मानसून का यह मौसम अपने साथ बारिश की ठंडक के साथ-साथ कई तरह की गंभीर संक्रामक बीमारियों का खतरा भी लेकर आता है। इस वर्ष गुजरात राज्य में 'चांदीपुरा वायरस' के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की नींद उड़ा दी है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, कई बच्चों में इस खतरनाक संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है, और कुछ मौतों के मामले भी सामने आए हैं।

यह वायरस मुख्य रूप से 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपनी चपेट में अधिक लेता है और गंभीर मामलों में उनके मस्तिष्क (दिमाग) में सूजन जैसी जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है। शुरुआत में इसके लक्षण आम वायरल बुखार जैसे ही प्रतीत होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में मरीज की सेहत बहुत तेजी से बिगड़ने लगती है। ऐसे में इस बीमारी के बारे में सही जानकारी होना बेहद जरूरी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि चांदीपुरा वायरस क्या है, यह कैसे फैलता है, इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं और इससे बचाव के प्रभावी उपाय कौन-कौन से हैं।

क्या है चांदीपुरा वायरस?

चांदीपुरा वायरस 'रैबडोविरिडे' परिवार से ताल्लुक रखने वाला एक खतरनाक वायरस है। इसकी पहचान सबसे पहले वर्ष 1965 में महाराष्ट्र के चांदीपुरा गांव में की गई थी, और इसी गांव के नाम पर इसका नाम 'चांदीपुरा वायरस' रखा गया। यह मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करता है और गंभीर अवस्था में 'एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम' (AES) यानी मस्तिष्क ज्वर या दिमाग में सूजन का मुख्य कारण बन सकता है।

सरकार ने भेजी विशेष केंद्रीय टीम, बढ़ रहे हैं आंकड़े

गुजरात राज्य सरकार से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, इस मानसून सीजन में अब तक कुल 184 संदिग्ध मामलों में से 35 बच्चों में इस संक्रमण की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 22 मासूम बच्चों की जान जा चुकी है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने गुजरात के साथ-साथ राजस्थान में भी 'नेशनल जॉइंट आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम' (NJORT) को तैनात कर दिया है। इस विशेष टीम को ज़मीनी स्तर पर संक्रमण की स्थिति का सटीक आकलन करने और बीमारी पर काबू पाने के लिए राज्य सरकारों को हरसंभव तकनीकी व चिकित्सीय मदद उपलब्ध कराने के उद्देश्य से भेजा गया है।

इसके साथ ही, 'इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम' (IDSP) के तहत इस बीमारी की कड़ी निगरानी की जा रही है। 'नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल' (NCDC) राज्य की निगरानी इकाइयों के साथ मिलकर इस पूरी प्रक्रिया को संचालित कर रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय का मुख्य उद्देश्य इसके फैलने के तौर-तरीकों, संक्रमण के कारकों, मरीजों में उभरते लक्षणों और संभावित इलाज के विकल्पों को गहराई से समझना है, ताकि इसके आधार पर वैज्ञानिक रणनीति तैयार की जा सके।

यह वायरस कैसे फैलता है?

  • सैंड फ्लाई (रेत मक्खी): यह वायरस मुख्य रूप से 'सैंड फ्लाई' यानी रेतीली मक्खी के काटने से इंसानों में फैलता है।

  • अन्य कीट: कुछ वैज्ञानिक शोधों में मच्छरों और अन्य कीड़ों की संभावित भूमिका पर भी अध्ययन किए गए हैं, लेकिन इसका मुख्य वाहक रेतीली मक्खी को ही माना जाता है।

  • सावधानी: यह स्पष्ट किया गया है कि यह वायरस सामान्य मेल-जोल, साथ बैठने, हाथ मिलाने या किसी के साथ भोजन साझा करने से नहीं फैलता है।

चांदीपुरा वायरस के प्रमुख लक्षण

  • अचानक तेज बुखार आना

  • सिर में तेज दर्द होना

  • लगातार उल्टी होना

  • शरीर में अत्यधिक कमजोरी महसूस होना

  • शरीर में दौरे पड़ना

  • बेहोशी या भ्रम की स्थिति बन्ना

  • मस्तिष्क में सूजन के लक्षण दिखना

कितना खतरनाक है यह संक्रमण?

चांदीपुरा वायरस बेहद तेजी से असर दिखाने वाला संक्रमण है। इसके गंभीर मामलों में कुछ बच्चों की शारीरिक स्थिति महज 24 से 48 घंटों के भीतर बेहद गंभीर हो सकती है। यदि समय पर उचित चिकित्सीय उपचार न मिले, तो जटिलताएं जानलेवा साबित हो सकती हैं। इसलिए शरीर में कोई भी शुरुआती लक्षण नजर आते ही बच्चे को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाना अनिवार्य है।

इस बीमारी से बचाव के प्रमुख उपाय

  • बच्चों को सैंड फ्लाई (रेत मक्खी) और मच्छरों के काटने से पूरी तरह बचाएं।

  • बच्चों को हमेशा पूरी बांह के कपड़े पहनाएं ताकि शरीर ढका रहे।

  • सोने के समय मच्छरदानी का उपयोग करें और बच्चों पर कीटरोधी (मॉस्किटो रिपेलेंट) का इस्तेमाल करें।

  • अपने घर और आसपास के परिवेश में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।

  • कूलर, गमलों या आसपास पानी बिल्कुल जमा न होने दें, ताकि मक्खी-मच्छर न पनप सकें।

  • यदि बच्चे में तेज बुखार, दौरे आने या बेहोशी जैसे कोई भी संदिग्ध लक्षण दिखाई दें, तो बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

क्या इसका कोई विशेष इलाज या वैक्सीन उपलब्ध है?

वर्तमान समय में चांदीपुरा वायरस के संक्रमण के लिए कोई विशेष एंटीवायरल दवा या स्वीकृत वैक्सीन (टीका) बाजार में उपलब्ध नहीं है। इसका उपचार पूरी तरह से लक्षणों को नियंत्रित करने और मरीज को आवश्यक सपोर्टिव केयर (सहायक चिकित्सा) देने पर ही आधारित होता है। यही कारण है कि इस बीमारी से बचाव और समय पर अस्पताल पहुंचना ही सबसे बड़ा इलाज है।