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कहीं दूसरा कारगिल न बन जाए डोकलाम!

By Sabkikhabar :30-07-2018 07:58


डोकलाम में चीनी सैनिकों की गतिविधियों को भारतीय सेना ने यह कहकर खारिज कर दिया है कि वहां सेना की अदला-बदली हो रही है। पर यह एक संयोग है कि जब कारगिल से घुसपैठियों की पहली खबर आई थी, तो भी दिल्ली में भाजपा की ही सरकार थी, और उस सूचना पर कार्रवाई की गई होती तो कारगिल के युद्ध में हमारे सैनिकों को जान न गंवानी होती। डोकलाम के बाद उत्तराखंड के चमोली जिले के तनजुन ला में चीनी सैनिकों के भारतीय सीमा में 200 मीटर अंदर तक देखे जाने की सूचना मिली थी। इन खबरों के बाद चमोली के जिला प्रशासन ने 18 अधिकारियों का एक दल मौके के लिए रवाना किया था। हालांकि, आधिकारिक तौर पर चीनी सैनिकों के घुसपैठ की पुष्टि नहीं हुई। 

कहीं चीन का डोकलाम हमारे लिए दूसरा कारगिल तो नहीं बन रहा। यह बात इसलिए भी मौजूं है कि 26 जुलाई को देश ने 'कारगिल विजय दिवस' के रूप में मनाया। पर आज से ठीक 20 साल पहले भारतीय सेना के जांबाजों ने गड़ेरियों की शक्ल में घुस कर हमारी चोटियों पर कब्जा कर बैठी पाकिस्तानी फौज को हलके में लिया था, जिसका नतीजा दो महीने के युद्ध के रूप में सामने आया। कारगिल युद्ध हमें हमारे वीर जवानों की कुर्बानियों के साथ पाकिस्तान के दोहरे चरित्र और हमारी उन भूलों की याद भी दिलाता है, जिसके चलते देश ने अपने 34 अफसर और 493 जवानों को शहीद के रूप में खोया। इस जंग में हमारे 1363 जवान, अफसर घायल भी हुए। हालांकि पाकिस्तान ने इस लड़ाई में अपने केवल 357 सैनिकों के खेत रहने की बात स्वीकारी लेकिन वास्तव में इस युद्ध में पाकिस्तान के तकरीबन तीन हजार जवान मारे गए थे। सच तो यह है कि कारगिल की जंग देश की सेना के अफसरों और जवानों के अदम्य साहस की दास्तां है। एक तरफ यह स्क्वैड्रन लीडर अजय आहूजा, लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया, कैप्टेन विक्रम बत्रा, लेफ्टिनेंट हनीफउद्दीन, हवलदार अब्दुल करीम, और राइफलमैन संजय कुमार जैसे जांबाज सैनिकों के बलिदान की गाथा है तो दूसरी ओर यह राजनीतिक भूल, विश्वासघात और खुफिया व्यवस्था के विफल होने की दास्तां भी है। अब एक बार फिर चीनी सीमाओं पर वैसे ही हालात बन रहे हैं।

हालांकि डोकलाम में चीनी सैनिकों की गतिविधियों को भारतीय सेना ने यह कहकर खारिज कर दिया है कि वहां सेना की अदला-बदली हो रही है। पर यह एक संयोग है कि जब कारगिल से घुसपैठियों की पहली खबर आई थी, तो भी दिल्ली में भाजपा की ही सरकार थी, और उस सूचना पर कार्रवाई की गई होती तो कारगिल के युद्ध में हमारे सैनिकों को जान न गंवानी होती। डोकलाम के बाद उत्तराखंड के चमोली जिले के तनजुन ला में चीनी सैनिकों के भारतीय सीमा में 200 मीटर अंदर तक देखे जाने की सूचना मिली थी। इन खबरों के बाद चमोली के जिला प्रशासन ने 18 अधिकारियों का एक दल मौके के लिए रवाना किया था। हालांकि, आधिकारिक तौर पर चीनी सैनिकों के घुसपैठ की पुष्टि नहीं हुई। आईटीबीपी के सूत्रों का कहना है कि इसी महीने 3,6,8 और 10 जुलाई को चीनी सैनिक सीमा रेखा तनजुन ला से 200 मीटर तक अंदर घुसे। 8 जुलाई को 32 सैनिक वहां गाड़ियों और घोड़ों में नजर आए। 10 जुलाई को पांच मोटर साइकिलों में फिर से चीनी सैनिक वहां देखे गए। आईटीबीपी के विरोध के बाद सैनिक वापस लौट गए।

कारगिल युद्ध की शुरुआत को याद करें तो साल 1999 में संभवत: 3 मई को कारगिल के बटालिक सेक्टर के गारकॉन गांव निवासी ताशि नामग्याल अपने एक साथी त्सेरिंग मोरूप के साथ घर से थोड़ी दूर ही गुम हो गई याक को ढूंढने निकले थे कि उनकी नजर काले कपड़े पहने हुए छह बंदूकधारियों पर पड़ी, जो पास की पहाड़ी चोटी पर पत्थरों को हटा कर रहने की जगह बना रहे थे। इन्होंने आगे नजर दौड़ाई तो काली सलवार कमीज पहने कई लोगों को बर्फीले इलाकों में इस्तेमाल की जाने वाली सफेद जैकेट पहने पहाड़ों पर चढ़ते देखा। लंबी दाढ़ी वाले इन लोगों के हाव-भाव कुछ अलग थे। वे स्थानीय तो बिल्कुल नहीं थे। उन्होंने यह बात हिंदुस्तानी जवानों, फौजी अफसरों को बताई। उन्होंने इस खबर को सुना और बात आगे बढ़ा दी। पर इसको इतना गंभीर नहीं लिया गया। कहते हैं, इस सूचना के महज दो दिन बाद लेफ्टिनेंट जनरल निर्मल चंद्र विज, जो मिलिट्री ऑपरेशंस के डायरेक्टर जनरल भी थे, खुद कारगिल दौरे पर पहुंचे थे, जहां उनकी मुलाकात वहां तैनात जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल वीएस बधवार और कारगिल ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर सुरिंदर सिंह से भी हुई थी, पर किसी ने उनसे काली-सलवार कमीज पहने घुसपैठियों की बात नहीं की। शायद वहां तैनात फौजी अफसरों को अपने स्तर पर इस मामले को निबटा लेने का भरोसा था।

