भोपाल/दतिया, सबकी खबर। 
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस के हाथों मिली करारी हार के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शुरू हुआ सियासी घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। चुनाव परिणामों के तुरंत बाद भोपाल में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के बाद पार्टी ने ऐसा कड़ा और अभूतपूर्व एक्शन लिया है, जिसकी गूंज पूरे प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही है। 'सबकी खबर' के खास विश्लेषण और अंदरूनी सूत्रों के खुलासे के अनुसार, इस बार कार्रवाई केवल चंद नेताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि बूथ स्तर तक के पूरे ढांचे को ध्वस्त कर दिया गया है।
1100 नहीं, पूरे 8,000 कार्यकर्ताओं पर गिरी गाज!
शुरुआती रिपोर्ट्स में जिला संगठन के 1100 पदाधिकारियों पर गाज गिरने की बात सामने आ रही थी, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा बड़ी है। दतिया जिले में कुल 711 पोलिंग बूथ हैं, जहाँ हर बूथ पर 11-11 कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई थी। इसके अलावा सेवड़ा और भांडेर के भी बूथ समीकरणों को मिला लें, तो लगभग 7,500 से 8,000 बूथ-स्तरीय कार्यकर्ताओं और पूरी जिला कार्यकारिणी को एक झटके में भंग कर दिया गया है। राजनीतिक इतिहास में इसे भाजपा का सबसे कड़ा और अनोखा 'अनुशासनात्मक ओवरडोज' माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी अमूमन जीतने या हारने के बाद भी इस तरह का सामूहिक और व्यापक प्रशासनिक हंटर नहीं चलाती है।
क्या नरोत्तम मिश्रा पर होगी बड़ी कार्रवाई? तय माना जा रहा है नोटिस!
दतिया हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस पराजय का पूरा ठीकरा पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पर फोड़ा जा रहा है? विश्लेषकों का मानना है कि हाँ, पार्टी ने संकेतों ही संकेतों में उन्हें इसके लिए जिम्मेदार मान लिया है।सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आया है कि भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी ने पार्टी नेतृत्व के सामने कुछ ऑडियो-वीडियो और डिजिटल साक्ष्य पेश किए हैं, जिनमें कथित तौर पर भीतरघात के संकेत हैं। इन सबूतों के आधार पर नरोत्तम मिश्रा को जल्द कारण बताओ नोटिस जारी किया जाना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, उनके कद को देखते हुए एकदम से सीधे निलंबन जैसे बड़े कदम से पहले पार्टी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
मंत्री एयर कंडीशन कमरों में बैठे रहे, जनता और कार्यकर्ता हुए नाराज
इस पूरे घटनाक्रम पर वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। चर्चा इस बात की भी जोरों पर है कि चुनाव के दौरान जिन 6 मंत्रियों को अलग-अलग सेक्टरों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे धरातल पर उतरने के बजाय एयर-कंडीशन कमरों में बैठकर औपचारिकता निभाते रहे। जनता और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ रही इस दूरी और असंतोष ने पार्टी को यह करारा परिणाम दिखाया है।
सत्ता बनाम संगठन की पुरानी परंपरा पर बहस तेज
इस पूरी कार्रवाई को अंजाम देने वाले भाजपा के प्रदेश महामंत्री हेमंत खंडेलवाल की कार्यशैली की चर्चा हर तरफ है। जानकारों का कहना है कि उन्होंने पार्टी के अनुशासन का कड़ा संदेश तो दे दिया है, लेकिन क्या मुख्यमंत्री आवास पर समीक्षा बैठकें होना (जो कि पार्टी कार्यालय में होनी चाहिए थीं) सत्ता और संगठन के बीच की उस लक्ष्मण रेखा को धुंधला नहीं कर रहा, जो कभी कुशाभाऊ ठाकरे और विजयाराजे सिंधिया के दौर में हुआ करती थी? दतिया के इस राजनीतिक भूचाल ने मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़े फेरबदल के संकेत दे दिए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यह 'ओवरडोज़' दवा का काम करेगा या पार्टी के भीतर असंतोष की आग को और भड़काएगा।