भोपाल, सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इस वक्त एक ऐसा हड़कंप मचा है जिसने सत्ता और रसूख की नींव हिला दी है। 1985 बैच के रिटायर्ड आईएफएस अधिकारी आजाद सिंह डबास ने सीधे तौर पर चार कद्दावर आईएएस अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ईओडब्ल्यू में एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। आरोप कोई छोटे-मोटे नहीं, बल्कि पर्यावरण नियमों की धज्जियां उड़ाकर 237 अवैध अनुमतियां जारी करने के हैं। इन अधिकारियों में एसीएस अशोक वर्णवाल, पूर्व प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी, श्रीमंत शुक्ला और उमा महेश्वरी आर जैसे बड़े नाम शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि एनजीटी (NGT) ने पन्ना की खदानों से जुड़ी नौ अनुमतियों को पहले ही रद्द कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद विभाग के आला अफसर कोर्ट के आदेशों को ठेंगा दिखाकर सरकार के पुराने फैसलों पर अड़े हुए हैं। आजाद सिंह डवास का दावा है कि जब 'सिया' के चेयरमैन ने बैठक बुलाने के लिए 50 बार पत्र लिखे, तब सदस्य सचिव छुट्टी पर चली गईं और उनकी गैर-मौजूदगी में चार्ज लेते ही दूसरे अधिकारी ने एक ही दिन में सैकड़ों क्लीयरेंस बांट दिए। यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार और खदान मालिकों के साथ मिलीभगत का मामला नजर आता है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस गंभीर मुद्दे पर मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्य सचिव को पिछले 11 महीनों से लगातार पत्र लिखे जा रहे हैं, लेकिन शासन के स्तर पर सन्नाटा पसरा हुआ है। डवास ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अगर ईओडब्ल्यू ने कार्रवाई नहीं की तो वे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। मध्य प्रदेश के इतिहास में यह शायद पहली बार है जब एक पूर्व वन सेवा अधिकारी ने इतने प्रमाणों के साथ चार सीधी भर्ती के आईएएस अधिकारियों को जेल भेजने की ठान ली है। अब सवाल यह है कि क्या प्रदेश का सिस्टम अपने ही शक्तिशाली अधिकारियों पर हाथ डालने की हिम्मत दिखाएगा या फिर रसूख के आगे कानून एक बार फिर बौना साबित होगा। 9 करोड़ जनता अब मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से जवाब मांग रही है कि आखिर ये अंधेरगर्दी कब रुकेगी।