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क्या एक बार फिर होगा एससी/एसटी एक्ट में बदलाव?

By Sabkikhabar :15-09-2018 08:33


इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद एससी/एसटी एक्ट में संसद द्वारा किए गए बदलाव के सुप्रीम कोर्ट में टिक पाने को लेकर सवालिया निशान खड़ा हो गया है। संसद द्वारा कानून में किए गए संशोधन क बाद उसे सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई है और कोर्ट ने उस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार भी कर लिया गया। यदि कोर्ट पाता है कि वर्तमान रूप में एससी/एसटी एक्ट संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध है और इसके कारण नागरिकों को दिए गए मूल अधिकारों मे से किसी एक का भी उल्लंघन होता है, तो कानून में किया गया वह संशोधन सु्रप्रीम कोर्ट रद्द कर सकता है। इसके अलावा 2014 मे दिए गए अपने उपरोक्त फैसले की रोशनी में भी सुप्रीम कोर्ट वर्तमाना संशोधनों की सांवैधनिकता पर विचार करेगा। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने एससी/एसटी विवाद में एक नया मोड़ पैदा कर दिया है। इसके कारण अब इस एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गयी है। इससे  एससी/एसटी एक्ट पर चल रहा विवाद अभी और आगे भी जारी रह सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव कर दिया गया था और उसके कारण इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गयी थी। सुप्रीमकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ अनुसूचित जातियों के लोगों ने जबरस्त हंगामा किया था और पिछले दिनों भारत बंद का आयोजन किया गया था, उस भारत बंद के दौरान कुछ राज्यों में भारी हिंसा हुई थी।

एससी नेताओं के दबाव में केंद्र सरकार ने संसद द्वारा एक विधेयक पारित करवाकर कानून को पुराने रूप में बहाल कर दिया था। हालांकि कानून को पुराने रूप में फिर से बहाल करने के खिलाफ भी देश में आंदोलन हो रहे हैं। इस कानून के खिलाफ न केवल सवर्ण हैं, बल्कि ओबीसी जातियों के लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं। उनकी शिकायत है कि इस कानून का भारी दुरुपयोग हो रहा है और इसके तहत फर्जी मुकदमा कर लाखों लोगों और परिवारों कि जिंदगियां खराब कर दी गयी हैं।

एससी/एसटी एक्ट मोदी सरकार और भाजपा के गले की हड्डी बन गया है। यह न तो उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यदि कानून को सरकार कमजोर करती है, तो इससे एससी समुदाय के लोग नाराज हो जाएंगे और नरेंद्र मोदी सत्ता में आने के बाद लगातार एससी समुदाय के लोगों का समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि इस समुदाय के लोग परम्परागत रूप से भाजपा विरोधी रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए जो कानूनी प्रावधान किए गए हैं, उनसे बीजेपी का परम्परागत समर्थक सवर्ण नाराज हो गए हैं और उन्होंने भी भारत बंद का एक आयोजन कर डाला था। अब वे सोशल मीडिया पर नोटा अभियान चला रहे हैं, जिसके तहत एससी/एसटी एक्ट के विरोधियों से ईवीएम मशीन का नोटा बटन दबाने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि संसद में सभी पार्टियों ने एससी/एसटी एक्ट को मजबूत करने वाले विधेयक का समर्थन किया था और बिना किसी विरोध के वह विधेयक दोनों सदनों से पारित होकर कानून बन गया था।

लेकिन वह विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में पुलिस को हिदायत दी है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज किये गए मुकदमे में अभियुक्त को सीधे गिरफ्तार नहीं करें, क्योंकि वैसा करने से 2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक अन्य फैसले की तौहीन होती है। अनरेश कुमार बनाम बिहार सरकार केस में 2 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था। बिना ठोस वजह के आरोपी की गिरफ्तारी केवल इसलिए कर ली जाए, क्योंकि यह विवेचक का अधिकार है। कोर्ट ने ऐसी प्रथा पर गंभीर आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने सीआरपीसी-41 में संशोधन का हवाला देते हुए कहा था कि जिन मामलों में सजा सात साल या उससे कम है, उनमें गिरफ्तारी से पहले विवेचक को यह बताना होगा कि गिरफ्तारी क्यों जरूरी है? कोर्ट ने कहा था कि अभियुक्त पूछताछ के लिए आता है और नोटिस की शर्तों का पालन करता है तो जांच के दौरान उसे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अधिकतम 7 साल की सजा का प्रावधान है। इसलिए यह एक्ट सुप्रीम कोर्ट के 2014 वाले आदेश की जद में आ जाता है। उस आदेश के तहत मुकदमा दर्ज होने के बाद सीधे गिरफ्तारी एससी/एसटी एक्ट में भी नहीं हो सकती। मुकदमा दर्ज होने के बाद आरोपी को पहले नोटिस जारी करना पड़ेगा। उससे पूछताछ करनी पड़ेगी और उसके बाद ही जरूरी समझे जाने पर गिरफ्तारी हो सकती है। इलाहबाद हाई कोर्ट ने गोंडा के राजेश मिश्र की एक याचिका की सुनवाई करने के बाद यह आदेश जारी किया। याची राजेश मिश्रा ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने खिलाफ  लिखाई गई प्राथमिकी को चुनौती दी थी। साथ ही मांग की थी कि पुलिस को निर्देश दिया जाए कि विवेचना के दौरान उसे गिरफ्तार न किया जाए। सुनवाई के दौरान अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम नंद प्रभा शुक्ला ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि सजा सात साल से कम है इसलिए विवेचक सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करेंगे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर एससी संगठन और उनके राजनैतिक नेता अदालत द्वारा एससी/एसटी एक्ट के कमजोर किए जाने का आरोप लगा सकते हैं और एक बार फिर यह मांग हो सकती है कि एक बार फिर संसद द्वारा कानून बना कर 2014 के उस सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त किया जाय, जिसके तहत 7 साल या उससे कम सजा वाले मुकदमो में आरोपी की सीधी गिरफ्तारी पर रोक लगती है।

हालांकि इस बार उनकी मांग मान लिए जाने की संभावना कम है, क्योंकि केंद्र सरकार व सभी राजनैतिक दलों ने एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ लोगों का गुस्सा भी देख लिया है. चूंकि सरकार द्वारा इस मामले में कानूनी हस्तक्षेप की संभावना कम है, इसलिए एससी नेताओं द्वारा इस मामले पर आंदोलन करने की संभावना भी क्षीण ही है।

लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद एससी/एसटी एक्ट में संसद द्वारा किए गए बदलाव के सुप्रीम कोर्ट में टिक पाने को लेकर सवालिया निशान खड़ा हो गया है। संसद द्वारा कानून में किए गए संशोधन क बाद उसे सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई है और कोर्ट ने उस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार भी कर लिया गया। यदि कोर्ट पाता है कि वर्तमान रूप में एससी/एसटी एक्ट संविधान के मूल ढांचे के विरूद्ध है और इसके कारण नागरिकों को दिए गए मूल अधिकारों मे से किसी एक का भी उल्लंघन होता है, तो कानून में किया गया वह संशोधन सु्रप्रीम कोर्ट रद्द कर सकता है। इसके अलावा 2014 मे दिए गए अपने उपरोक्त फैसले की रोशनी में भी सुप्रीम कोर्ट वर्तमान संशोधनों की सांवैधनिकता पर विचार करेगा। 
 

Source:Agency