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राफेल सौदे के रहस्य और असलियत

By Sabkikhabar :24-09-2018 07:45


भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार इस बाबत बार-बार गोपनीयता की दुहाई दे रही है, जिससे सवाल उठता है कि सौदे में ऐसा कौन-सा तत्व है जिसे छिपाया जाना लाजिमी है? इन विमानों की विशेषता, गुणवत्ता और उपलब्धता का परीक्षण तो खरीद की इच्छा के वक्त ही हो चुका था। इसलिए उनके सम्बन्ध में न कोई विवाद है और न उस पर चर्चा ही हो रही है। तिस पर कहते हैं कि यह सौदा नया नहीं है और इसकी प्रक्रिया संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार के समय से ही चल रही थी। इसीलिए अब सौदे की आलोचक बन गई कांग्रेस भी विमानों की श्रेष्ठता और उपयोगिता के सम्बन्ध में कोई सवाल नहीं उठा रही। मामला फंसा है तो केवल यह कि उनके लिए भारत सरकार ने कितनी धनराशि का भुगतान किया और ज्यादा किया तो उसके लाभकारी कौन थे? 

अब जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद , जिनके कार्यकाल में भारत द्वारा राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का सौदा संयोजित हुआ था, रहस्योद्घाटन किया है कि इस सौदे में रिलायन्स डिफेंस यानी अनिल अम्बानी की उपस्थिति मूल कारण भारत सरकार के प्रतिनिधि की इच्छा थी और इस प्रतिनिधि ने ही इस फर्म व व्यक्ति का नाम सुझाया था, तो फ्रांस सरकार की ओर से सफाई दी जा रही है कि उस देश में ऐसे सौदों के साझीदार का निर्णय तो सम्बन्धित कम्पनियां ही करती हैं और इस मामले में राफेल बनाने वाली कम्पनी ने खुद ही रिलायन्स डिफेंस को चुना। लेकिन चूंकि यह सौदा भारत और फ्रांस के बीच सम्पन्न समझौते पर आधारित था, इसलिए मुख्य निर्णायक ये देश ही हो सकते हैं, निर्माता या विक्रेता कम्पनियां नहीं।

भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार इस बाबत बार-बार गोपनीयता की दुहाई दे रही है, जिससे सवाल उठता है कि सौदे में ऐसा कौन-सा तत्व है जिसे छिपाया जाना लाजिमी है? इन विमानों की विशेषता, गुणवत्ता और उपलब्धता का परीक्षण तो खरीद की इच्छा के वक्त ही हो चुका था। इसलिए उनके सम्बन्ध में न कोई विवाद है और न उस पर चर्चा ही हो रही है। तिस पर कहते हैं कि यह सौदा नया नहीं है और इसकी प्रक्रिया संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार के समय से ही चल रही थी। इसीलिए अब सौदे की आलोचक बन गई कांग्रेस भी विमानों की श्रेष्ठता और उपयोगिता के सम्बन्ध में कोई सवाल नहीं उठा रही। 

मामला फंसा है तो केवल यह कि उनके लिए भारत सरकार ने कितनी धनराशि का भुगतान किया और ज्यादा किया तो उसके लाभकारी कौन थे? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इसे लेकर बहुत मुखर हैं, हालांकि उनके पिता राजीव गांधी भी अपने प्रधानमंत्रीकाल में एक रक्षा सौदे में फं से थे। तब से देश में कई बार सरकारें बदलने के बावजूद बोफोर्स तोप सौदे के नाम से जाने जाने वाले इस सौदे में संबंधित  जांच एजेंसी अपने दायित्व का निर्वाह कर रही है। इस सौदे में अदा किये गये 64 करोड़ का लाभ किसने और कैसे उठाया, उस सम्बन्धी आरोपों में जांच की आंच राहुल के ननिहाल तक पहुंची थी। कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया था, जो भारत से जमानत पर छूटने के बाद वापस नहीं आये। अब वे इस दुनिया में भी नहीं हैं। राजीव गांधी जी अब हमारे बीच नहीं  हैं। लेकिन बोफोर्स तोप सौदे का विवाद चल रहा है और उसके लिए कांग्रेस पार्टी को भी दोषी ठहराया जा रहा है। हालांकि उस खरीद में भी सेना, जिसके लिए ये तोपें खरीदी गयी थीं, उनकी श्रेष्ठता की दुहाई देती आई है। आलोचना करने वाले विरोधी भी उनकी श्रेष्ठता के सम्बन्ध में उसी प्रकार सवाल नहीं उठाते जैसे राफेल विमानों के। 

