मध्य प्रदेश के शहरों में अब पेड़ काटना होगा नामुमकिन, सरकार ने नगर निगम से छीने अधिकार, नया नियम लागू!
भोपाल।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल समेत प्रदेश के सभी शहरी निकायों में अब पेड़ों की कटाई पर नकेल कसने के लिए सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। अब तक नगर निगम और जिला प्रशासन के पास रहने वाला पेड़ काटने की अनुमति का अधिकार अब पूरी तरह से वन विभाग को ट्रांसफर कर दिया गया है। यह कदम शहरों में तेजी से घटते ग्रीन कवर को बचाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
स्मार्ट सिटी के जख्म
भोपाल में अकेले स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के नाम पर 8,000 से अधिक पेड़ों की बलि चढ़ा दी गई थी, जिसकी पर्यावरणविदों ने काफी आलोचना की थी। इसी को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार ने अब शहरी स्थानीय निकायों और जिला प्रशासन की शक्तियों को समाप्त कर दिया है। अब निजी जमीन हो या सरकारी, पेड़ हटाने या काटने के लिए वन विभाग की दहलीज पर जाना ही होगा।
ये है नया पावर स्ट्रक्चर
नए सरकारी आदेश के मुताबिक, अब प्रदेश के किसी भी कोने में पेड़ काटने के लिए संबंधित क्षेत्र के रेंज ऑफिसर से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यदि रेंजर अनुमति देने से इनकार करता है, तो आवेदक उप-संभागीय वन अधिकारी के पास अपील कर सकता है। इससे पहले यह प्रक्रिया नगर निगम के माध्यम से होती थी, जहां विकास कार्यों के नाम पर नियमों में ढिलाई के आरोप अक्सर लगते रहते थे।
क्यों जरूरी था यह बदलाव?
नगर निगम और जिला प्रशासन पर अक्सर इंफ्रास्ट्रक्चर के दबाव में पेड़ों की कटाई को आसान बनाने के आरोप लगते थे। वन विभाग को यह जिम्मेदारी सौंपने से 'चेक एंड बैलेंस' की स्थिति बनेगी। वन विभाग का नजरिया तकनीकी और संरक्षणवादी होता है, जिससे अनावश्यक कटाई पर रोक लगेगी।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना हमेशा से चुनौती रही है। नगर निगम से यह अधिकार छीनकर वन विभाग को सौंपना यह दर्शाता है कि सरकार अब शहरों की हरियाली को केवल लैंडस्केपिंग नहीं, बल्कि इकोसिस्टम के तौर पर देख रही है। अब पेड़ काटना प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक गंभीर वानिकी मामला होगा।
- वन विभाग (मध्य प्रदेश शासन)

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