भोपाल, सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश सरकार की सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा 1 से 8 तक के करीब 52 लाख विद्यार्थियों को सिली-सिलाई यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने की योजना विवादों में घिर गई है। यूनिफॉर्म खरीद के लिए जारी किए गए टेंडर की शर्तों को लेकर मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुंच गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि टेंडर की शर्तें इस प्रकार बनाई गई हैं कि प्रदेश के अधिकांश स्थानीय उद्योग और एमएसएमई इसमें भाग ही नहीं ले सकते।
सरकार ने बदली व्यवस्था
इस वर्ष जून में राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि अब पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को यूनिफॉर्म के लिए नकद राशि देने के बजाय सिली-सिलाई यूनिफॉर्म उपलब्ध कराई जाएगी। इससे पहले सरकार प्रति छात्र दो यूनिफॉर्म के लिए निर्धारित राशि सीधे हितग्राहियों के खातों में भेजती थी। उससे पहले स्व-सहायता समूहों के माध्यम से यूनिफॉर्म तैयार कर विद्यार्थियों को वितरित की जाती थी। कैबिनेट के इस फैसले के बाद यूनिफॉर्म खरीद और वितरण की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम को सौंपी गई।
मंत्री ने स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता देने की कही थी बात
कैबिनेट के निर्णय के बाद एमएसएमई मंत्री चैतन्य कश्यप ने कहा था कि यूनिफॉर्म की खरीद में मध्य प्रदेश के उद्योगों और स्थानीय गारमेंट निर्माताओं को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि प्रदेश के उद्योगों को इसका लाभ मिल सके। हालांकि, टेंडर जारी होने के बाद व्यापारिक संगठनों ने आरोप लगाया कि टेंडर की पात्रता शर्तें मंत्री के बयान से मेल नहीं खातीं।
टेंडर की शर्तों पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं के अनुसार टेंडर में भाग लेने वाली कंपनियों के लिए लगभग 700 करोड़ रुपये वार्षिक टर्नओवर और प्रति माह 50 लाख यूनिफॉर्म तैयार करने की क्षमता जैसी शर्तें रखी गई हैं। व्यापारियों का कहना है कि इन शर्तों के कारण मध्य प्रदेश के अधिकांश छोटे और मध्यम उद्योग स्वतः बाहर हो जाते हैं और केवल देश की कुछ बड़ी कंपनियां ही पात्र रह जाती हैं। इसी आधार पर कई व्यापारियों और उद्योग प्रतिनिधियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है, जबकि यूनिफॉर्म खरीद की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है। ऐसे में विद्यार्थियों को समय पर यूनिफॉर्म कैसे उपलब्ध कराई जाएगी। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी उठा कि यदि किसी कंपनी की उत्पादन क्षमता प्रति माह 50 लाख यूनिफॉर्म है और पूरे प्रदेश के लिए करोड़ों यूनिफॉर्म तैयार करनी हैं, तो वितरण में कई महीने लग सकते हैं। अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। मामले की अगली सुनवाई सोमवार को निर्धारित की गई है।
बुनकर संघ भी करेगा हस्तक्षेप
जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश बुनकर संघ भी इस मामले में अदालत का रुख करने की तैयारी कर रहा है। संघ का कहना है कि सरकारी नियमों के तहत उन्हें भी कपड़ा अथवा यूनिफॉर्म आपूर्ति का अवसर मिल सकता था, लेकिन टेंडर की शर्तों के कारण उन्हें अवसर नहीं दिया गया।
कई सवालों के जवाब बाकी
पूरे मामले में अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
जब नया शैक्षणिक सत्र जुलाई से शुरू होना था, तो सिली-सिलाई यूनिफॉर्म देने का निर्णय जून में ही क्यों लिया गया?
यदि स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी, तो टेंडर की शर्तें इतनी कड़ी क्यों रखी गईं?
क्या टेंडर प्रक्रिया के कारण विद्यार्थियों को समय पर यूनिफॉर्म मिल पाएगी?
यदि वितरण में देरी होती है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
सरकार के जवाब का इंतजार
अब इस पूरे मामले में सभी की नजर हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर है। अदालत में राज्य सरकार को टेंडर प्रक्रिया, पात्रता शर्तों और यूनिफॉर्म वितरण की समय-सीमा को लेकर अपना पक्ष रखना होगा। सरकार की ओर से क्या स्पष्टीकरण दिया जाता है और क्या टेंडर की शर्तों में कोई बदलाव किया जाता है, इस पर प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों, अभिभावकों और स्थानीय उद्योगों की नजर बनी हुई है।