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एक बार फिर काठ की हांडी चढ़ाने के फेर में हिन्दुत्ववादी संस्थाएं

By Sabkikhabar :30-10-2018 09:23


लोकसभा चुनाव को देखते हुए संघ भाजपा और शिवसेना, विश्व हिन्दू परिषद, अन्तरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद व अन्य ऐसे ही संगठन व राजनीतिक दलों के लोगों को राम और उनका मंदिर याद आने लगा है जो 2019 तक वोट पड़ने तक याद रहेगा।

भारतीय जनमानस में यह याद रहे इसलिए ये सारी शक्तियां चंद लोगों के इशारे पर काम करने में लग गई हैं। मुसलमानों में भी कथित रामभक्तों की कमी नहीं दिख रही है वे भी कभी बाबर के वंशज बनकर माफीनामा लिख रहे हैं, कोई मस्जिद की जमीन को सौंपने की बात कर रहा है, कोई ईंटा रखने की बात कर रहा है।

सभी के अपने-अपने उद्देश्य हैं जो राम का नाम लेकर अपना हित साधने में लगे हैं। वास्तविक भक्त तो राम को अपने दिल में बैठाये उनकी भक्ति में लीन हैं, वे दिल्ली जाकर चंदन टीका कर अपना और अपने आकाओं के राजनैतिक उद्देश्य के लिए काम नहीं कर रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के हमसाया बनकर चलने वाले कैंसर सर्जन डॉ. प्रवीण तोगड़िया जिनकी छवि आग लगाऊ विहिप नेता की थी, विहिप से किनारे किये जाने के बाद अन्तरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के गठन के बाद अब चुनावी राजनीति में भागीदारी करने के लिए राजनीतिक दल का गठन करने जा रहे हैं। 

ये सारे लोग ऐसा माहौल बना रहे हैं मानों देश के अन्दर मंदिर और राममंदिर बनाने पर कहीं रोक है या अयोध्या में राममंदिर बनाने पर रोक है।

जो अधिग्रहीत है जिसमें विवादित इनर कोर्टयार्ड एवं 2.77 एकड़ विवादित भूमि भी शामिल है जिसका बंटवारा आदेश इलाहाबाद की हाईकोर्ट पीठ ने 30 सितम्बर, 2010 को कर दिया था। इस भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ इस्माइल फारूखी बनाम यूनियन आफ  इंडिया में पांच सदस्यीय खंडपीठ का निर्णय आया था जिसमें एक बिन्दु यह भी था कि मस्जिद का अधिग्रहण इसलिए भी किया जा सकता है क्योंकि नमाज बगैर मस्जिद के भी पढ़ी जा सकती है।

सवाल यह था कि क्या किसी मस्जिद का अधिग्रहण किया जा सकता है। क्या हमारे मौजूदा अधिग्रहण कानून के तहत किसी भी भूमि का अधिग्रहण किया जा सकता है वह चाहे मंदिर हो या मस्जिद।

विश्व हिन्दू परिषद के लोगों ने राष्ट्रपति से मिलकर आग्रह किया है कि वे सरकार को कानून बनाने का निर्देश दें जिससे विवादित स्थल पर राममंदिर का निर्माण किया जा सके। यहां पर यह स्मरण दिलाना उचित ही होगा कि 1994 में पीवी नरसिम्हाराव के प्रधानमंत्रित्वकाल में राष्ट्रपति के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजा गया था कि सुप्रीम कोर्ट यह तय कर दे कि वहां पर क्या मंदिर था या मस्जिद?

