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ये मुल्क किसका है!

By Sabkikhabar :13-08-2018 08:41


फिल्म बताती है कि ये पूर्वाग्रह, भिन्नताओं के आधार पर लोगों को 'हम' और 'वे' में बांटे जाने की जमीन पर पनपते हैं और हम वास्तविक, जीते-जागते और इसलिए, कई चीजों में समान किंतु कई और चीजों में अलग-अलग इंसानों को, स्टीरियोटाइप्स में घटाकर देखने लगते हैं। यह सिलसिला 'वे' के दानवीकरण तक जाता है। इसे पलटते हुए, फिल्म ध्यान दिलाती है कि अगर मुसलमान ज्यादा गरीब हैं, ज्यादा अशिक्षित हैं, उनके ज्यादा बच्चे होते हैं, तो इस पर समाज को 'हम' और 'वे' में बांटकर देखने वाला ही हँस या मुस्कुरा सकता है! फिल्म का संदेश है कि ऐसी विभाजित नजर से समाज आगे नहीं बढ़ सकता है और अगर सचमुच आगे बढ़ना है तो, 'हम सब' पर टिकी समावेशी नजर विकसित करनी होगी। यह परोक्ष रूप से आज की सत्ताधारी राजनीति को आईना दिखाने जैसा है।

आज के जमाने में, जब आए दिन लोगों से देश-प्रेम के सबूत मांगे जाते हैं और 'पाकिस्तान चले जाने' के फरमान सुनाए जाते हैं, अनुभव सिन्हा की फिल्म 'मुल्क' बड़े साहस और संवेदनशीलता के साथ इस खतरनाक प्रवृत्ति को और उसके जरिए परोक्ष रूप से इस प्रवृत्ति को पालने-पोसने वाली आज की सत्ताधारी राजनीति को भी चुनौती देती है। अचरज की बात नहीं है कि इस फिल्म को हिंदुत्ववादी ताकतों के भारी हमले का भी सामना करना पड़ा है, जिसमें फिल्म के बहिष्कार के आह्वïानों से लेकर, खासतौर पर सोशल मीडिया पर फिल्म के खिलाफ संगठित अभियान तक शामिल हैं। यह दूसरी बात है कि इस तमाम मुहिम केे बावजूद, टिकट खिड़की पर भी यह फिल्म कोई नाकाम नहीं रही है, जो एक फिल्म के तौर पर 'मुल्क' के बहुत प्रभावशाली होने के साथ ही साथ, इसका भी सबूत है कि यह फिल्म संप्रदाय पर आधारित जिस मानसिक बंटवारे की समस्या पर उंगली रखती है, वह एक तेजी से बढ़ती हुर्ह तथा काफी बड़ी समस्या होने के बावजूद, हमारे देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के लिए वास्तविक चुनौती भले पेश कर रही हो, अब भी उसे हाशिए पर नहीं धकेल पाई है। 

फिल्म मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के ही संदर्भ में, जिसे आज सबसे ज्यादा इस बहिष्करणकारी प्रवृत्ति का सामना करना पड़ रहा है, यह सवाल उठाती है कि यह मुल्क किस का है बल्कि यही कहना ज्यादा सही होगा कि मुसलमानों का भी क्यों नहीं है? फिल्म दो स्तरों पर इन सवालों के जवाब देती है। कहानी का केंद्रीय पात्र मुराद अली, जिसके रूप में ऋषि कपूर अपने जीवन की कुछ सबसे बेहतरीन भूमिकाओं में से एक में हैं, एक प्रतिष्ठिïत वकील तथा बनारस के पुराने शहर की नब्बे साल पुरानी 'बद्र मंजिल' में रहने वाले परिवार का बुजुर्ग मुखिया है। वह अचानक अपने सामने ठीक ऐसे ही सवाल खड़े कर दिए जाने पर हतप्रभ होकर, बड़े भोलेपन से पूछता है—'किसी से प्यार करने का सबूत कैसे देते हैं?' फिर खुद ही जवाब भी दे देता है—'प्यार कर के ही ना'! भावनात्मक स्तर पर किसी के देश से प्यार करने न करने के सवालों का, इससे मर्मस्पर्शी जवाब नहीं हो सकता है। और कानून के स्तर पर ऐसे सवालों का जवाब, मुराद अली और मुकद्दमे के दौरान जेल में दम तोड़ गए उनके छोटे भाई तथा पुलिस मुठभेड़ में मारे गए एक आतंकवादी के पिता, बिलाल (मनोज पहवा) के खिलाफ सारे आरोपों को खारिज करते हुए, न्यायाधीश द्वारा सुनाया गया फैसला देता है: 'देश के संविधान की भूमिका की कुछ फोटो प्रतियां करा के रख लें और फिर कोई इस मुल्क के आप का घर होने पर सवाल करे तो उसे पकड़ा दें। फिर भी नहीं समझेगा तो हम यहां (अदालत में) देख लेंगे!' 

