कुर्सी के लिए 'कौशल': एमपी के मंत्री गौतम टेटवाल पर जाति बदलने का संगीन आरोप, सगी बहन OBC और भाई बन गए SC!
भोपाल, सबकी खबर।
मध्य प्रदेश की सियासत में 'अजब-गजब' कारनामों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताज़ा और बेहद चौंकाने वाला मामला सूबे के कौशल विकास मंत्री गौतम टेटवाल से जुड़ा है, जिन पर अपनी विधायकी और मंत्री पद बचाने के लिए फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाने के गंभीर आरोप लगे हैं। सबकी खबर की पड़ताल और इस मामले को कोर्ट तक घसीटने वाले वयोवृद्ध अनुसूचित जाति (SC) के कार्यकर्ता कोमल प्रसाद शाक्य के दावों ने प्रदेश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है। आरोप है कि मंत्री ने चुनाव लड़ने और अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने के लिए दस्तावेजों में हेरफेर कर खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से अनुसूचित जाति (SC) का बना लिया। अब यह हाई प्रोफाइल मामला इंदौर हाई कोर्ट पहुंच चुका है, जहां 29 जून को इस पर बेहद अहम सुनवाई होने वाली है।
प्रमाणित दस्तावेजों के साथ सबकी खबर ने किया खुलासा
पूरे मामले का खुलासा करते हुए सबकी खबर ने कुछ बेहद पुख्ता और प्रमाणित दस्तावेज (Certified Copies) जनता के सामने रखे हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक, गौतम टेटवाल की सगी बहन श्रीमती निर्मला पवार जो कि शासकीय प्राथमिक विद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं, उनके सेवा अभिलेखों में उनकी जाति साफ तौर पर 'जिनगर हिंदू' दर्ज है, जो कि मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत आती है। इतना ही नहीं, खुद गौतम टेटवाल के स्कूल के रिकॉर्ड (साल 1969 में कक्षा पहली में प्रवेश के समय) के अनुसार भी उनकी जाति 'जिनगर' ही दर्ज है। आरोप है कि मंत्री जी ने साल 1950 से लेकर अब तक के अपने तमाम सरकारी और शैक्षणिक दस्तावेजों में कूटरचना (काट-छांट) करवाकर 'जिनगर' शब्द को हटवाया और उसकी जगह 'मोची' जाति लिखवा दिया, ताकि वे अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ सकें।
कोर्ट ने भी माना था ओबीसी हैं टेटवाल
इस फर्जीवाड़े की पुष्टि खुद राजगढ़ की विशेष अनुसूचित जाति/जनजाति कोर्ट के एक फैसले से भी होती है। कुछ समय पहले सारंगपुर में गौतम टेटवाल और उनके बेटे पृथ्वीराज टेटवाल का स्थानीय नेताओं के साथ कोई विवाद हुआ था, जिसमें मंत्री पक्ष ने विपक्षी दल पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराने की कोशिश की थी। तब विशेष न्यायाधीश ने अपने फैसले के पैराग्राफ क्रमांक 16 में स्पष्ट तौर पर लिखा था कि फरियादी पृथ्वीराज टेटवाल के पिता, बहन, बुआ, दादा और तमाम करीबियों के दस्तावेजों को देखने से साफ पता चलता है कि यह परिवार 'जिनगर' समाज से आता है जो कि ओबीसी वर्ग में है, इसलिए इन पर एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला नहीं बनता।
2011 से फर्जीवाड़े के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं कोमल प्रसाद शाक्य
इस पूरे फर्जीवाड़े के खिलाफ साल 2011 से अकेले दम पर जंग लड़ रहे गुना के रहने वाले कोमल प्रसाद शाक्य अब हाई कोर्ट पहुंच चुके हैं। वृद्ध होने के बावजूद पिछले 15 सालों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे शाक्य का कहना है कि वे किसी व्यक्तिगत दुश्मनी में नहीं, बल्कि अपने समाज के हक के लिए लड़ रहे हैं क्योंकि अपात्र लोग फर्जी सर्टिफिकेट के सहारे असली हकदारों का हक मार रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि साल 2015 में मध्य प्रदेश की छानबीन समिति ने मंत्री के प्रभाव में आकर खेल किया। छानबीन समिति की बैठक 25 जुलाई 2015 को हुई, लेकिन मंत्री जी को 'मोची' जाति का क्लीन चिट देने वाला फैसला 4 महीने पहले ही यानी 14 मार्च 2015 को ही जारी कर दिया गया।
अनहोनी या दुर्घटना होती है तो मंत्री होंगे जिम्मेदार
शिकायतकर्ता कोमल प्रसाद शाक्य ने मंत्री और उनके करीबियों पर बेहद संगीन आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें रास्ते से हटाने और डराने-धमकाने की कई कोशिशें की गईं। एक बार इंदौर में कोर्ट परिसर के पास वकील को देने जा रहे उनके करीब 1 लाख रुपये भी छीन लिए गए, जिसकी शिकायत उन्होंने पुलिस और एसपी से की थी। शाक्य ने खुलकर कहा है कि अगर उनके साथ कोई भी अनहोनी या दुर्घटना होती है, तो उसके लिए पूरी तरह से मंत्री गौतम टेटवाल और उनका बेटा जिम्मेदार होगा। इससे पहले शाक्य गुना के पूर्व विधायक राजेंद्र सलूजा के खिलाफ भी ऐसी ही लड़ाई जीत चुके हैं, जिनका प्रमाण पत्र निरस्त हो चुका है और अब उन पर धोखाधड़ी का आपराधिक मामला चल रहा है।
तो जा सकती हैं मंत्री की कुर्सी...
वर्तमान में मध्य प्रदेश के कैबिनेट मंत्री गौतम टेटवाल पर इस खुलासे के बाद कुर्सी गंवाने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। इंदौर हाई कोर्ट में याचिका क्रमांक WP 21875/2024 के तहत इस मामले को चुनौती दी गई है। पत्रकार रविंद्र जैन के अनुसार, जो दस्तावेज सामने आए हैं उन्हें देखकर यह साफ है कि मंत्री जी इस मामले में 'दूध के धुले' तो बिल्कुल नहीं हैं। अब 29 जून को हाई कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर पूरे मध्य प्रदेश की नजरें टिकी हैं कि क्या कौशल विकास मंत्री का यह 'जाति बदलने का कौशल' उनकी कुर्सी ले डूबेगा या सियासत के रसूख के आगे न्याय की यह लड़ाई अधूरी रह जाएगी।

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