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सच हो जाएगी भस्मासुर की कहानी

By Sabkikhabar :14-12-2018 09:09


धर्म को निजी जीवन का हिस्सा बनाने की जगह सार्वजनिक और राजनैतिक जीवन में जरूरत से ज्यादा तरजीह देने का परिणाम अब कई भयानक रूपों में सामने आ रहा है। देश में अगले कुछ महीनों में आम चुनाव हो सकते हैं, उससे पहले अयोध्या में राम मंदिर बनाने का मुद्दा फिर राजनीति के केेंद्र में आ चुका है। अब तक सड़क पर इसे लेकर हंगामा होता रहा, अब संसद भी राम मंदिर मुद्दे की भेंट चढ़ रही है। भाजपा ने राम मंदिर के सहारे बीते ढाई दशकों में राजनीति में कई छलांगें लगाई हैं, इसलिए उसे ऐसा लगने लगा कि मंदिर-मस्जिद विवाद, सांप्रदायिकता और कट्टरता से उसे चुनावों में जीत मिलती रहेगी। पिछले कुछ चुनावों में ऐसा हुआ भी, श्मशान-कब्रिस्तान, ईद-दीवाली, तीन तलाक जैसे मुद्दों के सहारे मतदाताओं को बांटने और जीत हासिल करने में उसे सफलता मिली। शायद इसलिए मोदीजी के साथ-साथ योगीजी भी भाजपा के स्टार प्रचारक बन गए और जहां-जहां चुनाव हुए, वहां-वहां उनकी सभाएं हुईं। लेकिन हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा 5-0 से हार गई। उसे एक भी राज्य में बहुमत हासिल नहींहुआ। अब भाजपा नेतृत्व और संघ शायद इस हार पर चर्चा करेंगे, आत्ममंथन करेंगे और हिंदुत्व के अलावा और किन मुद्दों पर मतदाताओं का भावनात्मक दोहन किया जा सकता है, इस बारे में विचार करेंगे। भाजपा तो अपने नुकसान की भरपाई का कोई न कोई तरीका ढूंढ ही लेगी, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह अब भी केंद्र की सत्ता में है। लेकिन समाज को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कैसे होगी, यह अब जनता को सोचना चाहिए। अयोध्या में ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद को तोड़कर देश को क्या हासिल हुआ, यह समझने के लिए आंखें, कान और दिल-दिमाग सब खोलकर देखना होगा। समाज में अविश्वास और नफरत का ऐसा माहौल बन गया कि अब कोशिश करने पर भी पहले जैसी सद्भावना, सौहार्द्र कायम नहींहो पा रहा है। देश में जगह-जगह भीड़ की हिंसा, स्वयंभू गोरक्षकों का उत्पात, सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं बढ़ रही हैं। पिछले चार साल में तो इनमें काफी इजाफा हुआ है और हाल में बुलंदशहर में इसी वजह से एक पुलिस इंस्पेक्टर की शहादत भी हुई। समाज को हो चुके इस नुकसान की भरपाई केवल और केवल उदारता, सहिष्णुता, सर्वधर्म समभाव और संविधान में आस्था से हो सकती है। लेकिन हम अब भी शायद सबक लेने तैयार नहीं हैं। 
इसके दो ताजा उदाहरण हैं। दिल्ली की गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय (आईपी यूनिवर्सिटी) में एलएलबी की तीसरे सेमेस्टर की 'लॉ ऑफ क्राइम्सÓ के प्रश्नपत्र में सवाल आया था कि  'अहमद नाम का एक मुस्लिम बाजार में हिंदू व्यक्तियों रोहित, तुषार, मानव और राहुल के सामने गोहत्या करता है. क्या अहमद ने कोई अपराध किया है?Ó सुप्रीम कोर्ट के वकील बिलाल अनवर ने इस बात को ट्विटर पर साझा किया, और जब इस पर विवाद बढ़ा तो विशवविद्यालय ने माफी मांगी और उस प्रश्न को हटाने का निर्णय लिया। विश्वविद्यालय ने ये भी कहा कि इस सवाल का नंबर नहीं जोड़ा जाएगा। दिल्ली सरकार ने इस पर रिपोर्ट मांगी है, जांच के आदेश दिए हैं, जिसका क्या नतीजा निकलता है, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन यह विचारणीय है कि कानून की पढ़ाई में इस तरह के सांप्रदायिक सवाल पूछने वाले आखिर किस मानसिकता से संचालित हो रहे हैं और वे भावी कानूनविदों को किस सांचे में ढालेंगे? क्या भारत के कानून और संविधान की रक्षा करने में ये लोग सक्षम होंगे? इधर मेघालय हाईकोर्ट के जज ने भी एनआरसी से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कुछ हैरान करने वाली बातें कही हैं। डोमिसाइल सर्टिफिकेट से मना किये जाने पर अमन राणा नाम के एक शख्स द्वारा दायर एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए मेघालय हाईकोर्ट के जस्टिस एसआर सेन ने लिखा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान, तीनों पड़ोसी देशों में आज भी हिंदू, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी, खासी, जयंतिया और गारो लोग प्रताड़ित होते हैं और उनके लिए कोई स्थान नहीं है। इन लोगों को किसी भी समय देश में आने दिया जाए और सरकार इनका पुनर्वास कर सकती है और नागरिक घोषित कर सकती है। जस्टिस सेन ने इसके बाद भारत के इतिहास पर कुछ टिप्पणियां की और यह भी लिखा कि पाकिस्तान ने खुद को इस्लामिक देश घोषित किया था, चूंकि भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था इसलिए भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था लेकिन इसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाए रखा। जस्टिस सेन ने मोदी सरकार में विश्वास जताते हुए कहा कि वे भारत को इस्लामिक राष्ट्र नहीं बनने देंगे। उन्होंने लिखा, मैं ये स्पष्ट करता हूं कि किसी भी शख्स को भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कोशिश नहीं करना चाहिए, मेरा विश्वास है कि केवल नरेंद्र मोदीजी की अगुवाई में यह सरकार इसकी गहराई को समझेगी और हमारी मुख्यमंत्री ममताजी राष्ट्रहित में सहयोग करेंगी। न्याय की आसंदी से ऐसी टिप्पणी कितनी विधिसम्मत है, इसका विश्लेषण कानूनविद करेंगे। लेकिन भारत की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठाने वाली यह टिप्पणी हैरान करती है और दुखी भी। समय आ गया है कि हम धर्म को केवल निजी जीवन तक ही समेट कर रखें, अन्यथा भस्मासुर की कहानी सच होने में वक्त नहीं लगेगा।
 

Source:Agency