भोपाल। 
मध्य प्रदेश के उन 52 लाख गरीब बच्चों के हक पर दलालों ने डाका डाल दिया है। जिन्हें 1 जुलाई को स्कूल खुलते ही नई गणवेश (यूनिफॉर्म) मिल जानी चाहिए थी। लेकिन आज 6 जुलाई हो चुकी है, सत्र शुरू है और बच्चों के तन पर नई ड्रेस तो दूर, सरकार अभी तक टेंडर की फाइलों में ही सिर खपा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी, जरा अपनी नाक के नीचे देखिए कि इस टेंडर प्रक्रिया में कितना बड़ा खेल चल रहा है! क्या यह बच्चों के साथ कोई सोची-समझी साजिश है? क्या इस साल इन मासूमों को वाकई गणवेश मिल पाएगी? और अगर मिलेगी, तो कब? दिसंबर में या सत्र खत्म होने पर?
लोकायुक्त और EOW तक पहुँचा 'ड्रेस घोटाला'
इस ₹350 करोड़ से ज्यादा के गणवेश घोटाले की गूंज अब जांच एजेंसियों के दफ्तरों तक पहुँच चुकी है। 'सबकी खबर' के पास इस वक्त लोकायुक्त और EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) में की गई शिकायत की कॉपी मौजूद है। मामला अब पूरी तरह कानूनी शिकंजे में फंसने जा रहा है।
अतीत का खेल: स्वयं सहायता समूह से लेकर नगद भुगतान तक
पहले यह गणवेश हमारी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं सिलती थीं, जिससे गरीब परिवारों का चूल्हा जलता था। लेकिन अजीविका मिशन के तत्कालीन कर्ताधर्ताओं (बेलवाल और इकबाल सिंह जैसे चेहरों) के समय हुए घपलों के बाद सरकार को मजबूरी में ड्रेस का पैसा सीधे बैंक खातों में नगद (डीबीटी) भेजना पड़ा। 2024 तक यह व्यवस्था ठीक चली, लेकिन जून महीने में अचानक सरकार को 'मोह' जागा कि नहीं, पैसा नहीं देंगे... हम तो कपड़ा ही बांटेंगे! और यहीं से शुरू हुआ दलालों का असली खेल।

  • टेंडर की विसंगतियां: लोकल व्यापारी बाहर, 3 बाहरी कंपनियों के लिए 'रेड कार्पेट'?
  • सबकी खबर के पास 5-6 पन्नों का वह शिकायती पत्र है, जो टेंडर की पोल खोलता है:
  • टेंडर में जानबूझकर ₹700 करोड़ का टर्नओवर जैसी शर्तें जोड़ी गईं।

चैतन्य कश्यप का वो वादा
कैबिनेट बैठक के बाद एमएसएमई मंत्री चैतन्य कश्यप ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि इस फैसले से मध्य प्रदेश के स्थानीय और छोटे व्यापारियों (MSME) को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन टेंडर की शर्तें ऐसी बनाई गई हैं कि मध्य प्रदेश का एक भी व्यापारी इसमें टिक ही नहीं सकता। पूरे देश में सिर्फ 3 चुनिंदा बड़ी कंपनियां ही इसके योग्य बचती हैं। यानी एमपी के व्यापारियों का हक मारकर बाहरी दिग्गजों को फायदा पहुंचाने की पूरी तैयारी है।
तारीख पर तारीख और 'कम बालों वाले सज्जन' का खेल
12 जून को टेंडर जारी हुआ था। पहले जो टेंडर 12 जुलाई को खुलना था, उसे अब बढ़ाकर 23 जुलाई कर दिया गया है। यह तारीख आगे क्यों बढ़ाई गई? क्योंकि पर्दे के पीछे सेटिंग का खेल अभी पूरा नहीं हुआ है! सबकी खबर ने पहले भी खुलासा किया था कि एक कम बालों वाले, लंबे कद के सज्जन 'मंत्री जी' के बंगले पर टेंडर का ड्राफ्ट खुद तैयार करवा रहे थे और प्री-बिड मीटिंग में भी शान से बैठे थे। खबर चलने के बाद मंत्री जी ने बंगले पर सख्ती तो कर दी, नाम-पते लिखे जाने लगे, लेकिन क्या इससे दलाल भाग जाएंगे? पिछली बार जो 'मफतलाल' के नाम पर ब्रीफकेस लेकर घूम रहा था, वो इस बार किसी और कंपनी का मुखौटा लगाकर नीचे से ऊपर तक सेटिंग कर चुका है। कमाल की बात देखिए... इस पूरी सप्लाई का जिम्मा पाठ्य पुस्तक निगम को दिया गया है, और इस टेंडर से ठीक कुछ घंटे पहले वहां के एमडी (MD) को बदल दिया गया! यह क्रोनोलॉजी क्या इशारा करती है, आप खुद समझदार हैं।
'सबकी खबर' का सीधा सवाल
आज मध्य प्रदेश की जनता और 'सबकी खबर' का सरकार से सीधा सवाल है:
जब सत्र 1 जुलाई से शुरू था, तो टेंडर की प्रक्रिया इतनी लेट क्यों की गई?
क्या वाकई आपकी नीयत गरीब बच्चों को कपड़े देने की है, या सिर्फ 'गोल-गोल जलेबी' बनाकर टेंडर को कोर्ट कचहरी में उलझाना है? यह मामला जानबूझकर ऐसी उलझन में डाला गया है कि यह कोर्ट जाएगा, जिससे प्रक्रिया और लटकेगी। नुकसान सिर्फ उन गरीब बच्चों का होगा जिनके माता-पिता के पास खुद के पैसे नहीं हैं।
मुख्यमंत्री जी, दलालों के इस कॉकस को तोड़िए और बच्चों को उनका हक दिलाइए।