चौराहे पर खड़ी पत्रकारिता और सुलगता जन-आक्रोश
"जब कुत्ता भी AC में सोने लगे, तो साख खो जाती है" — सड़कों पर पिटते पत्रकारों और उबलते जन-आक्रोश पर पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने कहा...
नई दिल्ली / भोपाल, सबकी खबर।
दिल्ली की सड़कों पर रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों पर हो रहे हमले, 'गोदी मीडिया' का बढ़ता ठप्पा और देश भर में युवाओं व छात्रों का सड़क पर उतरना—इन सबने भारतीय लोकतंत्र और पत्रकारिता के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। आखिर फील्ड में जान जोखिम में डालकर काम कर रहे उन बेकसूर ग्राउंड रिपोर्टरों और कैमरामैनों का क्या कसूर है, जिन्हें स्क्रिप्ट तो एसी कमरों में बैठे संपादक और चैनल मालिक लिखकर देते हैं?
इसी ज्वलंत मुद्दे, पत्रकारों की सुरक्षा और देश में पनप रहे आक्रोश को समझने के लिए 'सबकी खबर' के साथ मध्य प्रदेश में पत्रकारिता के प्रथम पुरुष और 'सप्रे संग्रहालय' के संस्थापक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर से एक विशेष बातचीत की। श्रीधर जी ने बड़े ही मुखर और बेबाक तरीके से अपनी राय रखी।
1. क्यों खो गई टीवी मीडिया की विश्वसनीयता?
बातचीत के दौरान जब एडिटर इन चीफ रवीन्द्र जैन ने सवाल उठाया कि देश में 70% लोगों ने टीवी ऑन करना छोड़ दिया है और पत्रकारिता एक चौराहे पर आकर खड़ी हो गई है, तो विजय दत्त श्रीधर ने इसका सीधा कारण मीडिया का "बाजारू होना" बताया।
इमरजेंसी का एक ऐतिहासिक किस्सा याद दिलाते हुए श्रीधर जी ने कहा:
"एक बड़े संपादक ने प्रखर पत्रकार नैमी मित्तल से पूछा था कि आप सेंसरशिप को कैसे जंप करते थे? मित्तल जी का जवाब था—संपादक जी, जंप तो आप भी कर सकते हैं, लेकिन आपका कुत्ता भी कमबख्त एसी में सोता है! जब पत्रकारिता सुविधाओं की गुलाम हो जाएगी और बाजार के नियंत्रण में चली जाएगी, तो विश्वसनीयता का संकट पैदा होना लाजमी है।" उन्होंने कहा कि प्राइम टाइम पर जो चैनल चल रहे हैं, उसमें पत्रकारिता के नाम पर बकवास हो रही है। इस पतन के लिए फील्ड में पिट रहा रिपोर्टर नहीं, बल्कि चैनल के मालिक और एसी कमरों में बैठे संपादक जिम्मेदार हैं।
2. सड़कों पर क्यों पिट रहे हैं बेकसूर ग्राउंड रिपोर्टर?
दिल्ली में चल रहे प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए श्रीधर जी ने समझाया कि:
मुख्यधारा का मीडिया शुरुआती दिनों में कवरेज के लिए पहुंचा ही नहीं। जब आलोचनाएं बढ़ीं, तब मजबूरी में अपने कर्मचारियों को भेजा। सरकार का मंत्री या मीडिया हाउस का मालिक सड़क पर नहीं खड़ा है। जनता के सामने रिपोर्टर और कैमरामैन खड़े हैं, इसलिए जन-आक्रोश का शिकार वे बेकसूर कर्मचारी बन रहे हैं जिन्हें केवल वेतन मिलता है और जिनकी नीति-निर्धारण में कोई भूमिका नहीं होती।
"यदि आज मैं किसी चैनल का संपादक होता, तो अपने रिपोर्टर को पीछे रखकर खुद सड़क पर उतरता। जो संस्थान अपने कर्मचारियों के दम पर मुनाफा कमाते हैं, उन्हें संकट के समय भी उनके साथ खड़े होना चाहिए।"
3. 'मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया' और सख्त कानूनों की जरूरत
पत्रकारिता की साख बचाने और रिपोर्टरों की सुरक्षा के लिए पद्मश्री श्रीधर ने कुछ कड़े कदम उठाने की वकालत की:
दंतविहीन प्रेस काउंसिल की जगह सशक्त बॉडी: प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की सीमाओं को देखते हुए, एक अर्ध-न्यायिक और दंड देने के अधिकार वाली 'मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया' का गठन होना चाहिए, जो प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, वेब और सोशल मीडिया सभी का नियमन कर सके। एक ही व्यक्ति या घराने के पास मीडिया, खदानें और अन्य व्यापार होने से मीडिया 'कवच' की तरह इस्तेमाल होता है। इस मीडिया-साम्राज्यवाद पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।
4. संवादहीनता और बढ़ता युवा आक्रोश: क्या 1975 जैसे हालात?
देश भर में नीट (NEET) व अन्य मुद्दों को लेकर उठ रहे छात्र-युवा आंदोलन और सरकार के रुख पर बात करते हुए श्रीधर जी ने तीखी टिप्पणी की:
उन्होंने कहा कि सत्ता का यह भ्रम कि "विपक्ष नहीं है तो हम जो चाहें कर सकते हैं", लोकतंत्र के लिए घातक है। ऐसा ही अहंकार 1975 की इमरजेंसी में इंदिरा गांधी को भी हुआ था, जिसे जनता ने चुनाव में उखाड़ फेंका था। लोकतंत्र में आंदोलन रोकना या डंडे के बल पर दबाना संभव नहीं है। सरकार को बड़प्पन दिखाते हुए बातचीत के दरवाजे खोलने चाहिए।
प्रदर्शनकारियों को गांधीवादी तरीके (सत्य और अहिंसा) से अपनी लड़ाई लड़नी चाहिए। हिंसा कानून को हाथ में लेने जैसा है, जिससे आंदोलन की गरिमा गिरती है। साथ ही, युवाओं को अपने मंच पर राजनीतिक दलों और उनके मुखौटों को चढ़ने नहीं देना चाहिए।

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