लेकिन, यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसमें यह मुल्क मुसलमानों का भी होने के सवाल को बहुत आसान रूप में पेश कर के, हल दिखाने की कोशिश नहीं की गई है। उल्टे फिल्म एक आतंकवादी के परिवार के मुश्किल संदर्भ में यह सवाल उठाती है। मुराद अली का परिवार पुराने बनारस शहर की गंगा-जमुनी रहनी के बीच रचा-बसा, खाता-पीता परिवार है। यहां उत्सव-त्यौहार सब समुदायों के साझे हैं और अच्छे-बुरे में सब एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं। यहां तक कि परिवार में एक हिंदू बहू किरण (तापसी पन्नू) भी है, जो पेशे से वकील है और अंतत: वही अदालत में अपने परिवार के निर्दोष होने और उससे बढ़कर, यह मुल्क उनका भी होने को साबित करती है। इस परिवार के और मोहल्ले के भी शांत जीवन में तूफान तब खड़ा होता है, जब मुराद अली के छोटे भतीजे, शाहिद (प्रतीक बब्बर) के, जो एक पढ़ा-लिखा युवक है, आतंकवादी घटना में शामिल होने का पता चलता और वह पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा जाता है। 

बेशक, यह सब भी अचानक ही नहीं हो जाता है। फिल्म में कम से कम बाबरी मस्जिद के ध्वंस से लेकर, अब तक की घटनाएं इसे गढ़ती दिखाई गई हैं, जो एक ओर शाहिद को अगर आतंकवाद के रास्ते पर ले जाती हैं, तो दूसरी ओर पांडे के निठल्ले बेटे को उग्र हिंदुत्व के रास्ते पर। फिर भी, शाहिद का आतंकवादी निकल जाना, न सिर्फ पुलिस व प्रशासन के पूर्वाग्रह के चलते, मुराद अली के परिवार के सभी मर्दों को कटघरे में पहुंचा देता है बल्कि मोहल्ले को भी बुरी तरह से बांट देता है। यहां तक कि पांडे, मुराद अली से अपनी पुरानी दोस्ती भूलकर, अपने बेटे के साथ जा खड़ा होता है, जो आक्रामक 'जागरण' से लेकर, घर की दीवार पर 'पाकिस्तान जाओट लिखने तथा पथराव तक के जरिए, मुराद अली परिवार के खिलाफ हमलावर मुहिम छेड़ देता है, जिसे मोहल्ले में बढ़ता अनुमोदन मिलता नजर आता है। यहां तक कि घर पर पथराव की शिकायत करने जब मुराद अली पुलिस थाने जाता है, पुलिस की तरफ से उसे यही सलाह मिलती है कि पुलिस कार्रवाई की मांग कर, मोहल्ले के लड़कों से रंजिश बढ़ाना अच्छा नहीं होगा। लड़के ही हैं, आतंकवादी थोड़े ही हैं। इस पर मुराद अली को ही लापरवाह और वास्तव में पूर्वाग्रहग्रस्त पुलिस को यह बताना पड़ता है कि, 'किसी को डरा कर कोने में बैठा देना भी तो आतंकवाद ही है!ट 

ठीक इसी जगह से फिल्म 'मुल्कट यह सवाल उठाती है कि जब बाकी अपराधों की तरह आतंकवाद भी एक व्यक्तिगत आपराधिक कृत्य है, उसके लिए एक पूरे परिवार को और वास्तव में एक पूरे समुदाय को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? यहां आतंकवाद के संदर्भ में इस सवाल का उठाया जाना महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ अर्से से हमारे देश में और वास्तव में तो दुनिया भर में ही, संप्रदायों के बीच की खाई को बढ़ाने के लिए, सबसे बढ़कर आतंकवाद के डर का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। इस संदर्भ में फिल्म जहां आतंकवाद की इस सर्वस्वीकृत परिभाषा को रेखांकित करती है कि यह 'राजनीतिक उद्देश्य साधने के साधन के रूप में, खासतौर पर नागरिकों के खिलाफ हिंसाट का इस्तेमाल है, वहीं यह तीखा सवाल भी करती है कि हमारे देश में दलितों के खिलाफ, आदिवासियों के खिलाफ हिंसा के प्रयोग को भी, आतंकवाद क्यों नहीं माना जाना चाहिए? प्रभावशाली कोर्ट रूम ड्रामा के जरिए, जो एक तरह से इस फिल्म की जान ही है, यह दिखाया जाता है कि किस तरह एक व्यक्ति के अपराध का, परिवार तथा पूरे समुदाय से ही जोड़ा जाना, एक गहरे पूर्वाग्रह से संचालित होता है।

