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न्यूनतम समर्थन मूल्य की पालिसी को सीमित कीजिये

By Sabkikhabar :30-01-2019 07:40


किसान की आय बढ़ाने के लिए फसलों के उत्पादन और मूल्य को बढ़ाने की नीति घातक है चूँकि देश के पास इतना पानी ही नहीं है। अत: हमको उत्पादन घटाकर किसान की स्थिति में सुधार लाना होगा।  इसके लिए हर किसान, चाहे वह युवा हो या वृद्ध, उसे एक निश्चित रकम पेंशन के रूप में हर वर्ष दे दी जानी चाहिए और इसके बाद उसे बाजार भाव पर फसलों के उत्पादन करने के लिए छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से किसान खुश होगा क्योंकि उसे एक निश्चित रकम नगद में मिल रही होगी और देश की कृषि व्यवस्था भी ठीक हो जाएगी चूँकि अधिक उत्पादन के निस्तारण की समस्या से हमें छुट्टी मिल जाएगी।

देश के किसानों की हालत सुधरती नहीं दिख रही है। सरकार का प्रयास है कि तमाम फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों को बढ़ाकर किसानों की आय में वृद्धि की जाए लेकिन किसान की हालत सुधर नहीं रही है। समर्थन मूल्य बढ़ाये जाने के बावजूद कुछ फसलों के बाजार में दाम न्यून बने हुए हैं। दूसरी फसलों के समर्थन मूल्य बढ़ कर मिल रहे हैं परन्तु बहुत विलम्ब से। इन फसलों का उत्पादन बढ़ने से भण्डारण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। इसका एक उदाहरण गन्ने का है। गन्ने का उत्पादन बढ़ने से देश में चीनी का उत्पादन बढ़ रहा है जिसे चीनी कम्पनियां बेच नहीं पा रही हैं। वे किसानों को गन्ने का पेमेंट नहीं कर पा रही हैं। आइये इस समस्या के कथित हलों पर नजर डालें।

एक प्रस्तावित हल है कि चीनी के अधिक उत्पादन का निर्यात कर दिया जाए। यहां समस्या यह है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीनी का दाम भारत की तुलना में कम है चूँकि भारत में गन्ने का दाम लगभग 300 रुपया प्रति च्ंिटल यानि 43 डालर प्रति टन है जबकि अमरीका में गन्ने का दाम 31 डालर प्रति टन है। तदनुसार विश्व बाजार में चीनी के दाम भी कम हैं। ऐसे में सरकार को गन्ने के बढ़े हुए उत्पादन से बनी चीनी का निर्यात करने को दोहरी सब्सिडी देनी पड़ेगी। पहले सस्ती बिजली एवं सस्ते फर्टिलाइजर देकर हम गन्ने का उत्पादन बढ़ाएंगे। इसके बाद इस बढ़े हुए चीनी के उत्पादन का निर्यात करने के लिए दोबारा उस पर निर्यात सब्सिडी देंगे। यह इस प्रकार हुआ कि हम बाजार से एक कट्टा आलू घर लाये और उसके बाद कुली को पैसा दिया कि इसे कूड़ेदान में डाल आओ। इस प्रकार गन्ने के उत्पादन की वृद्धि का कोई औचित्य नहीं है।

समस्या का दूसरा हल यह सुझाया जा रहा है कि ब्राजील की तरह से गन्ने का उपयोग एथनाल या डीजल बनाने को कर लिया जाये। ब्राजील ने इस पालिसी को बखूबी अपनाया है। वहां जब विश्व बाजार में चीनी के दाम अधिक होते हैं तो गन्ने से चीनी का उत्पादन किया जाता है और उस चीनी को ऊँचे दामों पर निर्यात कर दिया जाता है। इसके विपरीत जब विश्व बजार में चीनी के दाम कम होते हैं तो उसी गन्ने से एथनाल का बनाया जाता है। एथनाल का उपयोग डीजल की तरह कार चलने के लिए किया जा सकता है। एथनाल का उत्पादन करके ब्राजील द्वारा इंधन तेल का आयात कम कर दिया जाता है। ब्राजील अपनी इंधन की जरुरतों को एथनाल से पूरा कर लेता है। इस प्रकार ब्राजील गन्ने के उत्पादन को लगातार बढ़ाता जा रहा है और जरुरत के अनुसार उससे चीनी अथवा एथनाल बना रहा है।

