भोपाल। 
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा ने कहा कि देश में प्राकृतिक आपदा या किसी संकट के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा कार्य के लिए खड़े रहते हैं। 1925 में नागपुर से शुरू हुआ यह संगठन आज विश्व का सबसे बड़ा संगठन बन चुका है। स्वयंसेवकों की तपस्या और समर्पण ने इसे मजबूत बनाया है। शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक संघ ने व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण का कार्य किया है। शिक्षा, समाज सेवा, संस्कृति और राजनीति के क्षेत्र में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। संगठन ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संकल्पों में भी सक्रिय योगदान दिया।उन्होंने कहा कि संघ की शाखाएं व्यक्ति निर्माण की नर्सरी हैं, जहां अनुशासन, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा सिखाई जाती है। उन्होंने कहा कि ताब्दी वर्ष में संघ पंच-परिवर्तन के माध्यम से स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और परिवार प्रबोधन का संदेश जन-जन तक पहुंचा रहा है। हितानंद ने कहा कि 2026 में संघ के शताब्दी वर्ष के पूर्ण होने पर हर भारतीय राष्ट्रयज्ञ में अपनी भूमिका निभाए और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने में योगदान दे।
पढ़िए हितानंद शर्मा का संदेश...
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा वास्तव में राष्ट्र जागरण की ध्येय यात्रा है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर के मोहिते बाड़ा में रोपा गया राष्ट्र साधना का छोटा-सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। राष्ट्र प्रथम के एकनिष्ठ भाव के साथ किए जा रहे सतत और अनथक प्रयासों के कारण संघ आज विश्व का सबसे बड़ा संगठन बन गया है।
राष्ट्र, संस्कृति, धर्म एवं समाज के हित में सर्वस्व अर्पण करने वाले स्वयंसेवक भारत के पुनरुत्थान की साधना में निरंतर लगे हुए हैं। संघ का शताब्दी वर्ष ‘चरैवेति-चरैवेति’ के मंत्र के साथ बढ़ते हुए उसके वैचारिक अधिष्ठान का एक महत्त्वपूर्ण सोपान है।
संघ के आद्य सरसंघचालक, परम पूजनीय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य भारत को स्वाधीन बनाने के साथ-साथ स्वबोध की चेतना से युक्त एक संगठित समाज का निर्माण करना था। मां भारती को परम वैभव पर आसीन करने की यह शताब्दी यात्रा सरल नहीं रही। अनेक कठिनाइयों, विरोधों और बाधाओं को मार्ग बनाते हुए संघ ने भारत माता की सेवा में व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का कार्य निरंतर जारी रखा है।
'संघ ने समाज को देश की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य किया'
स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता के पश्चात संघ ने समाज को देश की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य किया। जब स्वतंत्रता के बाद भी औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित, गुलाम पीढ़ी तैयार करने वाली मैकाले शिक्षा पद्धति जारी रही, तब संघ की प्रेरणा से 1952 में विद्या भारती की स्थापना की गई। यह संस्था आज शिक्षा और संस्कार देने वाला विश्व का सबसे बड़ा अशासकीय शैक्षणिक संगठन बन चुकी है।युवाओं को राष्ट्रीय विचारों से जोड़ने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, श्रमिकों के हित में भारतीय मजदूर संघ, किसानों के लिए भारतीय किसान संघ, सेवा कार्यों के लिए सेवा भारती, और कला-संस्कृति के लिए संस्कार भारती जैसे अनेक संगठनों की स्थापना संघ की प्रेरणा से हुई। 1936 में स्थापित राष्ट्र सेविका समिति के साथ मिलकर संघ ने महिलाओं की भूमिका को भी समान महत्व दिया। आज विचार परिवार के प्रत्येक संगठन में महिला नेतृत्व की सशक्त उपस्थिति इसी दृष्टिकोण का प्रतिफल है।
'बीजेपी ने किए ऐतिहासिक काम'
