Breaking News

Today Click 29

Total Click 281553

Date 17-12-18

करुणानिधि : दूरदृष्टि संपन्न नेता

By Sabkikhabar :09-08-2018 09:30


डीएमके प्रमुख करुणानिधि के निधन के साथ ही भारतीय और तमिल राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय खत्म हो गया। 17 बरस की किशोरावस्था से उनकी राजनीतिक सक्रियता प्रारंभ हुई, जो जीवन के अंतिम दौर तक कायम रही। बीते दो-तीन बरसों में ही अस्वस्थता और बढ़ती आयु के कारण वे सक्रिय राजनीति से दूर रहे, लेकिन इससे उनकी लोकप्रियता या जनता के साथ उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ। बीते कुछ दिनों में कावेरी अस्पताल के बाहर उनके समर्थकों की भीड़ इसका प्रमाण है। करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे और लगभग 60 साल तक विधायक रहे। राजनीति में ऐसा मुकाम बहुत कम लोगों को हासिल होता है। वे सियासत में ही नहीं, मनोरंजन में भी सिद्धहस्त थे और यही कारण है कि जनता उन्हें प्यार से कलाइग्नर यानी कलामर्मज्ञ कहती थी। उन्होंने कई तमिल फिल्मों की पटकथा लिखी और इस लेखन में उनके विद्रोही तेवर को देखा जा सकता था। यही तेवर उनकी राजनीति की भी पहचान थे। उन्होंने हिंदी विरोध के साथ राजनीति शुरु की, लेकिन बाद में यह हिंदू धर्म और तत्कालीन समाज में फैली कुप्रथाओं और रूढ़ियों के विरोध में बदल गई।

अंधविश्वास, धार्मिक कट्टरता और उस वक्त की सामाजिक व्यवस्था पर उन्होंने फिल्मी लेखन में भी सवाल उठाए और राजनीति के मंच से भी। वे सही अर्थों में दूरदृष्टि रखने वाले नेता थे और इसकी बानगी उनके कई फैसलों में देखी जा सकती है। 

डीएमके की पहली सरकार में करुणानिधि को लोक निर्माण और परिवहन मंत्रालय मिला, तो बतौर परिवहन मंत्री उन्होंने राज्य की निजी बसों का राष्ट्रीयकरण किया और राज्य के हर गांव को बस के नेटवर्क से जोड़ना शुरू किया। इससे गांव और ग्रामीण कितने लाभान्वित हुए होंगे, यह समझा जा सकता है। करुणानिधि ने अपनी पहली सरकार के कार्यकाल में जमीन की हदबंदी को 15 एकड़ तक सीमित कर दिया गया था, यानी कोई भी इससे ज़्यादा जमीन का मालिक नहीं रह सकता था। यह फैसला उन पर साम्यवादी सोच का प्रभाव था। इस दौरान करुणानिधि ने शिक्षा और नौकरी में पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण की सीमा 25 से बढ़ाकर 31 प्रतिशत कर दी। उन्होंने पिछड़ों में अति पिछड़ा वर्ग बनाकर उसे पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और जनजाति कोटे से अलग, शिक्षा और नौकरियों में 20 फीसदी आरक्षण दिया। $कानून बनाकर सभी जातियों के लोगों के मंदिर के पुजारी बनने का रास्ता सा$फ किया गया। करुणानिधि ने एक कानून बनाकर लड़कियों को भी पिता की संपत्ति में बराबर का हक दिया और राज्य की सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण दिया।

उन्होंने सरकारी राशन की दुकानों से महज एक रुपए किलो की दर पर लोगों को चावल देना शुरू किया। स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का क्रांतिकारी काम भी करुणानिधि ने किया। जाति प्रथा की बंदिशों को तोड़नेे के लिए उन्होंने सामाथुवापुरम के नाम से अनोखी मॉडल हाउसिंग योजना शुरु की जिसके तहत दलितों और ऊंची जाति के हिंदुओं को मुफ़़्त में इस शर्त पर घर दिए गए कि वो जाति के बंधन से आजाद होकर साथ-साथ रहेंगे। राजनीति के जरिए सामाजिक सुधार करने वाले ऐसे नेता आज बिरले ही हैं। वे राज्यों की स्वायत्तता के भी मुखर पक्षधर थे। उन्होंने 1969 में जस्टिस राजामन्नार की अगुवाई में केंद्र-राज्य संबंधों की जांच के लिए कमेटी बनाई थी, जिसने केंद्र और राज्यों के संबंध कैसे हों, इस को लेकर कई सि$फारिशें की थीं। करुणानिधि की कोशिशों से ही राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपने राज्य में स्वतंत्रता दिवस पर झंडा $फहराने का अधिकार मिल सका। करुणानिधि की जनोन्मुखी राजनीति ने ही उन्हें तमिलनाडु में इतना लोकप्रिय बनाया। हालांकि राजनीति के मैदान में उन्हें चुनौतियां भी खूब मिलीं और सबसे ज्यादा टक्कर जे.जयललिता ने दी। तमिलनाडु की सत्ता में द्रमुक और अन्नाद्रमुक की आवाजाही बारी-बारी से होती थी, लेकिन दो बार से द्रमुक सत्ता से बाहर रही।

करुणानिधि के राजनैतिक वारिस और द्रमुक के नेताओं के लिए इस लोकप्रियता को वापस हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। बीते बरस जे.जयललिता की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक में भी फूट देखने मिली है और उसके किसी नेता में अभी उनके जैसा करिश्मा नहीं है।

जे.जयललिता और अब करुणानिधि की मौत के बाद तमिल राजनीति में एक बड़ा शून्य बन गया है, जिसे भरने के लिए बहुत से नेता लालायित होंगे। लेकिन उसके लिए न केवल इन नेताओं जैसी जनप्रियता की दरकार होगी, बल्कि राजनीतिक सूझबूझ और दूरदृष्टि भी जरूरी होगी। 
 

Source:Agency