भोपाल/इंदौर। 
मध्य प्रदेश सरकार ने इस वर्ष आबकारी राजस्व में 20% बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा था, लेकिन वर्तमान स्थितियां इसके उलट नजर आ रही हैं। सरकार की 'सिंगल शॉप' (Single Shop) नीति और दोषपूर्ण प्रबंधन के कारण न केवल राजस्व का लक्ष्य पिछड़ गया है, बल्कि प्रदेश की सैकड़ों शराब दुकानें अब 'गले की फांस' बन गई हैं।
राजस्व का गणित: लक्ष्य बनाम हकीकत
सरकार ने पिछले साल के ₹16,627 करोड़ के राजस्व को बढ़ाकर इस वर्ष ₹19,922 करोड़ (लगभग 20,000 करोड़) करने का सपना देखा था। लेकिन वास्तविकता यह है कि अब तक केवल ₹16,848 करोड़ ही खजाने में आए हैं।20% की वृद्धि तो दूर, सरकार बमुश्किल पिछले साल के आंकड़ों के करीब पहुंच पाई है। लक्ष्य से लगभग ₹3,000 करोड़ पीछे रहने की आशंका है।
'सिंगल शॉप' नीति ने बिगाड़ा खेल
पत्रकार भुवन तोशनीवाल के अनुसार, सरकार ने इस बार पुराने 'ग्रुप सिस्टम' (जहां घाटे वाली दुकान का नुकसान मुनाफे वाली दुकान से भरपाई हो जाता था) को खत्म कर सिंगल शॉप पॉलिसी लागू की।  मलाईदार (कमाऊ) दुकानें तो नीलाम हो गईं, लेकिन लगभग 300 से 400 दुकानें ऐसी हैं जिन्हें कोई लेने को तैयार नहीं है। इन दुकानों के लिए जो ऑफर आ रहे हैं, वे 30% से 70% माइनस (कम) में हैं, जिससे सरकार की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।
छत्तीसगढ़ मॉडल और अधिकारियों का डर
नीलाम न होने वाली दुकानों को चलाने के लिए सरकार अब विभागीय कर्मचारियों का सहारा ले रही है। दो अधिकारियों को 'छत्तीसगढ़ मॉडल' सीखने भेजा गया है। छत्तीसगढ़ में जब सरकार ने खुद दुकानें चलाईं, तो भ्रष्टाचार के चलते 30 से अधिक आबकारी अधिकारी जेल गए। क्या मध्य प्रदेश के अधिकारी इतने पाक-साफ हैं कि वे बिना अनियमिता के दुकानें चला पाएंगे? यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।
बियर की किल्लत और 'सोम डिस्टिलरी' विवाद
भीषण गर्मी के इस सीजन में (अप्रैल-जून), जो शराब ठेकेदारों की कमाई का पीक समय होता है, प्रदेश में बियर की भारी कमी हो गई है।इसका मुख्य कारण सोम डिस्टिलरी का लाइसेंस निरस्त होना बताया जा रहा है, जो प्रदेश की 50% बियर सप्लाई संभालती थी। आरोप है कि विभाग ने प्रतिस्पर्धा खत्म कर दी है और चुनिंदा डिस्टिलरी को कोटा बांट दिया है, जिससे बाजार में कृत्रिम अभाव पैदा हो गया है।
कौन है इस विफलता का जिम्मेदार?
चर्चा में सीधे तौर पर नीति बनाने वाले शीर्ष अधिकारियों पर निशाना साधा गया: तत्कालीन आबकारी आयुक्त अभिजीत अग्रवाल और वर्तमान प्रमुख सचिव अमित राठौर को इस 'फेलियर' के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। सरकार ने गुना, अशोकनगर और बैतूल के जिला आबकारी अधिकारियों को सस्पेंड किया, जबकि असली गलती उन शीर्ष अधिकारियों की है जिन्होंने 'एसी कमरों' में बैठकर जमीनी हकीकत से दूर यह नीति बनाई।
अवैध शराब और राजनीतिक संरक्षण
मध्य प्रदेश में शराब की दुकानों की संख्या (3,551) सीमित रखने पर भी सवाल उठाए गए। उत्तर प्रदेश में हजारों दुकानें हैं और राजस्व हमारे यहां से तीन-चार गुना ज्यादा है। दुकानों की संख्या न बढ़ाकर 'सस्ती लोकप्रियता' हासिल करने की कोशिश की गई, जिसका फायदा उठाकर गांव-गांव में एक्टिवा और बोलेरो के जरिए अवैध शराब बेची जा रही है। आरोप है कि इस अवैध कारोबार को नेताओं और अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त है। मध्य प्रदेश की आबकारी नीति वर्तमान में 'प्रतिस्पर्धा शून्य' हो गई है। यदि सरकार ने समय रहते सुधार नहीं किया और ठेकेदारों के हित व जमीनी फीडबैक को नजरअंदाज किया, तो अगले साल की स्थिति और भी भयावह हो सकती है। फिलहाल, 400 दुकानों का भविष्य और हजारों करोड़ का राजस्व अधर में लटका हुआ है।