लेकिन राजनीतिक रूप से अभी भी यही माना जाता है कि 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा और मुख्य कारण यह बोफोर्स सौदा ही था। श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनाव में अपार बहुमत पाने वाले राजीव गांधी, जिन्हें मिस्टर क्लीन कहा जाता था, इस सौदे के बाद 1989 में पुन: बहुमत पाने को तरस गये थे और भारतीय राजनीति में एक नया प्रयोग शुरू हुआ था, जिसमें भाजपा और वामपंथी राजनीति के दो पृथक और एक दूजे के धुरविरोधी माने जाने वाल ध्रुवों-भाजपा व वामपंथियों  ने मिलकर बाहर के समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली सरकार चलाई थी। अलबत्ता यह प्रयोग अन्तत: असफल सिद्ध हुआ, जिसका कारण यह बताया गया कि ऐसी संयुक्त सरकारों का अस्तित्व ही उन्हें सहयोग करने वाले दलों के स्वार्थों पर आधारित होता है और वे प्रयोग से ज्यादा महत्व उसके भावी परिणामों को देते हैं।

रक्षा सौदों के राजनीतिक विरोध की बात करें तो यह तो पं. जवाहरलाल नेहरू के वक्त ही शुरू हो गया था। यही कारण है कि नेहरू के समय का जगुआर विमान सौदा, जो जगजीवन राम के रक्षामंत्री रहते हुुआ था, लम्बे समय तक विवाद का विषय रहा। 

इस सिलसिले में यह भी कहा जाता है कि रक्षा सौदों में मिलने वाला कमीशन सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियों के राजनीतिक कार्यों के संचालन  में खर्च होता है, जो सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है। वास्तविकता दरअसल यह है कि देश में जिस कालेधन की व्यापकता की चर्चा की जाती है, उस पर अंकुश लगाने के प्रयत्नों का भी प्रचार ही ज्यादा होता है और वे जमीन पर कम ही उतरते हैं, जबकि कालेधन का सर्वाधिक उपयोग तो चुनाव के दौरान होता है। संवैधानिक दृष्टि से यह सर्वथा अनुचित है, क्योंकि चुनाव में उम्मीदवारों के खर्च की सीमा तो निर्धारित है लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा किये जाने वाले खर्च का लेखा जोखा या उसकी सीमा तय करने का कोई वैध उपाय अभी भी नहीं है।  दुर्भाग्य यह है कि जो भी पार्टी सत्ता में आ जाती है, उसी को राजनीतिक चन्दे की सर्वाधिक रकम भी मिलती है। इस सम्बन्धी आंकड़े चुनाव आयोग में उपलब्ध हिसाब किताब में देखे जा सकते हैं। चूंकि राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किया गया सारा धन पवित्रता की सारी कसौटियों से मुक्त है इसलिए किसी भी पार्टी के सत्ता में आते ही उसके राजनीतिक चन्दे की सीमाएं विस्तारित हो जाती हैं, जबकि विपक्ष में आने के बाद संकुचित हो जाती है। क्या आश्चर्य कि इस समय देश के राजनीतिक दलों में सबसे अधिक धनवान भाजपा ही है।

राफेल सौदे पर लौटें तो उसमें किये गये भुगतानों को बेवजह रहस्य बनाये रखने का औचित्य समझ में नहीं आता। जब सरकार द्वारा स्वयं भी सरकारी धन के खर्च में पारदर्शिता के सिद्धान्त की वकालत की जाती है तो इस सौदे के लिए होने वाले समझौते में दोनों सरकारें इस बात पर कैसे अड़ी रह सकती हैं कि वे राफेल विमानों की वास्तविक यानी अदा की गई कीमत को सार्वजनिक नहीं करेगी? वे जितना ही इस पर अड़ेंगी, यह संदेह गहरा होगा कि विमानों की वास्तविक कीमत छिपाने के पीछे कोई न कोई गर्हित स्वार्थ हैं। इस सम्बन्ध में देश की सुरक्षा के नाम पर गोपनीयता का जो तर्क दिया जाता है, वह सार्वजनिक जीवन की पवित्रता के सिद्धान्तों से मेल नहीं खाता। 

फिर मोदी सरकार इन कीमतों को संसद में बजट तथा सरकार के कार्यकलापों की निगरानी के लिए बने संस्थानों की नजर से क्यों कर बचा सकती है? लोकतंत्र में संसद सबसे सर्वोच्च संस्था है और उसे दल के बजाय भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार कहा जाता है। उसको विश्वास में न लेने के तर्क केवल सत्तारूढ़ जमातें ही दिया करती हैं। स्वाभाविक ही ऐसे प्रश्नों पर जनता की मानसिकता भिन्न है और वह मानती है कि आर्थिक पवित्रता पर आघात सरकार के चरित्र को ही प्रभावित करता है। इसलिए लोकजीवन में उसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। 

हां, राजनीतिक दलों के अपने तर्क होते हैं, जिनका इस्तेमाल कर वे विरोधियों पर आरोप लगाते रहते हैं और विपक्ष सत्तापक्ष के कार्यों को संदिग्ध बताता रहता है। ऐसे में अगर राफेल सौदे और उससे जुड़े रहस्यों को राजनीतिक लाभ-हानि से जोड़ा जा रहा है, तो इस पर बहुत चकित होने का कोई कारण नहीं है? अलबत्ता, इस पर वास्तविक निर्णय तो देश के मतदाता ही करेंगे, जो लोकमत के संरक्षक और आधार माने जाते हैं। 
 

Source:Agency