कटनी/भोपाल।  
बीजेपी के सबसे अमीर विधायकों में शुमार संजय पाठक इन दिनों कानूनी चक्रव्यूह में फंसे हैं। मामला जबलपुर हाई कोर्ट का है, जहाँ जस्टिस विशाल मिश्रा की अदालत में उनकी माइनिंग कंपनियों के खिलाफ सुनवाई होनी थी। जिस दिन सुनवाई थी, ठीक उसी दिन जज साहब को विधायक जी का 'मिस्ड कॉल' चला गया। विधायक ने इसे 'तकनीकी गलती' बताया और खुद को पहचानने के लिए मैसेज भी कर दिया। कोर्ट ने इसे 'अप्रोच' (संपर्क साधने की कोशिश) माना और अवमानना का मामला चलाते हुए उन्हें व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। अब संजय पाठक ने बिना शर्त माफी तो मांग ली है, लेकिन कोर्ट का रुख कड़ा है।
443 करोड़ की 'चोरी' का सरकारी कबूलनामा
खबर केवल फोन कॉल की नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपे 443 करोड़ रुपये के माइनिंग घोटाले की है। खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विधानसभा में स्वीकारा कि संजय पाठक के परिवार की कंपनियों ने एक्सेस माइनिंग (अवैध उत्खनन) की है। RTI कार्यकर्ता आशुतोष मनु दीक्षित का दावा है कि अगर खदानों की गहराई और चौड़ाई की सही नपती (Jio Mapping) हो जाए, तो यह रिकवरी 1000 करोड़ के पार जा सकती है।  आरोप है कि खनिज विभाग ने केवल कागजी खानापूर्ति कर विधायक को बचाने की कोशिश की है।
'रायशुमारी' या रसूख बचाने का 'ढकोसला'?
अपनी टिकट बचाने और पार्टी पर दबाव बनाने के लिए संजय पाठक ने एक बार फिर 'रायशुमारी' (Internal Voting) का सिगूफा छोड़ा है। उनका दावा हैं कि अगर 51% जनता ने साथ नहीं दिया, तो इस्तीफा दे दूंगा। आलोचकों का कहना है कि जब चुनाव अधिकारी आपके, पेटी आपकी और गिनती आपके लोग करें, तो नतीजा तो 91% ही आएगा। यह लोकतंत्र का सम्मान नहीं, बल्कि जनता को गुमराह करने का एक 'सियासी इवेंट' है।
तीखे सवाल जो 'सबकी खबर' उठा रहा है
जो विधायक कभी कांग्रेस को 'मां' कहते थे और पाला बदलकर बीजेपी में आए, क्या उनकी 'रायशुमारी' वाकई नैतिक है या सिर्फ कुर्सी बचाने का पैंतरा? जब सरकार मान चुकी है कि 443 करोड़ की चोरी हुई है, तो अब तक जबलपुर कलेक्टर ने रिकवरी का फाइनल नोटिस क्यों नहीं दिया? क्या राजनीतिक दबाव में सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है? आदिवासियों की जमीन: क्या विधायक जी उन 1000 एकड़ जमीनों को वापस करेंगे जो आदिवासियों और ट्रस्ट के नाम पर हेराफेरी कर हड़पी गई हैं? संजय पाठक के लिए आने वाले 15 दिन बेहद भारी हैं। मामला मई तक सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के आसार हैं। कानून के विशेषज्ञों का मानना है कि 'मिस्ड कॉल' की माफी तो शायद मिल जाए, लेकिन करोड़ों की रिकवरी से बचना अब नामुमकिन है। रायशुमारी से पहले सरकार का पैसा ब्याज समेत सरकारी खजाने में जमा कीजिए पाठक जी!"