जबलपुर।
मध्य प्रदेश की सियासत में उस वक्त हड़कंप मच गया जब भाजपा के कद्दावर विधायक संजय पाठक की सदस्यता को चुनौती देने वाली एक रिट पिटीशन हाईकोर्ट में दाखिल की गई। यह मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सीधे तौर पर न्यायपालिका और संविधान के सम्मान से जुड़ा है।
क्या है पूरा मामला?
मामले की जड़ जस्टिस विशाल मिश्रा की वह टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने ऑन-रिकॉर्ड लिखा था कि उन्हें एक मामले की सुनवाई के दौरान फोन कर प्रभावित करने की कोशिश की गई। इसी आधार पर सामाजिक कार्यकर्ता आशुतोष मनु दीक्षित ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। याचिका में मांग की गई है कि चूंकि विधायक ने सीधे तौर पर न्यायपालिका के कार्य में हस्तक्षेप किया है, इसलिए उन्हें तत्काल विधायक पद के अयोग्य घोषित किया जाए।
स्पीकर और DGP समेत 7 बने पक्षकार
इस याचिका की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें सिर्फ संजय पाठक को ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को भी पार्टी बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब जज ने स्वयं लिखित में हस्तक्षेप की बात कही, तो स्पीकर ने अब तक सदस्यता रद्द करने की कार्रवाई क्यों नहीं की? इसके अलावा DGP, जबलपुर SP और लॉ डिपार्टमेंट को भी जवाबदेह बनाया गया है।
भ्रष्टाचार और जमीन घोटाले के गंभीर आरोप
अंशु मिश्रा और अन्य कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि संजय पाठक पर न केवल कोर्ट को प्रभावित करने का आरोप है, बल्कि उन पर 443 करोड़ रुपये की एक्सेस माइनिंग का जुर्माना भी बकाया है। साथ ही, गरीब आदिवासियों के नाम पर 1100 एकड़ जमीन हड़पने का मुद्दा भी अब तूल पकड़ चुका है।