जा सकता। हालांकि उनका यह भी कहना था कि मीडिया संस्थानों की संपादकीय नीतियों और विश्वसनीयता में आई गिरावट ने जनता के एक वर्ग में नाराज़गी बढ़ाई है। राजेश बादल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पहले के दौर में संपादकीय स्वतंत्रता अधिक मजबूत थी और कई संपादक सत्ता या संस्थागत दबाव के बावजूद निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रयास करते थे। उन्होंने अपने पेशेवर जीवन के कुछ उदाहरण देते हुए दावा किया कि उन्होंने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय कई बार पद छोड़ना स्वीकार किया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद जरूरी
छात्र आंदोलन पर उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मुद्दे पर देर से प्रतिक्रिया दी। उनके अनुसार यदि किसी आंदोलन को लंबे समय तक अनदेखा किया जाता है तो उसमें असंतोष और उग्रता बढ़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को समय रहते संवाद स्थापित करना चाहिए। बादल ने मौजूदा आंदोलन की तुलना ऐतिहासिक जन आंदोलनों से करते हुए कहा कि यदि युवाओं की समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो इसके व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि यह उनका व्यक्तिगत राजनीतिक आकलन है।
मीडिया अपनी साख हो रहा हैं... 
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में असहमति और आंदोलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा किसी भी समस्या का समाधान संवाद और संवैधानिक तरीकों से ही निकलना चाहिए। बातचीत के अंत में राजेश बादल ने कहा कि मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता होती है। उनके अनुसार यदि मीडिया अपनी साख खो देता है तो उसे दोबारा हासिल करना सबसे कठिन कार्य होता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि पत्रकारिता भविष्य में फिर से निष्पक्षता और जनसरोकारों की ओर लौटेगी।