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तलाक को राजनीति से जोड़ना कितना उचित?

By Sabkikhabar :16-07-2018 08:36


जहां तक धर्म और मान्यताओं का सम्बन्ध है, इसका अवतरण विभिन्न युगों और कालों में होता रहा है। उसमें होने वाले परिवर्तन भी समाज की आवश्यकताओं पर निर्भर रहे हैं। इसलिए महिलाओं के सम्बन्ध में उन पर एकांगी विचार उचित नहीं है।  सम्पत्ति के अधिकार में उसे शामिल किया जाना भी उसकी विशिष्टताओं में ही आयेगा। उसकी अन्य सामाजिक स्वतंत्रताओं के निर्धारण के पीछे कारणों की खोज भी करना होगा कि जिस समाज में उस धर्म का उदय हुआ, उस काल की मान्यताएं क्या थीं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आजमगढ़ के पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के उद्घाटन समारोह सम्बोधित करते हुए कांग्रेस पर हमला बोला और कहा कि वह तो केवल मुस्लिम पुरुषों की पार्टी है, उसमें शामिल महिलाओं की नहीं। यही कारण तो है कि वह मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्याय तथा तीन तलाक जैसे प्राविधानों के विरुद्ध नहीं है। नरेन्द्र मोदी की अपनी भारतीय जनता पार्टी के नाम से अलग पार्टी है जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुषांगिक राजनैतिक संगठन भारतीय जनसंघ से गुजरती हुई नये नाम तक पहुंची है। वह इस समय देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल ही नहीं बल्कि 22 राज्यों तथा केन्द्र में सत्ताारूढ़ भी है। इसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह लोकतांत्रिक पद्धति, जिसे हमने स्वीकार किया है, उसकी परिणति है। इसलिए बहुदलीय शासन व्यवस्था वाले लोकतांत्रिक देश में परिवर्तन को अवगुण नहीं, गुण ही माना जाता है।

अब जहां तक देश के सबसे बड़े अल्प संख्यक समुदाय मुस्लिमों की महिलाओं की स्थिति का सम्बन्ध है, जिसे कुछ लोग अन्याय के रूप में देखते हैं, उसमें परिवर्तन उस समुदाय की जनाकांक्षाओं पर ही आधारित होगी। जहां तक समाज में पुरुष और महिलाओं के सम्बन्ध में मान्यताओं का प्रश्न है, इस रूप में अभी इस्लाम को पैदा हुए कुल 1500 वर्ष भी नहीं हुए हैं लेकिन जिसे हम भेदभाव के रूप में देखते हैं, वह उसके पहले से विद्यमान है। इसलिए भेदभाव का जन्म कैसे हुआ, उसके स्वरूप को किसी एक धर्म तक सीमित रखकर सही ढंग से न देख सकते हैं और न इसका समाधान निकाल सकते हैं, लेकिन जहां तक सृष्टि के विकास का सम्बन्ध है, इसमें लैंगिक भूमिका का अपना महत्व है। यह धर्म, मान्यता और विश्वासों पर ही आधारित नहीं रही है।

माना यही जाता है कि यह सृष्टि के आरम्भ से ही रहा है।  महिलाओं को कोई कितना कमतर या हीन माने, लेकिन सृष्टि का संचालन बिना उनके संभव नहीं था।  इस विकास में उन्हें प्राकृतिक रूप से जो विशिष्टता प्राप्त हैं, उसे उनकी कमजोरी नहीं माना जा सकता। इसलिए उन विशिष्टताओं के कारण उन्हें आज के युग परिवेश में तो किसी रूप में हीन माना ही नहीं जा सकता। यही कारण है कि देश की स्वतंत्रता के बाद जिस संविधान को अंगीकार किया गया है, उसमें लैंगिक भेदभाव का निषेध किया गया है। अब इस रूप में मुस्लिम मान्यताओं से पूर्व की व्यवस्थाओं का भी स्मरण करना होगा। इस रूप में जिन धर्मों में महिलाओं को नर्क की खान कहा गया है, उसकी सराहना तो नहीं ही की जा सकती।

जहां तक धर्म और मान्यताओं का सम्बन्ध है, इसका अवतरण विभिन्न युगों और कालों में होता रहा है। उसमें होने वाले परिवर्तन भी समाज की आवश्यकताओं पर निर्भर रहे हैं। इसलिए महिलाओं के सम्बन्ध में उन पर एकांगी विचार उचित नहीं है।  सम्पत्ति के अधिकार में उसे शामिल किया जाना भी उसकी विशिष्टताओं में ही आयेगा। उसकी अन्य सामाजिक स्वतंत्रताओं के निर्धारण के पीछे कारणों की खोज भी करना होगा कि जिस समाज में उस धर्म का उदय हुआ, उस काल की मान्यताएं क्या थीं। क्या उसे कम किया गया या बढ़ाया गया। जिस अरब में इस्लाम का जन्म हुआ, उसमें शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान का विस्तार कितना हुआ था। यही कारण  है कि सारे विश्व में विकास का क्रम एक जैसा नहीं रहा है, महिलाओं की स्थिति भी इससे प्रभावित हुई है।

