भोपाल। 
वैसे तो मध्य प्रदेश में अभी चुनावों को काफी समय है लेकिन भाजपा बड़े पहले ही चुनावी मोड में आने लगी है। बीजेपी ने अभी से इसको लेकर रणनीति बनानी शुरु कर दी है। 2027 में नगरीय निकाय चुनाव हैं लेकिन इनके  साथ ही भाजपा ने 2028 विधानसभा चुनावों को लेकर भी तैयारी तेज कर दी है। पार्टी का खास फोकस विधानसभा चुनाव पर है और इस दिशा में कार्य करते हुए पार्टी ने टिकट वितरण की गाइडलाइन भी तय बना ली गई है।
निगम-मंडलों, बोर्डों में नियुक्त अध्यक्षों और उपाध्यक्षों को विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं
सूत्रों के मुताबिक बीजेपी आगामी चुनावों को लेकर काफी गंभीर नजर आ रही है और ऱणनीति पर काम कर रही है। जानकारी के मुताबिक  निगम-मंडलों और बोर्डों में नियुक्त किए गए अध्यक्षों और उपाध्यक्षों को आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलेगा। पार्टी ने पद पर नियुक्ति देने  से पहले ही इन नेताओं से एक तरह का कमिटमेंट लिया है,या यूं कह सकते हैं कि इनको एक बात क्लीयर कर दी है। वो ये कि  ये संगठन के लिए काम करेंगे और विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी नहीं करेंगे। सभी पदाधिकारी विधानसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के लिए पूरा दम लगाएंगे।
2028 विधानसभा चुनाव को लिए अभी से सियासी बिसात बिछाना शुरू
2028 विधानसभा चुनाव को लेकर पहले से बीजेपी ने सियासी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। पार्टी सत्ता और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ चुनावी तैयारियों को धार देने की रणनीति में जुटी है। इसी रणनीति के तहत निगमों, मंडलों, बोर्डों में नियुक्तियां की हैं, इन नियुक्तियों के साथ भाजपा ने एक सख्त राजनीतिक संदेश भी दे दिया है। पद पाने वाले पदाधिकारी चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब पार्टी उन्हें संगठन विस्तार और कमजोर क्षेत्रों को मजबूत करने के मिशन में लगाना चाहती है। 63 से अधिक नेताओं को विभिन्न निगम-मंडलों, प्राधिकरणों और आयोगों में जिम्मेदारी दी है। इनमें कई ऐसे चेहरे शामिल हैं जो पिछले विधानसभा चुनाव में हार गए थे, लेकिन अब राजनीतिक गलियारों में इन नियुक्तियों को एक तरह से राजनीतिक पुनर्वास के रूप में भी देखा जा रहा है।
निगम-मंडलों को अध्यक्षों ,उपाध्यक्षों की होगी परीक्षा
दरअसल भाजपा इस बार चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव कर रही है। इसके तहत निगम-मंडल अध्यक्षों और उपाध्यक्षों को उनके गृह क्षेत्र में जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। उन्हें उन सीटों पर भेजा जाएगा, जहां पिछले चुनाव में भाजपा को हार देखनी पड़ी थी। भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि बाहरी नेता को जिम्मेदारी देने से स्थानीय गुटबाजी, आपसी खींचतान की संभावना कम होगी। पार्टी चाहती है कि हर कमजोर विधानसभा क्षेत्र में अब लगातार राजनीतिक गतिविधियां चलती रहनी चाहिए  ताकि चुनावी मौसम में संगठन पूरी तरह मजबूत दिखाई दे।