भोपाल। 
भोपाल में कुत्तों का बढ़ता आतंक अब जानलेवा साबित हो रहा है, लेकिन नगर निगम के गलियारों में इस गंभीर समस्या के समाधान से ज्यादा शब्दों की मर्यादा पर बहस तेज है। हाल ही में नगर निगम के बजट सत्र के दौरान एक ऐसा वाकया सामने आया, जिसने सदन की गंभीरता को हंसी-ठिठोली में बदल दिया। नगर निगम की बैठक में जब कांग्रेस पार्षद ने शहर के गली-मोहल्लों और चौराहों पर कुत्तों के जमावड़े और उनके बढ़ते हमलों का मुद्दा उठाया, तो उन्होंने प्रशासन से इस दहशत से निजात दिलाने की मांग की। कांग्रेस पार्षद ने कहा कि शहर में कुत्ते रात भर भौंकते हैं, जिससे लोगों का जीना मुहाल हो गया है। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी बात खत्म की, भाजपा के एक पार्षद ने समस्या के समाधान पर बात करने के बजाय शब्दों के चयन पर आपत्ति जता दी। भाजपा पार्षद ने तंज कसते हुए कहा कि आप इन्हें 'कुत्ता' मत कहिए, यह सुनने में अच्छा नहीं लगता। उन्होंने सुझाव दिया कि इन्हें 'स्वान' या 'डॉग' कहकर संबोधित किया जाए। इस अजीबो-गरीब टोक-टाकी पर कांग्रेस पार्षद ने भी चुटकी लेते हुए तुरंत 'सॉरी' बोल दिया, जिसके बाद पूरे सदन में ठहाके गूंज उठे। हैरानी की बात यह है कि भोपाल में श्वानों (कुत्तों) के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और यह मुद्दा मध्य प्रदेश विधानसभा में भी गूंज चुका है। वहां भी इसी तरह की स्थिति बनी थी जब सदस्यों ने 'कुत्ता' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई थी। सवाल अब यह उठता है कि क्या केवल नाम बदल देने से शहर की सड़कों पर मासूमों और राहगीरों को निशाना बना रहे इन जानवरों का आतंक कम हो जाएगा? फिलहाल, समाधान की फाइलें दबी हुई हैं और सदन में केवल शब्दावली पर राजनीति और कॉमेडी जारी है।