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अयोध्या विवाद : असली सवाल तार्किक परिणति का

By Sabkikhabar :31-12-2018 08:41


 न्यायालय की सुनवाई करने वाली पीठ के निर्णय के बाद ही विवाद के भविष्य के स्वरूप और उसकी सुनवाई की तिथियों पर भी फ ौरी निर्णय होंगे। आस्थाओं और विश्वासों का खयाल रखने के आग्रह को किस रूप में ले, समूहगत माने या व्यक्तिगत या तिथियों के निर्धारण का आधार क्या रखे, इन सारे बिन्दुओं के साथ ही न्यायालय को यह भी निर्णय करना होगा कि सरकार पर अध्यादेश लाकर या कानून बनाकर विवादित स्थल को तुरंत मन्दिर निर्माण के लिए सौंप देने के दबाव को किस रूप में ले? इसके लिए अपनाए जा रहे आन्दोलनात्मक रुख को न्यायालय को प्रभावित करने वाला कदम माने या नहीं? 

सवाल केन्द्रीय विधिमंत्री रविशंकर प्रसाद ने, जो वरिष्ठ अधिवक्ता भी हैं, सर्वोच्च न्यायालय से अयोध्या के राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के शीघ्र फैसले का आग्रह किया है। उनका कहना है कि यह मामला हिन्दुओं की भावनाओं से जुड़ा हुआ है और इसके फैसले में विलम्ब से असंतोषों का जन्म हो रहा है। उनका यह दृष्टिकोण ऐसे वक्त सामने आया है, जब न्यायालय ने यह तय करने के लिए कि विवाद की सुनवाई कब हो, चार जनवरी की तिथि निर्धारित कर रखी है और उस दिन सभी सम्बद्ध पक्षों को बुलाया है।

इधर यह प्रश्न बार-बार और तेजी से उठाया जा रहा है कि इस विवाद का निपटारा लोगों की भावनाओं के अनुरूप हो। इसके लिए अयोध्या, दिल्ली, प्रयागराज और अन्य स्थानों पर साधु-सन्तों की धर्म सभाएं हुईं या होने वाली हैं। इन सारी कवायदों से विवाद के निर्णय के प्रति आतुरता स्पष्ट दिखायी देती है। इस सम्बन्ध में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि न्याय में विलम्ब वास्तव में अन्याय का ही परिचायक है। 
हम जानते हैं कि 1949 में यह प्रकरण विवादित ढांचे में रामलला विराजमान के प्रकट्य होने के साथ अस्तित्व में आया और तभी न्यायालय में भी गया। तब विवादित ढांचे व स्थल को जाब्ता फ ौजदारी की धारा-145 के तहतं कुर्क करके स्वामित्व के निर्णय के लिए धारा-146 के तहत सिविल कोर्ट को सौंप दिया गया था। तभी से यह सुलझने को नहीं आ रहा। भले ही इस इसका स्वरूप बदलता गया है। 

1992 में छह दिसम्बर को विवादित ढांचे के ध्वंस के वक्त उसके अन्दर रखी मूर्तियां मूल स्थान से हटा दी गयी थीं और अगले दिन सात दिसम्बर को तब वहां फिर से पहुंचाई गईं, जब क्षेत्र राष्ट्रपति शासन के अन्तर्गत था। तभी वहां अस्थाई मंदिर का निर्माण भी हुआ। तब केन्द्र सरकार ने रामलला विराजमान की पूजा और भोग-राग की सरकारी व्यवस्था भी बन्द कर दी थी, जो बाद में सर्वोच्च न्यायालय की सहमति के बाद पुन: आरम्भ हुई। 

विवाद में यह तथ्य भी गौरतलब है कि अतीत में रामलला विराजमान को न्यायिक पक्ष बनाने के लिए उनके निकटतम मित्र जस्टिस देवकीनन्दन अग्रवाल को पक्ष बनाया गया तो उसका आधार यह था कि रामलला प्रकट नहीं हुए, बल्कि निर्मोही अखाड़े द्वारा राम चबूतरे पर स्थापित मूर्तियों में से इस स्थल पर लाकर उन्हें विधिवत प्राण प्रतिष्ठित व स्थापित किया गया था। इसलिए न्यायिक व्यक्ति की अवधारणा के अनुसार वे भी विवाद के पक्ष हैं, जिन्हें मुकदमे में सुना जाना चाहिए।  इस प्रकार हिन्दू व मुस्लिम पक्षों के अतिरिक्त रामलला विराजमान भी विवाद के तीसरे पक्ष  हैं, जिन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने विवादित स्थल के बंटवारे के अपने बहुप्रचारित फैसले में उसका एक तिहाई भाग दे रखा है। उनका यह हिस्सा वे जहां विद्यमान हैं, वहीं से शुरू होगा। जाहिर है कि वे भी, जिन्हें उनके मित्रों ने विधिवत स्थापित किया था, विवाद का महत्वपूर्ण पक्ष हैं। यह बात उस अवधारणा के विपरीत भी है, जिसमें कहा जाता है कि 22-23 दिसम्बर की रात रामलला विराजमान वहां प्रकट हुए थे?