10 मई को तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वीपी मलिक पोलैंड और चेक गणराज्य की कंपनियों के साथ सेना को गोला-बारूद की आपूर्ति के करार के लिए निकल गए। तब तक इधर बटालिक, मुश्कोह और द्रास में हलचल बढ़ गई थी। फिर भी हर शाम जब वह खोज-खबर लेने के लिए सेना मुख्यालय फोन करते तो उन्हें सब-कुछ ठीक-ठाक होने या छुटपुट वारदात की बात ही बताई जाती। लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनकी यूनिट के छह जवान काकसार पहाड़ों पर गश्त करने निकले और वापस नहीं लौटे तो खोज-खबर हुई। सेना की ओर से एक दल को जांच के लिए भेजा गया। काफी दिनों तक तो देश को यही बताया गया कि पाकिस्तान की तरफ से छुटपुट गोलाबारी हो रही है और उसका माकूल जवाब दिया जा रहा है। बाद में सौरभ कालिया और जवानों के क्षत-विक्षत शव लौटाए गए। तब तक रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस को गड़बड़ी का कुछ-कुछ आभास होने लगा था। वह खुद कारगिल के दौरे पर चले गए। जहां सैन्य अफसरों ने उनसे कहा कि कारगिल में सही हालात का जायजा 48 घंटे बाद ही मिल पाएगा। पर फर्नांडिस ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर ऐलान कर दिया कि, 'हां, कुछ 100-150 आतंकवादी घुस आए हैं। उन्हें 48 घंटों में बाहर निकाल दिया जाएगा।' जबकि सच्चाई यह थी कि तब तक भारतीय सेना निचले स्थान पर होने और खराब मौसम की वजह से ऊपर की चोटियों का सही आकलन नहीं कर पा रही थी। 17 मई को चोटियों का पहला हवाई सर्वेक्षण किया गया।

21 मई को जब दूसरा हवाई जहाज द्रास, कारगिल और बटालिक की चोटियों की सही स्थिति जानने के लिए गया तो वहां उस पर स्टिंगर मिसाइल से हमला हुआ। पायलट, पेरूमल दुर्घटनाग्रस्त जहाज को सकुशल वापस ले आए और आकर उन्होंने जब वहां के हालात बताए, तब हमें पता चला कि वे 'काली सलवार वाले' पूरे लाव-लश्कर से साथ एक-एक चोटी पर मजबूती से बैठे हैं और उनकी संख्या 100-150 की नहीं, बल्कि पूरी-पूरी आर्मी यूनिट जैसी है, जनरल मलिक 21 मई को भारत वापस लौटे और सैन्य अधिकारियों से बैठक के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिले। सेना के मुखिया ने प्रधानमंत्री को बताया कि लाहौर समझौते की आड़ में उनकी पीठ पर छुरा घोंप दिया गया है।

26 मई, 1999 को सेना ने 'ऑपरेशन विजय' और एयर फोर्स ने 'ऑपरेशन सफेद सागर' की शुरुआत की और ठीक दो महीने बाद यानी 26 जुलाई को यह भारतीय सेना की जीत के साथ खत्म हुआ। पहाड़ की लड़ाई में फायदा उसे मिलता है जो ऊपर बैठा होता है, पर कई मौकों पर जीत उसकी होती है जो नीचे है, क्योंकि नीचे वाली सेना अपने साजो-सामान को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकती है। फिर भी  भारतीय जवानों के लिए स्थिति कठिन थी। घुसपैठिए ऊंची पहाड़ियों पर भारी हथियार, गोला बारूद लेकर बैठे थे और भारतीय जवानों के लिए गोलियों की बौछार के बीच में पहाड़ियों की चोटियों पर पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण था।

अंतत: जीत भारत की हुई थी, लेकिन नुकसान भी हमारा ज़्यादा हुआ था। आर्थिक तौर देश को लगभग दो हजार करोड़ की चपत लगी। कारगिल युद्ध में 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे। 300 से ज्यादा तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों से रोजाना करीब 5,000 बम फायर किए जाते थे। लड़ाई के अहम 17 दिनों में हर रोज हर आर्टिलरी बैटरी से एवरेज एक मिनट में एक राउंड फायर किया गया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी, जिसमें किसी एक देश ने दुश्मन देश की सेना पर इतनी ज्यादा बमबारी की थी। पर ऐसे में जब कि पाकिस्तान में कट्टर भारत-विरोधी सेनापरस्त शासक के शासन संभालने का माहौल है, क्या देश चीन से भी जंग लड़ने की स्थिति में है। हम अपनी सेनाओं पर आखिर सियासी फैसले क्यों थोपते हैं?
 

Source:Agency