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हड़ताल बेअसर रही, सवाल नहीं

By Sabkikhabar :11-01-2019 07:51


नया साल आते ही उम्मीदें की जाती हैं कि हर बात में नयापन दिखेगा। काम में नया जोश, जिंदगी के लिए नई उम्मीदें, बेहतर भविष्य के लिए नए संकल्प। लेकिन भारत की इस वक्त जो तस्वीर है, उसमें ऐसा नहीं लगता। नए साल के दूसरे सप्ताह में ही बढ़ते आर्थिक संकट, मूल्य वृद्धि और जबरदस्त बेरोजगारी के खिलाफ ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी, असंगठित क्षेत्र के कामगार, बंदरगाह कर्मचारी, बैंक एवं बीमा कर्मचारी, और किसान 8-9 जनवरी को देशव्यापी हड़ताल पर रहे।

आरएसएस से जुड़ा मजदूर यूनियन भारतीय मजदूर संघ यानी बीएमएस इस हड़ताल में शामिल नहीं था, लेकिन एटक, इंटक, एचएमएस, सीटू, एआईटीयूसी, टीयूसीसी, सेवा,एआईसीसीटीयू, एलपीएफ और यूटीयूसी जैसे श्रमिक संगठन हड़ताल में साथ थे। इनका दावा है कि देश भर के करीब 20 करोड़ मजदूर हड़ताल में शामिल रहे और इन्हें अन्य संगठनों का समर्थन मिला। हड़ताली यूनियनों का आरोप है कि सरकार ने श्रमिकों के मुद्दों पर उनकी 12 सूत्री मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया है। उनका यह भी कहना है कि श्रम मामलों पर वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में गठित मंत्रियों के समूह ने दो सितंबर 2015 के बाद यूनियनों को वार्ता के लिए एक बार भी नहीं बुलाया है। ये यूनियनें श्रम संघ कानून 1926 में प्रस्तावित संशोधनों का भी विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि इन संशोधनों के बाद यूनियनें स्वतंत्र तरीके से काम नहीं कर सकेंगी।

लेकिन हैरत की बात ये है कि जिस दिन ये संगठन हड़ताल पर थे, उस दिन यानी मंगलवार को संसद में ट्रेड यूनियन संशोधन विधेयक 2019 पेश कर दिया जिसमें 1926 के कानून में संशोधन का प्रावधान है। इस विधेयक में नीति निर्माण में श्रमिक संगठनों की भागीदारी के लिए कानूनी रूपरेखा बनाने का प्रावधान है और ट्रेड यूनियन्स इसका विरोध कर रहे हैं। हालांकि विधेयक को इस तरह हड़बड़ी में पेश किए जाने पर वामदलों के सांसदों ने विरोध भी जताया, लेकिन यह दो दिनों की हड़ताल की तरह बेअसर ही रहा। आमतौर पर हड़ताल, बंद या चक्काजाम जैसी स्थितियों में जनजीवन बुरी तरह प्रभावित होता है। पर अब समय बदल गया है।

औद्योगिक क्रांति से निकल दुनिया तकनीकी क्रांति के युग में पहुंच चुकी है। और पूंजीवाद के नए अवतार मुक्त व्यापार और भूमंडलीकरण के कारण दुनिया में बहुत कुछ बदल गया है। अब मानवशक्ति से अधिक मशीन, खासकर कंप्यूटर की शक्ति प्रभावी हो गई है। एक दिन में 20 करोड़ मजदूर काम न करें, इस स्थिति का सामना करने में कठिनाई नहीं होती, लेकिन 20 हजार कंप्यूटर सिस्टम बंद हो जाएं, तो हाहाकार मच जाएगा। कहने का आशय यह कि नए दौर में संघर्ष तो वही पुराना है, लेकिन उसे प्रकट करने का तरीका अब शायद बदलना पड़ेगा। बैंक कर्मचारी हड़ताल पर गए, लेकिन बैंकों के कम्प्यूटर सिस्टम 24 घंटे काम करते हैं, इसलिए अब बंद या हड़ताल जैसे तरीकों का असर उतना नहीं पड़ता। दूसरी बात आम जनता के सरोकार भी अब शायद बदल रहे हैं।

पहले स्थानीय पीड़ा की वैश्विक अभिव्यक्ति होती थी, यानी दूसरों के दुख-दर्द, तकलीफों से समाज प्रभावित होता था, अब वह भी आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है, अपने स्मार्टफोन में सिर झुकाए, अपनी ही दुनिया में मगन। इस समाज का ध्यान बीते दो दिनों में मजदूर यूनियनों की दो दिनों की हड़ताल पर नहीं था, इस बात पर था कि संसद में सवर्ण आरक्षण बिल पारित होता है या नहीं। सरकार भी समाज की नब्ज अच्छे से पहचानती है कि उसकी दिलचस्पी किन मुद्दों पर है। लिहाजा वह भी इस हड़ताल से बेपरवाह दिखी।

 बेशक समाज के एक बड़े तबके की दिलचस्पी सवर्ण आरक्षण विधेयक में थी, क्योंकि उसके हित इस विधेयक से जुड़े हैं, ऐसा उसका मानना है। लेकिन उसी समाज को इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि उसके आसपास की दुनिया में गरीब मजदूर, किसान, असंगठित क्षेत्र के मजदूर, कर्मचारी किन स्थितियों में रह रहे हैं, उनकी चिंताएं क्या हैं, वे सरकार से क्या चाहते हैं, और सरकार उनकी बातों को न सुनकर किनकी बातें सुन रही है, मान रही है। सरकार यह सोचकर निश्चिंत हो सकती है कि दो दिनों की हड़ताल का कोई खास असर नहीं दिखा, लेकिन समाज को यह जरूर विचार करना चाहिए कि हड़ताल भले ही बेअसर रही हो, लेकिन जिन सवालों पर हड़ताल की गई थी, वे अब भी वहीं के वहीं हैं और उनका असर आने वाले समय में बढ़ सकता है। 
 

Source:Agency