मंडला।
मध्य प्रदेश के मंडला जिले से आई एक तस्वीर विकास के दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही है. विडंबना देखिए, जिस जिले से लोक स्वास्थ्य यांत्रिक विभाग की मंत्री संपतिया उइके आती हैं, वहीं आज ग्रामीण स्वच्छ पेयजल के लिए तरस रहे हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि लोग मजबूरी में हैंडपंप से निकलने वाला दूषित और पीला पानी पीने को विवश हैं.
बूंद-बूंद के लिए ग्रामीणों का संघर्ष
मामला मंडला जिले से लगभग 30 किलोमीटर दूर अमझर पंचायत के पोषक ग्राम पीपरदोन का है. आदिवासी बहुल यह गांव आज पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि, गांव में पानी की टंकी तो बन गई, ठेकेदार ने हर घर में नल कनेक्शन भी कर दिए, लेकिन हैरानी की बात यह है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी इन नलों से पानी की एक बूंद तक नहीं आई. पानी की इस विकराल समस्या ने ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ दिया है.
भड़का जनआक्रोश, ग्रामीणों ने जाम की सड़क
आज सुबह गांव की महिलाएं और पुरुष एकजुट होकर कान्हा नेशनल पार्क जाने वाली मुख्य सड़क पर उतर आए और रास्ता जाम कर दिया. घंटों चले इस विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन हरकत में आया. तहसीलदार और लोक स्वास्थ्य यांत्रिक विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे. अधिकारियों ने ग्रामीणों को समझाया, आश्वासन दिया और किसी तरह जाम खुलवाया. लेकिन सवाल अब भी कायम है, क्या आश्वासन ही गांव की प्यास बुझाएंगे.
अधिकारी बोले-नल-जल योजना का कार्य प्रगति पर
लोक स्वास्थ्य यांत्रिक विभाग के अधिकारी मनोज भास्कर ने बताया कि, ''पीपरदोन में नल-जल योजना का कार्य सुचारु रूप से प्रगति पर है. आज योजना की टेस्टिंग की गई. अधिकारियों के अनुसार, कार्य में देरी जरूर हुई, लेकिन अब ग्रामीणों को बड़ी सुविधा मिलने जा रही है.'' उन्होंने बताया कि, ''यह योजना जल जीवन मिशन के तहत बनाई गई है. ट्यूबवेल जोड़कर हर घर में पानी की सप्लाई शुरू की जाएगी. तीन महीने तक ठेकेदार द्वारा इसकी परीक्षण प्रक्रिया चलेगी, उसके बाद योजना ग्राम पंचायत को सौंप दी जाएगी. एक तरफ कागजों में योजनाएं पूरी हो जाती हैं, दूसरी तरफ जमीनी हकीकत प्यास से जूझती रहती है. सवाल सिर्फ पानी का नहीं, भरोसे का भी है. क्या इस बार नलों से सचमुच पानी बहेगा या फिर ये वादे भी कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे? मंडला से आई यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उन दावों की सच्चाई है जो जमीनी स्तर पर दम तोड़ देते हैं. अब देखना होगा कि प्रशासन का आश्वासन हकीकत में कब बदलता है.