जहां तक भारत के उन धार्मिक ग्रन्थों का सवाल है, जिसे कुछ लोग हिन्दुत्व की विशेषता के रूप में देखते हैं, उसमें युग के अनुसार कई परिवर्तन हुए हैं। जहां 'स्त्री शूद्रो न धीयताम' की मान्यता थी। उन्हें पढ़ने लिखने के अधिकार ही नहीं थे। वह 1400 वर्ष पूर्व इस्लाम के जन्म के पहले से ही विद्यमान थी। इसलिए महिलाओं को समानता के अधिकारों, स्वतंत्रताओं, मान्यताओं, विवाह की आयु तथा सार्वजनिक जीवन की भूमिकाओं के सम्बन्ध में समय-समय पर परिवर्तन हुए हैं। इस रूप में भारत जैसे विशाल बहुधर्मी देश में मान्यतायें भी अलग थीं इसीलिए स्वतंत्रता के बाद जिस हिन्दू कोड बिल की रचना करके हिन्दू समुदाय को जोड़ा गया, उसमें उसे तलाक और पुनर्विवाह के अधिकारों से सम्पन्न करना पड़ा।

यह बात दूसरी है कि इस कानून की परिधि में धर्म को वैयक्तिक विश्वास और  आस्था का क्षेत्र मानकर  उसे दूसरे धर्मो में शामिल नहीं किया गया इसलिए वह  अपनी मान्यताओं के अनुसार चलता रहा, लेकिन समाज में शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान के साथ ही जो जागरूकता आ रही थी, उसने इस समुदाय की महिलाओं को भी प्रभावित  किया। इसलिए पुरातन मान्यताओं के  विपरीत संवैधानिक अदालतों में यह प्रसंग उठे और उनके लिए स्वीकृति के आन्दोलन भी चले। उसमें महिलाओं को तलाक की पुरानी पद्धति के सम्बन्ध में यह सवाल उठा कि यह एकतरफा नहीं बल्कि इसमें दोनों पक्षों को सुना जाना चाहिए। इसीलिए तीन तलाक के  विधान पर भी एक समुदाय का एकाधिकार नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती का विषय बनाया गया।

जहां तक प्रधानमंत्री द्वारा अपनी प्रतिद्वन्दी पार्टी कांग्रेस के विरुद्ध उसके प्रयोग का सम्बन्ध है, दोनों अलग-अलग विश्वासों एवं व्यवस्थाओं पर आधारित हैं। इसलिए जिस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यक्ति का मूल अधिकार माना गया है, उसके अनुसार विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता से किसी को वंचित करना भी उचित नहीं है। तलाक वैवाहिक सम्बन्धों को नकारने के लिए प्रयुक्त होता है लेकिन यह एकपक्षीय नहीं, बल्कि स्वाभाविक मानवीयता पर आधारित होना ही  चाहिए। किस समाज में जागरूकता किस रूप में विस्तारित हो रही है, यदि इसे चेतना कहा जाय तो इसका विस्तार निरंतर होता ही रहेगा। यह व्यक्ति की मान्यताओं को प्रभावित करेगा ही। उसे रोका नहीं जा सकता। लेकिन तलाक तो मात्र सम्बन्ध विच्छेद का एक रूप है, इसलिए भारत जैसे देश में इसमें समानता नहीं है। इसीलिए आदिवासी समुदाय के कुछ वर्गो में तो यह 'खपड़  कुच्ची' के रूप में विद्यमान है जिसमें साबुत खपड़ा पति- पत्नी अपने पैरों से तोड़ कर अपने सम्बन्धों को समाप्त कर लेते हैं।

इसी प्रकार जिसे श्रमशील वर्ग की व्यवस्था कहते हैं, उसमें तलाक सहज और साधारण रूप में प्रयुक्त होता हैैै क्योंकि इसमें दोनों पक्ष आर्थिक रूप  से एक दूसरे पर आश्रित नहीं होते, इसलिए इन सम्बन्धों को तोड़ने या बनाने में भी उन्हें हिचक नहीं। उन समुदायों में भी वैवाहिक सम्बन्ध विच्छेद की प्रक्रिया आरम्भ हो गयी है जो इसे खंडनीय नहीं बल्कि जीवनभर का पर्याय  मानते थे, सती प्रथा इसका एक उदाहरण है जो महिलाओं पर ही लागू था, पुरुष समुदाय पर नहीं। इसलिए मानना होगा कि समाज में चेतना के विस्तार के फलस्वरूप जो परिवर्तन हो रहे हैं, वह निरन्तर बढ़ते ही जायेंगे। लेकिन जब धर्म को राजनीति से जोड़कर उसका प्रयोग होगा तो उसे अनुचित ही करार दिया जायेगा क्योंकि जाति, धर्म, सम्प्रदाय आदि के आधार पर ऐसा करना भेदभाव तथा घृणा एवं विद्वेष का ही परिचायक और राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास ही माना जायगा। 
 

Source:Agency