Breaking News

Today Click 367

Total Click 448325

Date 18-04-19

स्टील फ्रेम ब्रेक्जिट डील का टूटना

By Sabkikhabar :19-01-2019 08:54


ब्रिटेन में जो बदलाव आने की सम्भावना है उससे दुनिया पर असर न पड़े ऐसा हो नहीं सकता। सभी को अपनी चिंता है। सवाल तो यह भी है कि आखिर किसी संघ का निर्माण क्यों होता है और उससे क्या अपेक्षाएं होती हैं? क्या ब्रिटेन की अपेक्षाओं पर यूरोपीय संघ खरा नहीं उतरा? जाहिर है इसकी भी जांच-पड़ताल समय के साथ और होगी पर तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटेन को ही नहीं भारत को भी संतुलित वैश्विक आर्थिक नीति पर काम करने की अधिक आवश्यकता पड़ सकती है। 

पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटेन 1973 में 28 सदस्यीय यूरोपीय संघ का सदस्य बना था जिसे इसी साल 29 मार्च को इस संघ से अलग होना है। अधिक से अधिक इस तारीख को 30 जून तक ही बढ़ाया जा सकता है। जब दुनिया का कोई संघ या देश नये परिवर्तन और प्रगति की ओर चलायमान होता है तो उसका सीधा असर वहां की सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक परिवेश पर तो पड़ता ही है साथ ही किसी भी अक्षांश और देशांतर जटिल दुनिया पर भी पड़ना स्वाभाविक है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरेसा का यूरोपीय संघ से अलग होने सम्बंधी ब्रेक्जाट समझौता ब्रिटिश संसद में पारित नहीं हो सका। स्थिति को देखते हुए अब टेरेसा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा की गयी है। गौरतलब है कि टेरेसा के समझौते को हाउस ऑफ कॉमन्स में 432 के मुकाबले 202 मतों से हार का सामना करना पड़ा जिसे आधुनिक इतिहास में ब्रिटिश प्रधानमंत्री की सबसे करारी हार के रूप में देखा जा रहा है।

नतीजे के तुरन्त बाद विपक्षी लेबर पार्टी के नेता ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा की। ब्रेक्जिट की कहानी आगे क्या मोड़ लेने वाली है यह मंजे हुए जानकार भी अंदाजा नहीं लगा पा रहे हैं। ब्रेक्जाट कितना जटिल होता जा रहा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2016 में प्रधानमंत्री डेविड कैमरून और तीन मंत्रियों की अब तक यह कुर्सी छीन चुका है। दो साल पहले ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने के लिए जनमत संग्रह पर मुहर लगाई थी। 23 जून 2016 को यह जनमत संग्रह हुआ था जिसमें 52 फीसदी लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने तो 48 फीसदी ने साथ रहने के पक्ष में अपना मतदान दिया था। राजधानी लंदन में ज्यादातर लोगों का मत यूरोपीय यूनियन के साथ रहने का था जबकि देश के बाकी हिस्से मसलन पूर्वोत्तर इंग्लैण्ड, वेल्स, मिडलैण्ड्स आदि इसके विरोध में थे। 

सवाल है कि टेरेसा का ब्रेक्जाट समझौता फेल होने पर अगला कदम क्या होगा। जाहिर है अब टेरेसा प्लान बी पर काम करेंगी। दरअसल ब्रिटेन की संसदीय प्रक्रिया में यह निहित है कि जब सांसद कोई विधेयक खारिज कर देते हैं तो प्रधानमंत्री के पास दूसरी योजना के साथ संसद में आने के लिए तीन कामकाजी दिन होते हैं। अनुमान है कि ब्रूसेल्स जाकर यूरोपीय यूनियन से और रियायत लेने की कोशिश करेंगी और नये प्रस्ताव के साथ ब्रिटेन की संसद में आयेंगी तब सांसद इस पर भी मतदान करेंगे। यदि यह प्रस्ताव भी असफल रहता है तो सरकार के पास एक अन्य विकल्प के साथ लौटने के लिए तीन सप्ताह का समय होगा। यदि यह समझौता भी संसद में पारित नहीं होता है तो ब्रिटेन बिना किसी समझौते के ही यूरोपीय यूनियन से बाहर हो जायेगा।

गौरतलब है कि टेरेसा की पार्टी कन्जर्वेटिव के 100 से अधिक सांसदों ने समझौते के विरोध में मतदान किया। ऐसे में इस हार के साथ ही ब्रेक्जाट के बाद यूरोपीय यूनियन से निकट सम्बंध बनाने की प्रधानमंत्री टेरेसा की रणनीति का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है। जाहिर है ब्रिटेन में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है। पड़ताल से यह भी साफ है कि ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन को अचानक अलविदा नहीं कहा है। इसके पीछे बरसों से कई बड़े कारण रहे हैं जिसमें ब्रिटेन में बढ़ रहा प्रवासीय संकट मुख्य वजहों में एक रही है। दरअसल ईयू में रहने के चलते प्रतिदिन 500 से अधिक प्रवासी दाखिल होते हैं जबकि पूर्वी यूरोप के 20 लाख से अधिक लोग ब्रिटेन में बाकायदा रह रहे हैं। ब्रिटेन में बढ़ती तादाद के चलते ही यहां बेरोजगारी जैसी समस्या भी पनपी है। ईयू से अलग होने के बाद इन पर रोक लगाना सम्भव होगा। साथ ही कई अपराधी प्रवासियों पर भी लगाम लगाया जा सकेगा। इतना ही नहीं, सीरिया जैसे देशों में जारी संकट के चलते भी यहां जो दिक्कतें बढ़ती हैं उससे निपटना आसान हो जायेगा।

