भोपाल।
मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण से जुड़े बेहद संवेदनशील मामलों में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की बड़ी लापरवाही उजागर हुई। न्यायमूर्ति नरसिंहा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ के सामने जब सीरियल नंबर 106 पर अंतिम बहस के लिए मामला पुकारा गया, तो मध्य प्रदेश सरकार की ओर से एक भी अधिवक्ता मौजूद नहीं था। शीर्ष अदालत ने इस गैर-जिम्मेदाराना आचरण पर गहरी नाराजगी जताते हुए खेद प्रकट किया।
सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
ओबीसी वर्ग के वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप चौधरी ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता समेत पांच अन्य दिग्गज वकीलों को इस केस के लिए नियुक्त किया है। इसके बावजूद, महत्वपूर्ण सुनवाई के समय एक भी सरकारी वकील का मौजूद न होना यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे पर कितनी गंभीर है। अब तक सरकार हर पेशी पर समय मांगती रही है, लेकिन इस बार पूरी तरह अनुपस्थित रही।
बीजेपी कर रही है उपेक्षा
मप्र महिला कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष एवं पिछड़ा वर्ग मोर्चा की उपाध्यक्ष विभा पटेल ने नवभारत टाइम्स.कॉम से बात करते हुए कहा कि आरोप लगाया कि यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि ओबीसी समाज के अधिकारों के प्रति भाजपा सरकार की जानबूझकर की गई उपेक्षा है। ओबीसी वर्ग के अधिवक्ताओं के अनुरोध पर अब इन मामलों की अगली सुनवाई 4 फरवरी 2026 को तय की गई है।
ओबीसी पक्ष के वकीलों (अनूप जॉर्ज चौधरी, रामेश्वर सिंह ठाकुर व अन्य) के विशेष अनुरोध पर कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तय की है। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने खुद ही इन मामलों को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट ट्रांसफर करवाया था।
होल्ड पर हैं 13 फीसदी पद
हैरानी की बात यह है कि 27% ओबीसी आरक्षण वाले कानून पर न तो हाईकोर्ट का स्टे है और न ही सुप्रीम कोर्ट की रोक। इसके बावजूद सरकार 13% पदों को होल्ड पर रखकर नियुक्तियां अटका रही है। वहीं, ओबीसी समर्थकों का आरोप है कि सरकार केवल 'तारीख पर तारीख' लेकर वर्ग को गुमराह कर रही है।