सॉफ्ट चेहरा, लोहे का अनुशासन: हेमंत खंडेलवाल ने 8 महीने में बदली MP भाजपा की सूरत
भोपाल।
मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी में इन दिनों एक नाम की सबसे ज्यादा चर्चा है—प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल। जिन्हें शुरुआत में बेहद 'सरल और सहज' मानकर हल्के में लिया जा रहा था, उन्होंने महज 8 महीनों के भीतर अपनी संगठनात्मक क्षमता से राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है।
बगावत का नामोनिशान नहीं: 1000 नियुक्तियां और 'सन्नाटा'
हेमंत खंडेलवाल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि नियुक्तियों के बाद का अनुशासन है। 2 जुलाई को कमान संभालने के बाद उन्होंने कार्यकारिणी, विभिन्न मोर्चों (SC/ST, किसान मोर्चा), प्रवक्ता और पैनलिस्टों की करीब 1000 से ज्यादा नियुक्तियां कर डालीं। ताज्जुब की बात यह है कि पूरे मध्य प्रदेश में कहीं से भी विरोध या बगावत की एक भी आवाज सुनाई नहीं दी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि खंडेलवाल ने 'माय मैनशिप' (अपने लोगों को उपकृत करना) के बजाय 'पार्टी मैनशिप' पर जोर दिया है, जिससे सालों से काम कर रहे समर्पित कार्यकर्ताओं में संतोष है।
जब दिग्गज नेताओं को मिलाना पड़ा हाथ
खंडेलवाल की 'अनुशासन की छड़ी' का उदाहरण बुंदेलखंड में देखने को मिला। दिग्गज नेता गोविंद सिंह राजपूत और भूपेंद्र सिंह के बीच के पुराने मनमुटाव को उन्होंने चुटकियों में सुलझा दिया। उन्होंने साफ कह दिया था कि वे सागर की धरती पर कदम तभी रखेंगे जब दोनों नेता एक होकर उनका स्वागत करेंगे। नतीजा यह हुआ कि न केवल दोनों ने हाथ मिलाया, बल्कि एक-दूसरे के घर जाकर भोजन भी किया।
सादगी ऐसी कि सुरक्षा छोड़ी, खुद भरते हैं टोल
अध्यक्ष पद के रसूख के बावजूद हेमंत खंडेलवाल की सादगी चर्चा का विषय है:
छोटा फ्लैट: उन्होंने बड़ा बंगला लेने से इनकार कर दिया और भोपाल की प्रोफेसर कॉलोनी में एक छोटे से फ्लैट में रहते हैं।
सुरक्षा का त्याग: उन्होंने सरकारी सुरक्षा वापस कर दी है।
टोल नियम: विधायक होने के नाते टोल फ्री होने के बावजूद उन्होंने अपने ड्राइवर को सख्त निर्देश दिए हैं कि फास्टैग के जरिए हमेशा टोल का भुगतान किया जाए।
मंत्रियों की 'क्लास' और संगठन का डर
भले ही उनका चेहरा सौम्य हो, लेकिन काम के मामले में वे सख्त हैं। उन्होंने मंत्रियों के लिए भाजपा कार्यालय में बैठने की व्यवस्था को अनिवार्य कर दिया है। अब मंत्रियों में यह डर साफ दिखता है कि अगर वे संगठन के निर्देशानुसार कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध नहीं हुए, तो इसकी रिपोर्ट सीधे ऊपर जाएगी।
कांग्रेस बनाम भाजपा: अनुशासन का अंतर
जहाँ भाजपा में हजारों नियुक्तियों के बाद भी शांति है, वहीं कांग्रेस में राज्यसभा की एक सीट की घोषणा से पहले ही गुटबाजी और जातिगत दावों (जैसे विंध्य के ब्राह्मण नेताओं की लामबंदी) का दौर शुरू हो गया है। खंडेलवाल ने यह साबित कर दिया है कि सत्ता में होने के बावजूद संगठन को गुटबाजी से मुक्त कैसे रखा जाता है।

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