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इंसानियत की हत्या

By Sabkikhabar :24-07-2018 06:37


राजस्थान में गौ रक्षकों के हाथों फिर एक इंसान की मौत हो गई। गौरक्षा के लिए ताजा शिकार अलवर के रकबर को बनाया गया है। देश में राजस्थान अकेला ऐसा राज्य है जहां गो कल्याण मंत्रालय है। लेकिन यहां अल्पसंख्यकों को जिस तरह निशाना बनाया जा रहा है, उससे तो लगता है कि एक इंसानियत कल्याण मंत्रालय भी बनाना चाहिए, ताकि धर्म के नाम पर होने वाली यह मार काट रोकी जा सके। असद्दुदीन ओवैसी ने भले ही राजनीति के तहत ट्वीट किया है, लेकिन बात सही कही है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गाय को जीने का मौलिक अधिकार है और इसके नाम पर मुस्लिम की हत्या, उनके पास जीने का मौलिक अधिकार नहीं है। ओवैसी ने मोदी सरकार के चार सालों को लिंच राज करार दिया। अगर आंकड़ों को देखें तो इसमें कुछ अतिशयाोक्ति नहीं लगती। पहलू खान से लेकर रकबर तक उन्मादी भीड़ ने भारत के विभिन्न राज्यों में कुल मिलाकर 44 लोगों की हत्या की है, ये सरकार के ही आंकड़े हैं।

राजस्थान, झारखण्ड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, त्रिपुरा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, असम इन तमाम राज्यों में गोरक्षा के नाम पर हत्याएं हुई हैं। इसके अलावा अल्पसंख्यकों को और भी अन्य कारणों से प्रताड़ित किया गया है। लेकिन फिलहाल बात गौ रक्षा की ही करते हैं।

गाय को बड़े शातिराना तरीके से हिंदू बना दिया गया, और उस मूक, निरीह पशु को पता भी नहीं होगा कि उसके नाम पर किस तरह खूनखराबा हो रहा है। दुनिया में इंसानों के बाद जानवरों को भी धर्म के आधार पर बंटने का खेल शायद अकेले भारत में ही खेला गया है। गाय को हिंदू धर्म का प्रतीक बनाकर, उसे माता कहकर अगर उसकी उतनी ही सेवा और देखभाल भी की जाती, तो यह स्वांग समझ में आता।

लेकिन गाय तो केवल हिंदुत्व की राजनीति का परचम लहराने का मााध्यम है। गायों की असल हालत जो है, उसे देखकर तो इन गौरक्षकों का खून कभी नहीं खौलता। इसी राजस्थान में दो साल पहले हिंगोनिया की गौशाला में सैकड़ों गाएं मर गई थीं। छत्तीसगढ़ में भी गौशाला में गाएं मरी पाई गई थीं। अभी नूरपुर, कांगड़ा के गौसदन से गायों के मरने की खबर आई है। सड़क किनारे कचरे के ढेर से पालीथिन समेत सड़ा-गला खाना खाकर न जानें कितनी गाएं अकाल मौत की शिकार होती हैं, लेकिन कभी गौरक्षकों ने कूड़ों के ढेर को साफ नहीं किया होगा, या गायों को प्रदूषित खाना खाने से बचाया होगा। न जाने इन गौरक्षकों को कौन सी दिव्य दृष्टि से नजर आ जाता है कि कोई मुसलमान गायों की तस्करी कर रहा है और फिर तुरंत ही भीड़ एकत्र हो जाती है, ताकि इंसाफ कर सके। जो खबर आम जनता को लग जाती है, वह पुलिस को नहीं मिलती, यह भी बड़ी आश्चर्यजनक बात है।

अगर गाय की तस्करी हो रही है, या कोई अवैध काम हो रहा है, तो उसमें कार्रवाई करने का हक पुलिस को है। लेकिन लगता है कि इस भीड़ को पुलिस पर भरोसा नहीं है। क्या यह मोदी सरकार की बड़ी विफलता नहीं है कि उसके शासन में लोगों का भरोसा कानून-व्यवस्था से उठ रहा है और वे खुद इंसाफ करने पर उतारू हो रहे हैं? क्या इस के लिए राजनीतिक पदों पर बैठे जिम्मेदार लोगों को इस्तीफे नहीं देने चाहिए कि वे जनता का भरोसा बनाए रखने में नाकाम रहें। 

अलवर मामले में तो पुलिस खुद ही संदेह के दायरे में आ रही है। एफआईआर के मुताबिक पुलिस को इस घटना की जानकारी रात करीब एक बजकर 41 मिनट पर मिली थी। उसे यह सूचना एक 'गोरक्षक' नवल किशोर शर्मा ने फोन से दी थी, जो विहिप से जुड़ा है। पुलिस का दावा है कि इसके बाद वह 15-20 मिनट में घटनास्थल पर पहुंच गई थी। लेकिन भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा का कहना है कि उनके कार्यकर्ताओं ने रकबर को पकड़ कर पुलिस के हवाले किया। यानी हिरासत में पिटाई से रकबर की मौत हुई। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि जब पुलिस घटनास्थल पर थोड़ी ही देर में पहुंच गई थी, तो 4 किमी दूर अस्पताल ले जाने में सुबह के 4 बजे कैसे बज गए। अगर कोई घायल सामने है तो पुलिस का पहला कर्त्तव्य उसे इलाज मुहैया कराना है।

लेकिन खबरों के मुताबिक पुलिस ने पहले गायों को गोशाला पहुंचाया, फिर रकबर को लेकर रवाना हुई, रास्ते में चाय पी और जब तक अस्पताल पहुंचे, रकबर जिंदगी की जंग हार चुका था। यह मात्र एक इंसान की हत्या नहीं है, इंसानियत का गला घोंटने जैसा काम है और इससे भी बढ़कर लोगों की संवेदनाएं कुचलने का अपराध है, क्योंकि बार-बार ऐसी घटनाएं होने से अब लोगों को इससे फर्क नहीं पड़ता कि उनके समाज में सरेआम किसी को पीट-पीटकर मार डाला गया। यह संवेदनहीनता हमें एक खतरनाक भविष्य की ओर ले जा रही है। बेहतर है हम धर्म के नाम पर होने वाली इस मार-काट से अपने समाज को बचाएं, वर्ना हम ही नहीं बचेंगे। 

Source:Agency