शादी या सुपारी? जब ‘पति परमेश्वर’ ही बन जाए कांटा; सामाजिक ताने-बाने का नया खतरनाक स्वरूप
भोपाल, सबकी खबर।
"पति परमेश्वर होता है"—यह सदियों पुराना जुमला अब समाज के बदलते स्वरूप में कहीं खोता नजर आ रहा है। हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर और धार (प्रियंका पुरोहित केस) में हुई दिल दहला देने वाली घटनाओं ने, जहां पत्नियों ने ही अपने पतियों की सुपारी देकर उन्हें रास्ते से हटवा दिया, पूरे सामाजिक विज्ञान को सोचने पर विवश कर दिया है। इसी गंभीर विषय पर सबकी खबर के एक पॉडकॉस्ट के जरिए समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है।
इंदौर से धार तक: खून से सनी प्रेम कहानियाँ
चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र जैन ने इंदौर के राजा और सोनम रघुवंशी मामले का जिक्र किया, जहां शादी के महज कुछ दिन बाद ही पति को मौत के घाट उतार दिया गया। वहीं, धार जिले की प्रियंका पुरोहित का मामला और भी चौंकाने वाला है। प्रियंका पूरी तरह पति पर निर्भर थी, फिर भी उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या 'विवाह' नाम की संस्था अब विश्वास की बुनियाद पर नहीं टिकी है?
कॉर्पोरेट कल्चर और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर
संयुक्त परिवार की सदस्य और पत्रकार आरती ने इन बढ़ते अपराधों के पीछे 'कॉर्पोरेट कल्चर' और 'एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स' को मुख्य कारण माना। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी एक-दूसरे को समय नहीं दे पाते, जिससे दूरियां बढ़ती हैं। प्रेमी अक्सर महिलाओं का 'ब्रेन वाश' करते हैं और उन्हें पति को रास्ते से हटाने के लिए उकसाते हैं। शादी के बाद भी लड़कियों की माताओं का ससुराल के छोटे-छोटे मुद्दों में हस्तक्षेप करना भी रिश्तों में जहर घोल रहा है।
समाधान: क्या तलाक की प्रक्रिया आसान होनी चाहिए?
चर्चा में एक बड़ा मुद्दा यह उठा कि क्या भारत में तलाक के कानूनों की जटिलता इन हत्याओं की वजह है? वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र जैन ने सवाल उठाया कि जब आपसी तालमेल न हो, तो सालों तक कोर्ट के चक्कर काटने और परामर्श केंद्रों में भटकने के बजाय क्या 'सरल तलाक' इन मौतों को रोक सकता है? आरती ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि "घुट-घुट कर जीने या किसी की जान लेने से बेहतर है कि 6 महीने के भीतर आपसी सहमति से अलग होने का सरल विकल्प मिले।"
सिंधी समाज की पहल: बहुओं के लिए 'मैरिज ट्रेनिंग'
श्री जैन ने भोपाल (बैरागढ़) के सिंधी समाज द्वारा संचालित 'जीव दया संस्थान' का बेहतरीन उदाहरण दिया। यहाँ शादी से पहले लड़कियों को 2-3 महीने का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, जहाँ उन्हें नए घर में तालमेल बिठाने और आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि हर समाज (जैन, अग्रवाल, वैश्य आदि) को ऐसे सेंटर बनाने चाहिए जहाँ बच्चियां अपने मन की बात कह सकें।
अपील... बहू नहीं, बेटी के रूप में स्वीकारें
प्रोग्राम के अंत में श्री जैन ने एक मार्मिक उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे किसी पुराने आंगन से 25 साल पुराने पेड़ को उखाड़कर दूसरे आंगन में लगाया जाता है, वैसे ही बेटियाँ अपना घर छोड़ती हैं। यदि उन्हें दूसरे आंगन में वही प्यार और खाद-पानी मिले, तो वे आसानी से एडजस्ट हो जाती हैं। "यदि परिवारों को बचाना है, तो समाज को सास का चेहरा बदलकर माँ का चेहरा अपनाना होगा।"

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