फिल्म, सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) के माध्यम से, इन पूर्वाग्रहों को बखूबी और काफी विस्तार से सामने लाती है। फिल्म बताती है कि ये पूर्वाग्रह, भिन्नताओं के आधार पर लोगों को 'हमट और 'वेट में बांटे जाने की जमीन पर पनपते हैं और हम वास्तविक, जीते-जागते और इसलिए, कई चीजों में समान किंतु कई और चीजों में अलग-अलग इंसानों को, स्टीरियोटाइप्स में घटाकर देखने लगते हैं। यह सिलसिला 'वे' के दानवीकरण तक जाता है। इसे पलटते हुए, फिल्म ध्यान दिलाती है कि अगर मुसलमान ज्यादा गरीब हैं, ज्यादा अशिक्षित हैं, उनके ज्यादा बच्चे होते हैं, तो इस पर समाज को 'हम' और 'वे' में बांटकर देखने वाला ही हँस या मुस्कुरा सकता है! फिल्म का संदेश है कि ऐसी विभाजित नजर से समाज आगे नहीं बढ़ सकता है और अगर सचमुच आगे बढ़ना है तो, 'हम सबट पर टिकी समावेशी नजर विकसित करनी होगी। यह परोक्ष रूप से आज की सत्ताधारी राजनीति को आईना दिखाने जैसा है।

इस सब के बीच फिल्म 'मुल्क' एसीपी दानिश जावेद के माध्यम से, जो भूमिका रजत कपूर ने असाधारण प्रामाणिकता से निभाई है, उस प्रक्रिया की ओर भी ध्यान खींचती है, जिसके तहत बहुसंख्यक समुदाय के पूर्वाग्रहों के दबाव में अल्पसंख्यक समुदाय के भी कुछ हिस्से, इन्हीं पूर्वाग्रहों को दुहराने लगते हैं। यह कुछ वैसे ही है जैसे हमारे देश में स्त्रियों का एक हिस्सा स्त्रीविरोधी पूर्वाग्रहों को या दलितों का एक हिस्सा, दलितविरोधी पूर्वाग्रहों को दुहराता देखा जा सकता है। यह इन पूर्वाग्रहों की वैधता का नहीं, उनके समूचे समाज पर हावी होने का ही सबूत है।

यह इस फिल्म की शक्ति है कि वह एक जैसी परिस्थितियों में, एक ही समुदाय के अलग-अलग लोगों की अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से, हमारे दिमागों में पैठे स्टीरियोटाइप्स के खोखलेपन पर चोट करती है। अगर मुराद अली का परिवार, आतंकवादी की लाश भी लेने से यह कहकर इंकार कर देता है कि यह हमारे घर का बच्चा नहीं है, तो इसी समुदाय के दूसरे कई लोग आतंकवादी शाहिद की शहादत को सेलिब्रेट करना चाहते हैं, जबकि बिलाल के मित्र का परिवार भी है, जो सिर्फ अपने बच्चे को आतंकवादी संपर्क के दाग से बचाने के लिए, दुबई भेजना चाहता है। इसी तरह, दूसरी ओर अगर अपनी पुरानी दोस्ती को भूलकर, उग्र-बहुसंख्यकवादी भाषा बोलने लगने वाला पांडे है, तो उसी मोहल्ले का सोनकर तथा उसका एक मित्र भी है, जो अंत तक मुराद अली के परिवार के साथ खड़ा रहता है।

वास्तव में पांडे और सोनकर ने ही बाबरी मस्जिद के ध्वंस के फौरन बाद के दौर में, मुराद अली के परिवार की रक्षा की थी और इस परिवार के लिए उस समय के भयभीत मुसलमानों की हताश प्रतिक्रिया से भिन्न रुख अपनाना संभव बनाया था। फिल्म रेखांकित करती है कि यही साझा हमारे मुल्क की असली शक्ति है। पर यह शक्ति आज खतरे में है। 'मुल्क' बलपूर्वक कहती है कि जिन्होंने 1947 में धर्म और मुल्क के बीच में मुल्क को चुना था, उनका यह देश उतना ही घर है, जितना और किसी का। इसी भरोसे पर मुराद अली, परिवार के बड़े बेटे को यह कहने पर कि पूरा परिवार उसके साथ बाहर चला जाए, एक सरल सवाल से निरुत्तर कर देता है—'क्यों चले जाएं? कहां चले जाएं? हमारा और कौन सा घर है?
 

Source:Agency