मंत्री प्रतिमा बागरी की क्लीन चिट पर घमासान, कांग्रेस जाएगी हाईकोर्ट; लगाया सरकार के दबाव का आरोप
भोपाल।
मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (एससी) प्रमाण पत्र को राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति से क्लीन चिट मिलने के बाद प्रदेश की सियासत गरमा गई है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष और शिकायतकर्ता प्रदीप अहिरवार ने समिति के फैसले को सरकार के दबाव में लिया गया निर्णय बताते हुए इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि जरूरत पड़ने पर मामला सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया जाएगा। भोपाल में आयोजित पत्रकार वार्ता में अहिरवार ने आरोप लगाया कि जांच समिति ने उनकी शिकायत के साथ प्रस्तुत महत्वपूर्ण दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने दावा किया कि जांच के दौरान 1950 के संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1961 और 1971 की जनगणना के रिकॉर्ड, ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) की रिपोर्ट और अन्य सरकारी दस्तावेजों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया।
मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद प्रभावित हुई जांच
प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि मंत्री प्रतिमा बागरी छह अन्य मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिली थीं, जिसके बाद जांच की निष्पक्षता प्रभावित हुई। उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत पूरी तरह दस्तावेजों और तथ्यों पर आधारित थी, लेकिन समिति ने सरकार के दबाव में फैसला दिया। उन्होंने कहा, मैं इस लड़ाई को अंतिम सांस तक लड़ूंगा। अनुसूचित जाति वर्ग के अधिकारों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं होने दूंगा।
1950 के संविधान आदेश का दिया हवाला
अहिरवार ने कहा कि अनुसूचित जातियों का निर्धारण संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश-1950 के अनुसार होता है। उनका दावा है कि जिस क्षेत्र में प्रतिमा बागरी का परिवार निवास करता था, वहां उस समय बागरी समुदाय अनुसूचित जाति की सूची में शामिल नहीं था। उनका आरोप है कि समिति ने इस पहलू पर स्पष्ट विचार नहीं किया।
जनगणना रिकॉर्ड पर भी उठाए सवाल
कांग्रेस नेता का कहना है कि वर्ष 1961 और 1971 की जनगणना में प्रतिमा बागरी के परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था। उनका दावा है कि इन सरकारी अभिलेखों को भी जांच का आधार बनाया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
टीआरआई रिपोर्ट का भी किया जिक्र
प्रदीप अहिरवार ने 1998-99 की ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) की मानवशास्त्रीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसमें विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी समुदाय को राजपूत/ठाकुर की उपजाति बताया गया था। उनका आरोप है कि समिति ने इस रिपोर्ट को भी महत्व नहीं दिया।
1976 की सूची और 2007 के राजपत्र का भी उठाया मुद्दा
अहिरवार ने कहा कि वर्ष 1976 में प्रदेश के लिए अनुसूचित जातियों की संयुक्त सूची लागू हुई थी, जिसके बाद बागरी/बागड़ी को अनुसूचित जाति सूची में शामिल किया गया। उनका आरोप है कि इसके बाद ऐसे क्षेत्रों में भी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र बनने लगे, जहां पहले यह व्यवस्था लागू नहीं थी। उन्होंने वर्ष 2007 के एक राजपत्र का भी हवाला देते हुए कहा कि उसमें अनुसूचित जाति लाभ को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया गया था, लेकिन समिति ने अपने निर्णय में उसका उल्लेख नहीं किया।
हाईकोर्ट में देंगे चुनौती
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति का फैसला निष्पक्ष नहीं है और इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी। जरूरत पड़ने पर वे सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि छानबीन समिति ने जांच करने के बजाय मंत्री को बचाने का काम किया है।
समिति ने क्या फैसला दिया
राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति ने मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को वैध मानते हुए शिकायत को खारिज कर दिया है। समिति ने अपने निर्णय में उनके जाति प्रमाण पत्र को सही माना है।

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