प्रदेश के इन चार पूर्व मुख्य सचिवों के बंगलोें पर कब लगेंगे प्रशासन के लाल निशान
भोपाल, सबकी खबर।
राजधानी के बड़े तालाब के संरक्षण को लेकर चल रही प्रशासनिक कार्रवाई अब विवादों के घेरे में है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सख्ती के बाद जिला प्रशासन और नगर निगम ने टास्क फोर्स तो गठित कर दी है, लेकिन आरोप लग रहे हैं कि यह कार्रवाई केवल छोटे और गरीब अतिक्रमणकारियों तक सीमित है।
चार पूर्व मुख्य सचिवों के बंगलों पर कब होगी कार्रवाई
वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सीधे तौर पर मध्य प्रदेश के चार पूर्व मुख्य सचिवों—इकबाल सिंह बैस, बसंत प्रताप सिंह, एस.आर. मोहंती और वीरा राणा—पर अपने पद का दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। इन रसूखदारों ने बरखेड़ी खुर्द और बिसनखेड़ी जैसे 'लो डेंसिटी जोन' और 'टाइगर मूवमेंट' वाले इलाकों में नियमों का उल्लंघन कर आलीशान हवेलियां और फार्म हाउस बनाए गए हैं। जहाँ 10,000 वर्ग फीट पर सिर्फ 600 वर्ग फीट निर्माण की अनुमति है, वहाँ 8 से 9 हजार वर्ग फीट में निर्माण किया गया है। आरोप है कि मुख्य सचिव रहते हुए इन अधिकारियों ने अपने निजी बंगलों तक पहुँचने के लिए सरकारी खर्च पर सीमेंटेड सड़कें बनवाईं।
पश्चिमी बाईपास भी विवादों में
रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित पश्चिमी बाईपास का निर्माण भी संदेह के घेरे में है। आरोप है कि यह प्रोजेक्ट तालाब के कैचमेंट एरिया और जंगली जानवरों के कॉरिडोर को बर्बाद कर देगा। जानकारों का दावा है कि इस रूट पर अधिकारियों और प्रभावशाली नेताओं ने बड़ी मात्रा में जमीनें खरीदी हैं, जिन्हें फायदा पहुँचाने के लिए ₹300 करोड़ से अधिक का यह प्रोजेक्ट लाया गया है।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल
वर्तमान में प्रशासन द्वारा 'खानूगाँव' जैसे इलाकों में मकानों पर लाल निशान लगाए जा रहे हैं। विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन रसूखदारों के बंगले नापने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है। मामला हाई कोर्ट और एनजीटी में लंबित है। शहर के लोग अब मुख्यमंत्री और वर्तमान मुख्य सचिव से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि क्या वे इन रसूखदार 'सफेदपोशों' पर कार्रवाई कर बड़े तालाब के अस्तित्व को बचा पाएंगे।

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