भोपाल:

मध्य प्रदेश में सत्ता के विकेंद्रीकरण और पंचायती राज के दावों की धज्जियां उड़ गई हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट ने एक संवैधानिक धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया है। इस खुलासे ने शासन व्यवस्था की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के सरकारी विभागों ने कागजों पर तो पंचायतों और नगरीय निकायों को अधिकार सौंपने का नाटक किया, लेकिन बजट की तिजोरी की चाबी आज भी अपने ही पास दबाकर रखी है।
विभागों ने खुद के पास रखी सारी पावर
कैग की जांच में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया है कि विभागों ने अनुदान की राशि तो स्थानीय निकायों के नाम पर दिखाई, लेकिन उसका आहरण और संवितरण करने का पावर खुद के पास ही रखा। संविधान की अनुसूची 11 और 12 के तहत जिन विषयों, कर्मचारियों और फंड का हस्तांतरण होना था, वह कभी धरातल पर उतरा ही नहीं। पंचायतें और नगरीय निकाय केवल एक 'मजदूर एजेंसी' बनकर रह गए हैं, जिनके पास वित्तीय निर्णय लेने की रत्ती भर भी आजादी नहीं है।
स्कूल शिक्षा विभाग में बड़ा फर्जीवाड़ा
सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा स्कूल शिक्षा विभाग में पकड़ा गया है। विभाग सालों से यह दावा करता रहा कि उसने स्कूल भवन, भूमि और स्टाफ का पूर्ण हस्तांतरण निकायों को कर दिया है। लेकिन हकीकत यह है कि न तो जमीन का हस्तांतरण हुआ और न ही कर्मचारियों का नियंत्रण निकायों को मिला। यह सीधा-सीधा संविधान के 73वें संशोधन की पीठ में छुरा घोंपने जैसा है, जो पंचायतों को एक स्वतंत्र 'स्वशासी सरकार' बनाने की वकालत करता है। रिपोर्ट बताती है कि 1995 से लेकर 2018 तक, यानी दो दशकों से ज्यादा समय तक विभागों ने बिना किसी अधिसूचना और पालन प्रतिवेदन के ही हस्तांतरण का फर्जी दावा किया।