दरअसल ब्रेक्जाट की तारीख करीब आती जा रही है और ब्रिटेन सरकार में इस पर कोई सहमति नहीं बन पा रही है। कहा जाय तो सरकार दुविधा और सुविधा के बीच फंसी हुई है। दो टूक यह भी है कि प्रधानमंत्री टेरेसा का रूख ब्रेक्टजा को लेकर लचीला है और वह सेमी ब्रेक्जाट की ओर बढ़ना चाहती है जिसका तात्पर्य है कि ईयू से अलग होने के बाद ब्रिटेन ईयू की शर्तें मानता रहेगा और बाहर रहकर उसके साथ बना रहेगा। ऐसा करने से ब्रिटेन अपने आर्थिक हितों और रोजगार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बाहर जाने से बचा सकेगा पर इसकी सम्भावना कम ही है। गौरतलब है कि ईयू से अलग होने से ब्रिटेन को सालाना एक लाख करोड़ रुपए की बचत भी होगी जो उसे मेम्बरशिप के रूप में चुकानी होती है। खास यह भी है कि ब्रिटेन के लोगों को ईयू अफसरशाही भी पसंद नहीं आती। कईयों का मानना है यहां उनकी तानाशाही चलती है। केवल कुछ नौकरशाह मिलकर 28 देशों का भविष्य तय करते हैं जो बर्दाश्त नहीं है। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के लिए करीब 10 हजार अफसर काम करते हैं और मोटी सैलरी लेते हैं। इन सबके अलावा मुख्य व्यापार को बाधित होना भी रहा है। ईयू से अलग होने के बाद अमेरिका और भारत जैसे देशों से ब्रिटेन को मुक्त व्यापार करने की छूट होगी। भारत का सबसे ज्यादा कारोबार यूरोप के साथ है।

केवल ब्रिटेन में ही 800 से अधिक भारतीय कम्पनियां हैं जिसमें एक लाख से अधिक लोग काम करते हैं। भारतीय आईटी सेक्टर की 6 से 18 फीसदी कमाई ब्रिटेन से ही होती है। ब्रिटेन के रास्ते भारतीय कम्पनियों की यूरोपीय संघ के इन 28 देशों के 50 करोड़ लोगों तक पहुंच होती है। सम्भव है कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने पर यह पहुंच आसान नहीं रहेगी। इतना ही नहीं 50 फीसदी से अधिक कानून ब्रिटेन में ईयू के लागू होते हैं जो कई आर्थिक मामलों में किसी बंधन से कम नहीं है। उक्त तमाम के चलते ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग होना चाहता है।
ब्रिटेन के ईयू से बाहर होने के फैसले का असर उसकी अर्थव्यवस्था पर भी दिख रहा है। पिछले साल उसकी वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था में मामूली गिरावट आई थी। फिलहाल कम्पनियां निवेश को लेकर अधिक सतर्कता बरत रही हैं। प्रापर्टी का बाजार भी ठण्डा बताया जा रहा है। ब्रितानियों का आरोप है कि सरकार को जिस तरह इस पर आगे बढ़ना चाहिए वह उस पर आगे नहीं बढ़ रही है। जून 2016 के जनमत संग्रह के बाद पाउण्ड में भी 15 प्रतिशत की गिरावट आई थी इससे उपभोक्ताओं और कम्पनियों के लिए आयात महंगा हो गया था।

गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए यूरोपीय संघ का निर्माण हुआ था जिसके पीछे सोच थी कि जो देश एक साथ व्यापार करेंगे वे एक-दूसरे के साथ युद्ध करने से बचेंगे। यूरोपीय संघ की मुद्रा यूरो जिसे 19 देश  इस्तेमाल करते हैं इसकी अपनी संसद भी है। यह संघ कई क्षेत्रों में अपने नियम बनाता है जिसमें पर्यावरण, परिवहन, उपभोक्ता अधिकार और मोबाइल फोन की कीमतें तक तय होती हैं। फिलहाल ब्रिटेन में जो बदलाव आने की सम्भावना है उससे दुनिया पर असर न पड़े ऐसा हो नहीं सकता। सभी को अपनी चिंता है। सवाल तो यह भी है कि आखिर किसी संघ का निर्माण क्यों होता है और उससे क्या अपेक्षाएं होती हैं? क्या ब्रिटेन की अपेक्षाओं पर यूरोपीय संघ खरा नहीं उतरा? जाहिर है इसकी भी जांच-पड़ताल समय के साथ और होगी पर तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटेन को ही नहीं भारत को भी संतुलित वैश्विक आर्थिक नीति पर काम करने की अधिक आवश्यकता पड़ सकती है। 

Source:Agency