भोपाल।
सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके, ये गुलिस्तां हमारा...ये गुलिस्तां हमारा बगीचा है और हम इसके बुलबुल हैं. जो पक्षी हैं वो यहां गुल खाने-पराग खाने आते हैं. यदि यहां पराग नहीं मिला तो जहां गुल मिलेगा वहां जाएंगे. हमारा पढ़ा-लिखा वर्ग बाहर क्यों जा रहा है, क्योंकि कि वहां गुल मिल रहा है और देशभक्ति कोई नहीं है. अल्लामा इकबाल के इस गीत पर शुक्रवार को भोपाल के रविंद्र भवन स्थित सभागार में अपनी नई पुस्तक 'हम और यह विश्व' के विमोचन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य ने बड़ा सवाल उठाया है.
बगीचे में लगेगी आग तो बुलबुल सबसे पहले उड़ जाएंगे
डॉ. वैद्य ने आगे कहा कि यहां पर बुलबुल कौन हैं. कोई कहता है कि मालिक हैं, फिर कहते हैं कि रक्षक हैं. फिर एक उत्तर आता है कि हम इसके पौधे हैं, हमसे ये बगीचा बना है. अगर गुल लगे तो उत्तम गुल लगे, अगर फल आए तो उत्तम फल लगे. तब तो ये बगीचे की शोभा बढ़ाएंगे. पर यदि बगीचे में आग लगेगी तो सारे बुलबुल पहले उड़ जाएंगे. ये गलत नरेटिव सेट किया गया है. डॉ. वैद्य की पुस्तक के विमोचन के अवसर पर श्री आनंदधाम आश्रम मथुरा-वुंदावन के रीतेश्वर जी महाराज और पूर्व उप राष्ट्रपति जगदीप धनकड़ समेत अन्य प्रबुद्ध लोग शामिल हुए. इस दौरान डॉ. वैद्य ने पूर्व उपराष्ट्रपति धनकड़ को अपना अभिभावक बताया.
प्रणव दा की वजह से लेखक बन गया
डॉ. वैद्य ने पुस्तक विमोचन के अवसर पर बताया कि 7 जून 1998 को संघ का कार्यक्रम था. इसमें प्रणव मुखर्जी स्वयंसेवक संघ के र्काकर्ताओं को संबोधित करने वाले थे. एक अध्यनशील व्यक्ति का इतना विरोध किया गया. वो संघ नहीं ज्वाइन करने वाले थे, वास्तव में वो संघ के लोगों को संबोधित करने वाले थे. जिस विचार के लोग उनको अपना मानते थे, उनको लगा कि हमारे आदमी को बुलाया है, कुछ खरी-खरी सुनाएंगे.