भोपाल। 
सियासत की पिच पर 'आधी आबादी' को हक देने के दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन जब बात अपनी सीट की आती है, तो पुरुष प्रधान राजनीति का असली चेहरा सामने आ ही जाता है। राजधानी भोपाल में भाजपा की 'जन आक्रोश महिला पदयात्रा' में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जिसने कार्यक्रम के 'महिला शक्ति' वाले एजेंडे पर ही सवालिया निशान लगा दिए।
मंत्री जी आए... और महिला नेताओं का 'आरक्षण' खत्म!
मंच सज चुका था। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के साथ भाजपा की महिला मंत्री, सांसद और विधायक अपनी सीटों पर गरिमा के साथ मौजूद थीं। माहौल महिला सशक्तिकरण का था, लेकिन जैसे ही भोपाल के प्रभारी मंत्री चैतन्य काश्यप की एंट्री हुई, मंच का 'लेडीज कोटा' अचानक कम हो गया। मंत्री जी की कुर्सी सेट करने के लिए वहां बैठीं महिला नेताओं को आनन-फानन में अपनी जगह छोड़कर पीछे या दूसरी तरफ शिफ्ट होना पड़ा। सोशल मीडिया पर अब लोग चुटकी ले रहे हैं कि जो पार्टी 'महिला आरक्षण' के लिए पदयात्रा निकाल रही है, उसके मंच पर एक महिला नेता अपनी सीट तक आरक्षित नहीं रख पाईं।
दावा 'नारी शक्ति' का, दबदबा 'पुरुषों' का
विवाद सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रहा। भाजपा ने जिस भारी महिला भागीदारी का ढिंढोरा पीटा था, जमीन पर हकीकत उससे कोसों दूर नजर आई। सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या उम्मीद से काफी कम रही। जैसे ही भाषण खत्म हुए और मुख्य पदयात्रा शुरू हुई, तो नजारा ही बदल गया। पदयात्रा में महिलाओं की तुलना में भाजपा के पुरुष कार्यकर्ताओं का हुजूम ज्यादा दिखाई दिया।
कांग्रेस के खिलाफ हुंकार या अपनों की फजीहत?
महिला आरक्षण बिल पास न होने को लेकर कांग्रेस को घेरने निकली भाजपा खुद ही अपने आयोजन के कुप्रबंधन में घिरती दिखी। एक ओर प्रभारी मंत्री के लिए महिला जनप्रतिनिधियों का शिफ्ट किया जाना और दूसरी ओर महिला केंद्रित यात्रा में पुरुषों की बहुतायत, कांग्रेस को बैठे-बिठाए हमला करने का मुद्दा दे गई है।