इधर इस सारे विवाद के सन्दर्भ में जिस तरह फि र से आस्थाओं व विश्वासों से जोड़ा जा रहा है, इस सवाल का जवाब जरूरी हो गया है कि इसका फैसला लोगों की आस्था और भावनाओं के अनुसार हो या पाकिस्तान की उस नजीर के अनुसार, जिसमें 100 साल पहले लाहौर में एक मस्जिद गिराकर बनाया गया गुरुद्वारा वहां इस्लामी शासन होने और सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमा लड़े जाने के बाद भी यथावत विद्यमान है क्योंकि कानून उसको फि र से मस्जिद में बदलने की इजाजत नहीं देता। 

पाकिस्तान के विपरीत भारतीय राज्य धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों पर संचालित होता है और उसके संविधान में सरकारों को लोगों की आस्था व विश्वास के प्रश्नों पर दखल देने का अधिकार नहीं है। तिस पर आस्था और विश्वास के अधिकार व उनकी गारंटी समूहों की नहीं बल्कि व्यक्तियों की हैं। उन्हें किसी समूह के हितों की रक्षा से नहीं जोड़ा जा सकता। ऐसे में बताने की भी जरूरत नहीं कि व्यक्तिपरक अधिकारों के लिए लड़ाई का आधार भी व्यक्ति ही होगा, समूह नहीं।

याद रखने की बात है कि यह विवाद 64 वर्षों से विभिन्न न्यायालयों में भटकता हुआ सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा है। इसमें हिन्दू, मुस्लिम और रामलला इन तीन पक्षों के अतिरिक्त अन्य लोगों ने भी अपीलें दायर कर रखी हैं। उनकी सुनवाई भी होगी ही। सवाल है कि रामलला विराजमान की विधिक स्वीकार्यता का औचित्य निर्धारित करते समय उसे आस्थाओं और विश्वासों से जोड़ा जायेगा तो क्या वह न्यायसंगत अवधारणा होगी? इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने विवाद की भूमि विवाद के रूप में ही सुनवाई का निर्देश दिया था। 

अभी भी उस स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। अलबत्ता,इस बीच विवाद में दिलचस्पी रखने वालों द्वारा दो तरह की सम्मतियां दी जा रही हैं। एक यह कि इसे आस्था व विश्वास के आधार पर फैसले की श्रेणी में रखा जाये और दूसरी यह कि इसे भू-स्वामित्व का विवाद ही माना जाये। अब सर्वोच्च न्यायालय को ही तय करना है कि इसकी सुनवाई में वह किसी पक्ष की इच्छा या सरकार की सलाह पर तकिया रखेगा या सुनिश्चित करेगा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कोई चोट न पहुंचे। न्यायालय की सुनवाई करने वाली पीठ के निर्णय के बाद ही विवाद के भविष्य के स्वरूप और उसकी सुनवाई की तिथियों पर भी फ ौरी निर्णय होंगे। आस्थाओं और विश्वासों का खयाल रखने के आग्रह को किस रूप में ले, समूहगत माने या व्यक्तिगत या तिथियों के निर्धारण का आधार क्या रखे, इन सारे बिन्दुओं के साथ ही न्यायालय को यह भी निर्णय करना होगा कि सरकार पर अध्यादेश लाकर या कानून बनाकर विवादित स्थल को तुरंत मन्दिर निर्माण के लिए सौंप देने के दबाव को किस रूप में ले? इसके लिए अपनाए जा रहे आन्दोलनात्मक रुख को न्यायालय को प्रभावित करने वाला कदम माने या नहीं? 

प्रसंगवश, संविधान में कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका को ऐसी स्वतंत्रताएं दी गयी हैं जिससे उनके निर्णय भय और दबाव से मुक्त रह सकें। इसलिए चार जनवरी को विवाद की सुनवाई की तारीखें तय करने से जुड़ी एक बात यह भी है कि जो निर्धारण हो, वह राजनीतिक रूप से किसी को लाभ और किसी को नुकसान पहुंचाने वाला हो या न्यायिक भावना की रक्षा के लिए? राजनीति और उससे जुड़े लोग इसे जिन भी रूपों में देखते हों, लेकिन अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक जैसे विभाजन अन्य लाभों के लिए ही हैं, न्याय में दखल के लिए नहीं।  आगे जो भी हो, सर्वोच्च न्यायालय की चार जनवरी की तारीख को लेकर गतिविधियां बढ़ गयी हैं। इसी के साथ यह भी पूछा जाने लगा है कि अगर फैसले में देरी अन्याय के बराबर है तो क्या यह सुनिश्चित करना भी जरूरी नहीं है कि न्याय स्थापित मान्यताओं के आधार पर मिले और उसे तोड़ने-मरोड़ने का प्रयत्न न हो?

बहरहाल, विवाद का फैसला कहें या कि समाधान, वह तो जरूरी ही है, जिससे लोगों में यह विश्वास बना रहे कि न्यायपालिका उनके न्यायिक हितों के संरक्षण से विरत होने वाली नहीं और उस पर भरोसा किया जा सकता है। न्यायालय भी अपनी बाबत यह संदेश जाना पसंन्द नहीं ही करता कि वह किसी डर, भय, दबाव या प्रभाव से ग्रसित है। साथ ही, वह अपनी प्रतिष्ठा घटने को अपमानजनक मानता है।
 

Source:Agency