ग्वालियर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अधिकारी किसी ओबीसी आवेदक के क्रीमीलेयर स्टेटस का फैसला सिर्फ उनके माता-पिता की कुल सैलरी के आधार पर नहीं कर सकते हैं। याचिकाकर्ता के पिता सिविल जज रहे हैं।
आवेदन पर फिर से करें विचार
एमपी हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि वे माता-पिता की नौकरी की स्थिति, पद की श्रेणी, प्रमोशन की तारीख और लागू सरकारी गाइडलाइंस की जांच करने के बाद ओबीसी जाति प्रमाण पत्र पर फिर से विचार करें।
याचिकाकर्ता ने दी थी आदेशों को चुनौती
दरअसल, जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने 29 सितंबर को रागिनी राठौर द्वारा मध्य प्रदेश सरकार और अन्य के खिलाफ दायर एक रिट याचिका पर यह आदेश दिया है। कोर्ट ने 2023 की उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें राठौर ने एसडीओ राजस्व, इशागढ़ द्वारा 23 अक्टूबर 2020 और अपर कलेक्टर, अशोकनगर द्वारा 29 नवंबर 2022 को जारी आदेशों को चुनौती दी थी। अधिकारियों ने उनके पिता की आय तय सीमा से ज्यादा होने के आधार पर उनके ओबीसी प्रमाण पत्र के दावे को खारिज कर दिया था।
40 की उम्र के बाद हुए थे प्रमोट
वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उनके पिता, जो शुरू में सिविल जज क्लास-2 के तौर पर नियुक्त हुए थे, 40 की उम्र के बाद 16 जून 2008 को सिविल जज क्लास-1 के पद पर प्रमोट हुए थे। यह भी बताया कि याचिकाकर्ता बेरोजगार थी और अपने माता-पिता पर निर्भर थी। अधिकारियों ने उनके पिता की नौकरी की प्रकृति और लागू सर्विस-कैटेगरी के मानदंडों की जांच नहीं की थी, बल्कि उनकी कुल सैलरी को ही निर्णायक कारक मान लिया था। पिता की सैलरी उस समय 16.99 लाख रुपए सलाना थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसला का हवाला दिया
हाईकोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम रोहित नाथन और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जो 11 मार्च 2006 को सुनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि क्रीमीलेयर स्टेट्स का निर्धारण सिर्फ आय के आधार पर नहीं किया जा सकता है। माता-पिता के पद का स्टेट्स और श्रेणी भी महत्वपूर्ण विचारणीय बातें हैं।
सुनीता यादव केस का भी दिया हवाला
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सुनीता यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य मामले में अपने ही फैसले का भी सहारा लिया है। यह 2 अप्रैल 2026 को सुनाया गया था। उस फैसले में मध्य प्रदेश सरकार के संबंधित सर्कुलर और क्रीमीलेयर निर्धारण से जुड़े सिद्धांतों की जांच की गई थी।