कहते हैं कि सरकारी नौकरी में रिटायरमेंट उस लक्ष्मण रेखा की तरह है, जिसे पार करने के बाद बड़े-बड़े सूरमाओं की 'पॉवर' भी सिर्फ पेंशन की फाइलों तक सिमट कर रह जाती है। लेकिन मध्य प्रदेश के एक बेहद ही 'असरदार' विभाग में इन दिनों सरकारी नियमों को अंगूठा दिखाते हुए रिश्तों की एक ऐसी अनूठी जुगलबंदी चल रही है, जिसने प्रशासनिक गलियारों के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इस अनोखे खेल को अगर एक लाइन में समझना हो, तो बस इतना जान लीजिए— "एसीएस मेहरबान, तो जीजा-साले पहलवान!"
आमतौर पर किसी भी अधिकारी को रिटायरमेंट के बाद सेवा वृद्धि (Extension) चाहिए हो, तो फाइल वल्लभ भवन के चक्कर काटती है, विभागीय मंत्री से लेकर सीधे मुख्यमंत्री दफ्तर (CMO) तक की दौड़ लगानी पड़ती है। लेकिन इस विभाग के 'जीजाजी' बड़े अंतर्यामी निकले। कुछ महीने पहले जब उनके रिटायरमेंट की घड़ी आई, तो उन्होंने मुख्यमंत्री की तरफ देखने के बजाय सीधे अपने विभाग के आला हाकिम यानी एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (ACS) साहब के दरबार में अर्जी लगा दी। ट्विस्ट देखिए कि विभाग के सर्वेसर्वा खुद मुख्यमंत्री जी हैं, लेकिन जीजाजी की फाइल मुख्यमंत्री तक पहुंची ही नहीं! पता चला कि इस विभाग की शाखा का अपना एक 'शाही एक्ट' (नियम) है, जिसमें सारी शक्तियां सीधे ACS साहब की जेब में सुरक्षित हैं। बस फिर क्या था? अंदरखाने 'मामला सेट' हुआ और जीजाजी को बिना किसी शोर-शराबे के पूरे एक साल का 'लाइफ एक्सटेंशन' गिफ्ट में मिल गया।
एक साल का बोनस समय मिलते ही जीजाजी ने क्रीज पर उतरकर ऐसी ताबड़तोड़ बैटिंग शुरू की कि देखने वाले दांतों तले उंगली दबा लें। पूरे मध्य प्रदेश में इस शाखा के दफ्तर फैले हुए हैं और सूत्रों की मानें तो जीजाजी के 'खुलकर खेलने' की वजह से विभाग के भीतर 'प्रदूषण' का स्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंच चुका है। अब खेल जब इतना बड़ा हो, तो हवा में थोड़ी बहुत धूल तो उड़ेगी ही! कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसी परम प्रतापी विभाग की एक और शाखा है, जहां इन दिनों 'साले साहब' की तैनाती है। संयोग देखिए कि अभी बीते महीने यानी मई में साले साहब के भी रिटायरमेंट का सायरन बज गया। अब जब जीजाजी सामने बैठकर एक साल का बोनस काट रहे हों, तो साले साहब पीछे कैसे रहते? साले साहब ने तुरंत जीजाजी के पद-चिह्नों पर चलना शुरू किया। उन्होंने भी न तो सीएम दफ्तर का रुख किया और न ही किसी नेता की मनुहार की। सीधे पहुंचे उसी 'मेहरबान' एसीएस साहब की चौखट पर। बातचीत का दौर चला, फाइल पर जमी धूल साफ हुई, मामला एक बार फिर 'फिट' बैठ गया और साले साहब की विदाई पार्टी भी टल गई। उन्हें भी एक्सटेंशन का परवाना थमा दिया गया। नतीजा अब आलम यह है कि विभाग की दो अलग-अलग खिड़कियों पर जीजा और साले दोनों अंगद की तरह पैर जमाकर बैठे हैं। प्रशासनिक गलियारों में खुसर-पुसर तेज है कि जब तक ऊपर बैठे साहब की कृपा दृष्टि बनी हुई है, तब तक दोनों तरफ से 'मैच फिक्सिंग' वाली शानदार बैटिंग जारी रहेगी। जनता भले ही दफ्तरों के चक्कर काटकर थक जाए, लेकिन जब 'साहब' खुद मेहरबान हों, तो फिर नियम-कायदों के सारे 'प्रदूषण' को दूर करके जीजा-साले की यह पहलवानी यूँ ही चलती रहेगी। समझ गए न आप? नमस्कार।