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी राय देने से मना कर दिया था कि इस तरह के राजनीतिक मामले के लिए कोर्ट अपनी सलाह नहीं देगी। क्योंकि यदि सुप्रीम कोर्ट की सलाह भी आती तो अन्ततोगत्वा निर्णय सरकार के हाथ में ही होता कि क्योंकि इस अनुच्छेद के तहत दी गई राय बाध्यकारी नहीं होती। 

अयोध्या विवाद को प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने नजरिये से देख रहा है। कोई बाबर का वंशज बताकर मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने की माफी मांग रहे हैं। कोई भूमि को ही मंदिर के लिए दान करने की बात कर रहा है। विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े और अयोध्या सेल में लम्बे अरसे तक काम-काज देख चुके आईपीएस अधिकारी कुणाल किशोर कहते हैं कि मस्जिद बाबर ने नहीं, औरंगजेब के समय में गिराई गई।

उन्होंने 'रिविजिटेड अयोध्याÓ लिखकर उसे सिद्ध भी किया है। मुकदमे में एक पक्षकार की ओर से पैरवी भी कराया। ऐसे में अब तो माफी मांगने के लिए औरंगजेब के वंशजों को भी ढूंढना पड़ेगा। औरंगजेब अब इस दुनिया में हैं नहीं उनकी वंशावली के लोग भी अब निकल ही आयेंगे। उनकी मृत्यु 1707 में हो गई थी। 

प्रत्येक चुनावी वर्ष में राममंदिर एक मुद्दे की तरह आता है और चला जाता है। कुछ लोगों को वोट मिल जाता है और कुछ लोगों को नोट मिल जाता है और मामला फिर अपनी जगह ठहर जाता है।

इस लोकसभा चुनाव में भी मुद्दे को बदलकर इसे मंदिर मुद्दे पर केन्द्रित करने के लिए सत्तारूढ़ लोग और उनके राजनैतिक से लेकर संास्कृतिक संगठन अपने काम पर लग गए हैं जिससे हिन्दू वोटों की गोलबन्दी की जा सके क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में जाति धर्म से परे जाकर विकास, रोजगार की अटूट आकांक्षा को एक मसीहाई छवि के रूप में जादू की छड़ी समझा था वह कारगर नहीं हो सकी।

वह जहां से चला था वहीं पर वह खड़ा रह गया। विकास के लबादे में छिपे हिन्दुत्व ने चाहे जितना दिमागों को बांटने की कोशिश की हो, आम आदमी हाल-बेहाल हैं। 

विश्व हिन्दू के प्रवक्ता ऋ षि कपूर राममंदिर न बन पाने के लिए विपक्षी दलों और उन पार्टियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं कि वे मुकदमे को लम्बा खींच रही हैं। 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो निर्णय आया था उसके खिलाफ  सम्बन्धित सभी पक्षकार अपील में गये हैं।

अपील में जाने वाले वे भी हैं, जिन्हें गुम्बद के बीच का हिस्सा मूर्तिसहित मिला था (जहां 22/23 दिसम्बर 1949 को मूर्तियां रखी गई थी) आज भी मलबे पर मेकशिफ्ट ढांचे में मूर्तियां रखी हुई हैं।

कोर्ट के आदेश से पूजा-पाठ हो रहा है उसी हिस्से में आउटर कोर्टयार्ड का 'एल शेप का हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को भी मिला था क्योंकि गुम्बद के बीच में मूर्ति 1949 में रखी गई थी लेकिन रामचबूतरे पर पूजा तो पहले से ही हो रही थी और उस पर मुसलमानों को एतराज भी नहीं था।

आउटर कोर्टयार्ड के 'एल शेप की भूमि में रामचबूतरा और सीतारसोई पर हिन्दुओं का 1883 से पहले से ही कब्जा था। 1885 में इसी रामचबूतरा को धूप-छांव गर्मी-बरसात से बचाने तथा मंदिर में परिवर्तित करने का जो नक्शा नगरपालिका में पेश किया गया था उसमें चौहद्दी में पश्चिम में बाबरी मस्जिद बताया गया था।

रामचबूतरा के महन्त रघुवरदास ने इसके लिए मुकदमा दायर किया था। अंग्रेजों के समय में अवध चीफ कोर्ट तक मुकदमा लड़े। 1985 में वे मुकदमा हार गये, उन्हें मंदिर बनाने की अनुमति नहीं मिल पाई।

