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पथ के दावेदार

By Sabkikhabar :02-08-2018 07:12


2019 के आम चुनाव में इस बार मुकाबला भाजपा बनाम महागठबंधन होगा, यह अब कुछ-कुछ नजर आने लगा है। हालांकि इस महागठबंधन में कौन से दल शामिल होंगे और किसकी क्या हैसियत रहेगी, इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। महागठबंधन बनाने के लिए कांग्रेस काफी समय से कोशिश कर रही है। बीच-बीच में राहुल गांधी का जोश भी ऐसा नजर आता है कि मानो वे सबका नेतृत्व करने के लिए तैयार हों। कर्नाटक चुनाव में उन्होंने अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार होने की संभावनाओं को बल भी दिया था। लेकिन कांग्रेस को फिर से नेतृत्व का सुख थाली में परोस कर मिलने वाला नहीं है। अभी कई दिग्गज उन्हें चुनौती देने के लिए तैयार हैं, जिनमें सबसे ऊपर ममता बनर्जी नजर आ रही हैं। वे काफी चतुराई और सलीके से अपने पत्ते खोल रही हैं। एक ओर वे भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल रही हैं, तो दूसरी ओर दक्षिण से लेकर उत्तर तक अपने साथी तैयार कर रही हैं। टीआरएस के चंद्रशेखर राव ने जब गैरभाजपा, गैरकांग्रेस मोर्चे का विचार रखा था, तो ममता बनर्जी ने उसे समर्थन दिया था। लेकिन वे कांगे्रस के साथ बन रहे संभावित महागठबंधन में भी साथ आने को उत्सुक दिखती हैं। अभी दिल्ली में दो दिनों में उन्होंने शरद पवार, सुप्रिया सुले, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल सभी से मुलाकात की। संसद में लालकृष्ण आडवानी के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लिया। बीते दिनों नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने दीदी को दिल्ली ले जाएंगे, जैसी बात कही थी। जिसका राजनीतिक मतलब यही निकलता है कि वे ममता बनर्जी को केेंद्र की सत्ता में देखना चाहते हैं। हालांकि नेशनल कांफ्रेंस में फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला दोनों ही राहुल गांधी को महागठबंधन की धुरी के तौर पर देखने की बात कह चुके हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सहयोगी जद एस के एच डी देवगौड़ा भी राहुल गांधी में प्रधानमंत्री की संभावनाएं देखते हैं। भाजपा इस संभावित महागठबंधन का यही कहकर मजाक बनाती है कि उसका नेतृत्व कौन करेगा, यही तय नहीं है। 2004 में भी माहौल ऐसा ही था, जब भाजपा यह मानकर चल रही थी किजीत उसकी होगी और लालकृष्ण आडवानी प्रधानमंत्री बनेंगे, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगियों के पास सोनिया गांधी के अलावा कोई चेहरा नहीं था, और उन्होंने प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी कभी नहीं की थी। बहरहाल, तब भाजपानीत एनडीए को हार देखनी पड़ी और डा.मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। क्या इस बार वैसा ही कोई इतिहास दोहाराया जाएगा? फिलहाल इस बारे में कोई कयास लगाना कठिन है। क्योंकि मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, मायावती, शरद पवार ये तमाम दिग्गज अपनी दावेदारी ठोंक सकते हैं। उधर दक्षिण में चंद्रबाबू नायडू भी अलग मोर्चा बनाने की तैयारी में हैं, जो शायद आखिर में महागठबंधन का ही हिस्सा बनें। और अगर ऐसा हुआ तो वे भी शायद दावेदारों की सूची में शामिल हो जाएं। वैसे राजनैतिक विश्लेषकों की मानें को ममता बनर्जी भाजपा की गोलबंदी के लिए काफी चतुराई भरे कदम उठा रहे हैं। अगले साल 19 जनवरी को कोलकाता में वे एक बड़ी रैली करने वाली हैं, जिसका स्वरूप एंटी-बीजेपी होगा। भाजपा विरोधी नेताओं से मुलाकात कर वे उन्हें रैली में आने का निमंत्रण दे रहीं हैं। इस कवायद से यह नजर आता है कि महागठबंधन का नेतृत्व करने की आकांक्षा कहीं न कहीं ममता के भीतर है। हालांकि वे इस बारे में कुछ बोलने से वे बच रही हैं। ममता का कहना है कि इसे लेकर अनुमान जताने की कोई जरूरत नहीं है, लोग तय करेंगे। 

बहरहाल, महागठबंधन का नेतृत्व भले अभी तय न हो, लेकिन यह तो तय है कि ममता बनर्जी की दिल्ली आने की महत्वाकांक्षा सिर उठाने लगी है। अब इस महत्वाकांक्षा का रूप आगे जाकर एंटी बीजेपी ही रहता है या एंटी कांग्रेस भी हो सकता है, यह देखना दिलचस्प होगा। वैसे भारत में गठबंधन की राजनीति में यह देखना भी कम रोचक नहीं है कि दिल्ली आने के कितने दावेदार हैं, जबकि पथ क्या होगा, यही तय नहीं है। 
 

Source:Agency