भोपाल,सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है। प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली सबसे बड़ी एजेंसी EOW (आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो) अब कभी भी जनजातीय कार्य विभाग के आयुक्त (कमिशनर) कार्यालय पर छापा मार सकती है। यह पूरा मामला ₹130 करोड़ के 'स्मार्ट क्लास' टेंडर घोटाले से जुड़ा है, जिसमें नियमों को ताक पर रखकर चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने का गंभीर आरोप लगा है।
4 महीने में 8 समन, फिर भी मौन हैं कमिश्नर!
EOW इस मामले की जांच के लिए पिछले 4 महीनों में एक के बाद एक कुल 8 पत्र (समन) जनजातीय कार्य विभाग के आयुक्त तरुण राठी (IAS) को लिख चुका है। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि कमिश्नर कार्यालय की तरफ से जांच एजेंसी को कोई भी फाइल या जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है।
EOW द्वारा भेजे गए पत्रों की तारीखें:

  • पहला पत्र: 25 मार्च 2026
  • दूसरा पत्र: 7 अप्रैल 2026
  • तीसरा पत्र: 13 अप्रैल 2026
  • चौथा पत्र: 27 अप्रैल 2026
  • पांचवां पत्र: 7 मई 2026
  • छठवां व सातवां पत्र: 15 मई 2026
  • आठवां व अंतिम पत्र: 24 जून 2026

आठवें पत्र में पिछले 7 पत्रों का हवाला देते हुए कड़ा रुख अपनाया गया है, लेकिन इसके बावजूद विभाग के कान पर जूं नहीं रेंग रही है। सूत्रों के मुताबिक, अंदरखाने फाइलों को दबाने और सामान की सप्लाई जल्दबाजी में कराकर भुगतान करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।
क्या है पूरा मामला और टेंडर घोटाला?

  • जनजातीय कार्य विभाग द्वारा आदिवासी बच्चों के स्कूलों को स्मार्ट क्लास में बदलने के लिए 10 फरवरी 2026 को ₹130 करोड़ का टेंडर (क्रमांक: संदीपनी 2025-26/2878) जारी किया गया था।
  • आरोप है कि मध्य प्रदेश भंडार गृह नियम तथा सेवा खरीद नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया गया। नियमों में असंवैधानिक बदलाव करके किसी खास फर्म को टेंडर दिलाने का खेल रचा गया, जिसके बाद EOW ने शिकायत क्रमांक 183/26 दर्ज कर जांच शुरू की।
  • EOW ने मांगी हैं ये 8 अहम जानकारियां:
  • जांचकर्ता व निरीक्षक योगेंद्र दुबे द्वारा भेजे गए नोटिस में विभाग से इन बिंदुओं पर जवाब मांगा गया है:
  • जारी किए गए मूल टेंडर की छायाप्रति।
  • प्री-बिड मीटिंग में शामिल कंपनियों और उनके द्वारा दिए गए सुझावों का ब्योरा।
  • नियमों के विरुद्ध जा कर EMD (अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट) में दी गई छूट का आधार।
  • टेंडर की कंडिका 11 के तहत मात्रा का विभाजन 5 अधिकतम बोलीदाताओं में बांटने का प्रामाणिक आधार।
  • प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए केवल OEM और अधिकृत पार्टनर को ही अनुमति देने का कारण।
  • मध्य प्रदेश की MSME इकाइयों के बजाय बाहरी कंपनियों को टेंडर स्प्लिटिंग का लाभ देने का आधार।
  • टेंडर चयन के लिए बनाई गई वित्त एवं तकनीकी समिति के सदस्यों के नाम।
  • IAS अधिकारी नेहा मारविया द्वारा इस मामले में तैयार की गई अंदरूनी जांच रिपोर्ट की कॉपी।

अब आगे क्या?
प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि EOW जैसी बड़ी एजेंसी द्वारा लगातार 8 पत्र लिखना बिना मुख्यमंत्री की सहमति के संभव नहीं है। साफ है कि सरकार भी इस मामले में 'दूध का दूध और पानी का पानी' चाहती है। अब चूंकि आयुक्त तरुण राठी और विभाग कोई भी जानकारी देने से बच रहे हैं, इसलिए EOW के पास दफ्तर पर सीधा छापा मारकर फाइलें जब्त करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। आने वाले दिन मध्य प्रदेश की नौकरशाही के लिए बेहद उथल-पुथल भरे हो सकते हैं।