जब महन्त रघुवरदास मुकदमा लड़ रहे थे तब न तो संघ था, न ही भाजपा, शिवसेना और विश्वहिन्दू परिषद ही। न ही किसी को गर्भगृह की याद आई थी और न मंदिर की। 

हाईकोर्ट के निर्णय की सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर होने के आठ साल बाद एक बार फिर से बौद्ध पक्ष का मामला भी रिट के माध्यम से मुकदमे का हिस्सा बन गया है जिसके बारे में कोई बात ही नहीं कर रहा है।

अयोध्या के ही निवासी बौद्ध मतावलम्बी विनीत मौर्य ने रिट के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि जिस खुदाई को मंदिर-मस्जिद को जानने के लिए किया गया था उसमें पुरातत्व विभाग ने कहीं भी यह नहीं कहा है वहां पर राममंदिर के अंश मिले हैं। विनीत मौर्य कहते हैं कि खुदाई 150 टे्रच में की जानी थी लेकिन सिर्फ  पचास में की गई और जिस 'श्राइन सर्कुलर का उल्लेख अपनी खुदाई रिपोर्ट में पुरातत्व विभाग द्वारा की गई है उसे श्रावस्ती, सारनाथ, भीटा से मिलता-जुलता बताया है इसलिए यह बौद्धस्थल था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई लेकिन हम पुन: इसे बौद्धस्थल बनाये जाने की मांग नहीं करते हैं बल्कि इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग करते हैं। यह रिट सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट कहता है कि यह मामला वह भूमि विवाद के रूप में सुनेगा इसीलिए उसने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के समय में ही 24 अक्टूबर,1994 को पांच जजों की पीठ द्वारा अयोध्या में 67 एकड़ भूमि जिसमें बाबरी मस्जिद की विवादित भूमि भी शामिल थी, के अधिग्रहण के मामले में दिए गए निर्णय से ही अलग नहीं किया बल्कि उन तमाम पक्षकारों को किनारे कर दिया जो हिन्दू या मुसलमान के नाम पर इस मामले मे पक्षकार बनने के लिए अपनी याचिकाएं लगाई थीं। अब इस मुकदमे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट ने नये मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगाई द्वारा गठित संविधान पीठ द्वारा की जानी है जिसका मुख्य विवाद मंदिर-मस्जिद के बजाय भूमि-विवाद है। 

जब यह मामला भूमि विवाद का है तो यह उसी तरह से निर्णय भी सुप्रीम कोर्ट करेगा। लोग अपने-अपने दावे करने में और उसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए देश भर में लगे हुए हैं माहौल को गरम करने के लिए जिससे इसका लाभ प्राप्त किया जा सके।

यह कहना गलत नहीं होगा कि 1989 में पालमपुर में अपने एजेण्डे में राममंदिर का मुद्दा भाजपा ने तब उठाया था जब 1984 में संघ की रणनीति के तहत वह आंदोलन की एक रूपरेखा तैयार कर चुकी थी लेकिन 31 अक्टूबर 1984 को प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही अंगरक्षकों द्वारा किये जाने तथा उसके बाद हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी दो सीटों पर सिमट गई थी।

कांग्रेस से अलग होकर जनता दल बनाने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा बोफोर्स मुद्दे और जनता दल और भाजपा के आन्तरिक गठजोड़ से भाजपा को 86 सीटों तक पहुंचाया था।

आडवानी की रथयात्रा और कारसेवा के दौरान हुए गोलीकांड के फ लस्वरूप बने माहौल में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार 32 प्रतिशत वोट पाकर बहुमत से प्रदेश में सत्ता में पहुंची थी।

ऐसे में इसका लाभ उन लोगों को भी मिला जो अल्पसंख्यकों का कथित तुष्टीकरण बताकर बहुसंख्यकों को एकजुट करने में लगे थे।

अल्पसंख्यकों के कथित तुष्टीकरण और शाहबानो मामले में मुसलमानों की कट्टरता और सड़कों पर उतरने से उपजी साम्प्रदायिकता ने बहुसंख्यकों के उभार को हवा दी जिसने भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी।
 

Source:Agency