इस पालिसी को भारत में भी लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन ब्राजील और भारत की परिस्थिति में मौलिक अन्तर है। ब्राजील में प्रति वर्ग किमी भूमि पर औसतन 33 व्यक्ति रहते हैं जबकि भारत में 416 व्यक्ति। ब्राजील में औसतन 1250 मिलीमीटर वर्षा एक साल में पड़ती है जबकि हमारे यहां केवल 500 मिलीमीटर। इस प्रकार भारत में जनसंख्या का दबाव लगभग बारह गुना है जबकि बरसात आधे से भी कम। ऐसी परिस्थिति में हमारे यहां हमारे लिए गन्ने का उत्पादन लगातार बढ़ाना घातक होगा। देश के भूमिगत जल का स्तर वर्तमान में ही लगातार गिरता जा रहा है क्योंकि हम गन्ने जैसी फसलों का उत्पादन करने के लिए भूमिगत जल का अधिक दोहन कर रहे हैं। ऐसे में गन्ने का उत्पादन बढ़ा कर एथनाल बनाने से भूमिगत जल का स्टार और तेजी से गिरेगा। हमारी दीर्घकालीन कृषि व्यवस्था चरमरा जाएगी क्योंकि भूमिगत जल का भंडार हमें जो विरासत में प्राप्त हुआ है वह समाप्त हो जाएगा। इसके बाद गेंहूँ और चावल का उत्पादन करना भी कठिन हो जाएगा। इसलिए हमको ब्राजील की गन्ने के उत्पादन को बढ़ाने की नीति को नहीं अपनाना चाहिए। 

समस्या का तीसरा उपाय यह बताया जा रहा है कि फूड कारपोरेशन द्वारा चीनी के अधिक उत्पादन को बंफर स्टॉक या भंडार के रूप में खरीदकर रख लिया जाए। वर्ष 2018 में फ़ूड कारपोरेशन के पास 10 मिलियन टन चीनी का स्टॉक पहले ही था। वर्ष 2017-18 में हमारा चीनी का उत्पादन 36 मिलियन टन का है जबकि खपत लगभग 26 मिलियन टन की है। अत: दस मिलियन टन का भंडार और बढ़ जायेगा। यदि हर वर्ष गन्ने और चीनी का उत्पादन बढ़ाते रहे तो हर वर्ष फ़ूड कारपोरेशन को दस मिलियन टन चीनी खरीद कर भंडारण करना पड़ेगा। यह सिलसिला जादा दिन जारी नहीं रह सकता है।  हमारे लिए एकमात्र उपाय यह है कि हम गन्ने का उत्पादन कम करें। कमोबेस यही पालिसी दूसरी फसलों पर भी लागु होती है। गेंहंू का उत्पादन बाधा कर हमें कुछ वर्ष पूर्व उसका भी निर्यात करने के लिए सोचना पड़ा था।

न्यूनतम समर्थन मूल्य का उद्देश्य देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। इसके लिए गेंहूँ और धान की फसलों मात्र पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाना चाहिए जिससे कि देश की जरूरत के लिए इन मूल फसलों का पर्याप्त उत्पादन हो। शेष फसलों जैसे सरसों, गन्ना इत्यादि पर समर्थन मूल्य की व्यवस्था को हटा देना चाहिए। ऐसा करने से गन्ने का दाम जो वर्तमान में 300 रुपये प्रति क्विंटल  है वह घटकर लगभग 200 रुपये प्रति क्विंटल हो जायेगा जो कि अंतर्राष्ट्रीेय दाम के बराबर होगा। तब किसानो द्वारा गन्ने का उत्पादन कम किया जायेगा, फैक्ट्रियों द्वारा चीनी का उत्पादन कम किया जाएगा और चीनी के अतिरिक्त उत्पादन के निस्तारण की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी। साथ साथ पानी का जो अति दोहन हो रहा है उससे भी हम छुटकारा पाएंगे। बिजली और फर्टिलाइजर पर सरकार जो सब्सिडी दे रही है और पुन: निर्यात के लिए जो सब्सिडी दे रही है उससे भी देश की अर्थव्यवस्था को छुट्टी मिल जाएगी। 

किसान की आय बढ़ाने के लिए फसलों के उत्पादन और मूल्य को बढ़ाने की नीति घातक है चूँकि देश के पास इतना पानी ही नहीं है। अत: हमको उत्पादन घटाकर किसान की स्थिति में सुधार लाना होगा।  इसके लिए हर किसान, चाहे वह युवा हो या वृद्ध, उसे एक निश्चित रकम पेंशन के रूप में हर वर्ष दे दी जानी चाहिए और इसके बाद उसे बाजार भाव पर फसलों के उत्पादन करने के लिए छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से किसान खुश होगा क्योंकि उसे एक निश्चित रकम नगद में मिल रही होगी और देश की कृषि व्यवस्था भी ठीक हो जाएगी चूँकि अधिक उत्पादन के निस्तारण की समस्या से हमें छुट्टी मिल जाएगी। भूमिगत जल का अति दोहन बंद हो जायेगा और हमारा भविष्य खतरे में नहीं पड़ेगा।
 

Source:Agency