स्वतंत्रता के पश्चात जब भारतीय राजनीति अपने मूल और दिशा से भटकने लगी और देश की संप्रभुता संकट में पड़ी, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यह जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ, जो वर्तमान में विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है। इस संगठन ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने जैसे ऐतिहासिक कार्य किए हैं।संघ की सौ वर्षों की यात्रा कठिन चुनौतियों से भरी रही है। आरंभिक काल से ही संघ को अपनों के विरोध, आक्रमण, उपहास और अपमान का सामना करना पड़ा। महात्मा गांधी की हत्या का मिथ्या आरोप, दो बार लगाए गए प्रतिबंध, आपातकाल की असहनीय यातनाएं इन सभी के बावजूद संघ अपने संकल्पों पर अडिग रहा। इस साधना की यज्ञवेदी पर असंख्य स्वयंसेवकों ने अपनी आहुति दी है। स्वयंसेवकों की तपस्या और प्रचारकों के समर्पण ने संघ को उस ऊँचाई तक पहुँचाया है जहाँ आज विश्वभर में लोग संघ को जानना और उससे जुड़ना चाहते हैं।भारत के गौरवशाली स्वर्णिम इतिहास, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा की संघरूपी वटवृक्ष की जड़ें बहुत गहराई तक फैली हुई हैं। संघ की शाखाएं संगठन की आत्मा हैं। आज यह वाक्य आम हो चुका है कि संघ को समझना है तो शाखा में जाना होगा। शाखा को व्यक्ति निर्माण की नर्सरी कहा जाता है। इसके माध्यम से स्वयंसेवकों का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास होता है। खेल, गीत, अनुशासन और बौद्धिक कार्यक्रमों के द्वारा उन्हें नेतृत्व, बंधुत्व, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा मिलती है।
शाखाओं के माध्यम से समाज का ऐसा संगठन खड़ा हुआ है कि देश में कहीं भी आपदा, संकट या विदेशी आक्रमण की स्थिति हो- संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा कार्य के लिए उपस्थित होते हैं। गुजरात के भुज में आए भूकंप से लेकर हाल की भीषण बाढ़ और कोरोना महामारी तक, स्वयंसेवकों ने भोजन, दवाइयाँ, परिवहन, रक्तदान से लेकर अंतिम संस्कार तक में निःस्वार्थ भाव से सेवा दी है। इससे पूर्व स्वतंत्रता संग्राम, गोवा मुक्ति आंदोलन, कश्मीर के भारत में विलय और 1962 के चीन आक्रमण जैसे ऐतिहासिक क्षणों में भी संघ की भूमिका उल्लेखनीय रही है।
शताब्दी वर्ष संघ की संकल्प यात्रा को और अधिक गति देने का अवसर है। वर्तमान में संघ ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्यों, सामाजिक समरसता और परिवार प्रबोधन जैसे विषयों को जन-जन तक पहुँचा रहा है। शताब्दी वर्ष पर कोई भव्य आयोजन करने के बजाय संघ हर नागरिक तक पहुँचकर उसे अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का बोध कराने में जुटा है। संघ का कार्यकर्ता होना, जीवन को राष्ट्र सेवा की दिशा में समर्पित कर देने की प्रक्रिया है। शाखा का संस्कार व्यक्ति में मातृभूमि के प्रति ऐसा प्रेम जगा देता है कि वह निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर राष्ट्र के लिए जीने-मरने को तैयार हो जाता है। स्वयंसेवक के लिए “भारत माता की जय” ही उसका परम ध्येय बन जाता है।
2026 में जब संघ का शताब्दी वर्ष पूर्ण होगा, तब लक्ष्य यही रहेगा कि प्रत्येक भारतीय राष्ट्रयज्ञ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाए, ताकि भारत पुनः विश्वगुरु के रूप में उभरे और पूरे विश्व का मार्गदर्शन कर सके।
हम सब भी इस राष्ट्र यज्ञ में अपने कर्तव्यों रूपी समिधा अर्पित करें
‘पूर्ण विजय संकल्प हमाराअनथक, अविरत साधना।निषिदिन, प्रतिपल चलती आयीराष्ट्रधर्म आराधना।’
आज जब भारत नए आत्मविश्वास और स्वाभिमान के साथ वैश्विक मंच पर खड़ा है, तब संघ की यह सौ वर्षीय यात्रा केवल एक संगठन की कथा नहीं, बल्कि उस विचार की गौरवगाथा है जिसने राष्ट्र को आत्मबोध, संगठन और संस्कृति की शक्ति से जोड़ा है।
इस अवसर पर प्रत्येक स्वयंसेवक और नागरिक को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह भारत माता को परम वैभव पर आसीन करने हेतु अपना समर्पण सुनिश्चित करेगा।
संघ शताब्दी वर्ष की समस्त स्वयंसेवकों और देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं।