10 हजार लावारिसों का किया अंतिम संस्कार, अब खुद की 'जगह' के लिए भटक रहे 80 साल के राधेश्याम; सिस्टम बोला- 'एक इंच जमीन नहीं दूंगा'
भोपाल, सबकी खबर।
राजधानी भोपाल में एक ऐसा शख्स रहता है जिसने पिछले 21 सालों में वो काम किया है जिसे सुनकर रूह कांप जाए। अधिमान्य पत्रकार और समाजसेवी राधेश्याम अग्रवाल। इनके नाम 10,000 से ज्यादा लावारिस और गरीब लोगों का अंतिम संस्कार करने का रिकॉर्ड दर्ज है। लेकिन आज 80 साल की उम्र में यह 'पुण्य आत्मा' सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है। दर्द सिर्फ इतना है कि जिस 5000 स्क्वायर फीट की जगह से वे पिछले दो दशकों से सेवा कार्य चला रहे हैं, सरकार उसे आवंटित नहीं कर रही।
"चाय पी लो, पर एक इंच जमीन नहीं मिलेगी"
सबकी खबर के साथ हुए एक पॉडकॉस्ट में राधेश्याम जी का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने बताया कि हाल ही में जब वे मुख्य सचिव के निर्देश पर रेवेन्यू विभाग के प्रमुख सचिव विवेक पोरवाल से मिलने पहुंचे, तो उन्हें जो जवाब मिला उसने उनके सेवा भाव को चोट पहुंचाई। अग्रवाल साहब के मुताबिक, अधिकारी ने कमरे में घुसते ही दो टूक कह दिया— "पानी पीना है पी लो, चाय पीनी है पी लो, पर भूल जाओ कि मैं आपको 1 इंच जमीन भी दूंगा।"
21 साल की सेवा और 10 हजार 'आखरी सफर'
राधेश्याम अग्रवाल की संस्था 'जन संवेदना कल्याण समिति' भोपाल के जेल पहाड़ी इलाके से संचालित होती है। 9000 लावारिस और 1000 से अधिक गरीब लोगों का सम्मानजनक दाह संस्कार। निशुल्क सेवा: मुफ्त एम्बुलेंस, मुक्ति वाहन और गरीबों को भोजन। संस्था का सालाना बजट करीब 25 लाख रुपये है, जो जन-भागीदारी से आता है।
"पैसे देने को तैयार हैं, बस आने वाली पीढ़ी के लिए एक छत चाहिए"
राधेश्याम जी कोई खैरात नहीं मांग रहे। उनका कहना है कि सरकार जमीन की जो भी वाजिब कीमत (बाजार दर का 25% या उससे अधिक) तय करे, उनकी संस्था उसे चुकाने को तैयार है। उनका सपना सिर्फ इतना है कि उनके जाने के बाद भी यह सेवा कार्य बंद न हो और संस्था के पास एक स्थाई पता हो।
पिता थे फ्रीडम फाइटर, विरासत में मिला सेवा का जज्बा
भावुक होते हुए अग्रवाल जी ने बताया कि उनके पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने बचपन में ही कहा था कि देश भ्रष्टाचार में नंबर वन होगा। आज 80 साल की उम्र में जब वे सिस्टम की फाइलों में खुद को उलझा हुआ पाते हैं, तो पिता की वो बातें याद आती हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अनुराग जैन से अपील की है कि उनके जीते-जी इस सेवा कार्य को एक छत दे दी जाए।
जो काम सरकार को करना चाहिए—यानी लावारिसों का अंतिम संस्कार और गरीबों को इलाज व भोजन—वह काम एक बुजुर्ग व्यक्ति 21 साल से निस्वार्थ भाव से कर रहा है। ऐसे में 'नियमों' का हवाला देकर सेवा के रास्ते में दीवार खड़ी करना न केवल उस व्यक्ति का अपमान है, बल्कि मानवता को शर्मसार करने जैसा है। क्या सरकार एक ऐसी संस्था को 5000 फीट जमीन नहीं दे सकती जो समाज का बोझ अपने कंधों पर उठाए हुए है?

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