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थाइलैंड के जांबाज

By Sabkikhabar :12-07-2018 09:20


घुप्प अंधेरे में, चारों ओर पानी से घिरी गुफा में, बिना सुविधाओं के 17 दिनों तक रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है, लेकिन थाइलैंड के खिलाड़ी बच्चों और उनके कोच ने इस नामुमकिन लगने वाली बात को मुमकिन कर दिखाया है। थाइलैंड की चियांग राई प्रांत की इस गुफा से 12 बच्चों और उनके कोच को सुरक्षित बाहर निकालने में जुटी थाई नेवी सील ने अभियान की सफलता पर फेसबुक पर लिखा कि - हम नहीं जानते कि ये चमत्कार है, विज्ञान है या और क्या है। सभी 13 लोग अब गुफा से बाहर हैं। बचाव टीम का यह लिखना उसकी विनम्रता को दर्शाता है। वैसे वे भी यह जानते हैं कि इंसान की जिजीविषा से बढ़कर कोई चमत्कार इस दुनिया में नहीं है।

23 जून को जब ये बच्चे फुटबाल प्रैक्टिस के बाद इस गुफा में किसी सरप्राइज पार्टी के लिए गए, तो वहां जिंदगी उनके लिए सरप्राइज लेकर खड़ी थी, उन्हें अंदाजा नहीं होगा कि बाहर इतनी बारिश होगी कि गुफा का प्रवेश द्वार बंद हो जाएगा और वे सब वहां फंस जाएंगे। इन बच्चों को खोजने की कोशिश अगले दिन से ही शुरु हो गई थी और 9 दिन बाद ब्रिटेन के दो गोताखोरों ने इन्हें ढूंढ निकाला। भूख, प्यास, ताजा हवा के बिना ये बच्चे बेहद कमजोर थे, लेकिन इनका हौसला कमजोर नहीं पड़ा। इनके जिंदा और सुरक्षित होने की खबर से राहत मिली, लेकिन अब अगली चुनौती पानी से भरे, बेहद संकरे और गहरे रास्ते को पार करने की थी। प्रशिक्षित तैराकों और गोताखोरों को गुफा तक पहुंचने में कम से कम पांच घंटे लग रहे थे और फिर बच्चों को लेकर लौटना और भी जोखिम भरा काम था, क्योंकि वे गोताखोरी नहींजानते थे।

शारीरिक और मानसिक थकान के साथ लगातार 5-6 घंटे पानी में तैरना आसान नहीं होता। बारिश लगातार हो रही थी और गुफा के भीतर और वहां तक पहुंचने वाले रास्ते में पानी का स्तर बढ़ रहा था। पानी को पंप से निकालने की कोशिशें हुईं, बारिश का मौसम खत्म होने तक इंतजार करने पर विचार हुआ, पर उसमें जोखिम ज्यादा था, क्योंकि गुफा में आक्सीजन स्तर कम हो रहा था और ऐसे में बच्चों की जान को खतरा था। इतनी सारी कठिनाइयों के बावजूद न फंसे हुए 13 लोगों ने हिम्मत छोड़ी, न इन्हें बचाने वालों ने। इस अभूतपूर्व मिशन में थाइलैंड का साथ देने दुनिया के कई देश आगे आए। लगभग 90 गोताखोरों ने 432 घंटों में इस कठिन काम को सफलतापूर्वक संपन्न किया। आसपास के लोगों ने भी इस मिशन में अपना योगदान दिया, उन्होंने बचाव कर्मियों के लिए भोजन की व्यवस्था की, उनके कपड़े धोए और माहौल को शांत, व्यवस्थित बनाए रखा।

मीडिया भी सयंमित नजर आया और बेसिरपैर की खबरें ग्राउंड जीरो से लाइव देने की कोई होड़ नहींदिखी। पूरी दुनिया की नजरें बच्चों को बचाने के अभियान में लगी हुई थींऔर जैसे ही तीसरे दिन पूरी फुटबाल टीम के सुरक्षित बाहर आने की खबर आई, डोनाल्ड ट्रंप, थेरेसा मे जैसे वैश्विक नेताओं के बधाई के संदेश आ गए। चियांग राई प्रांत के गवर्नर नारोंगसक ओसोटानकोर्न ने अभियान में शामिल टीम को संयुक्त राष्ट्र टीम, कहा, जो बिल्कुल मुनासिब है। इस टीम के सभी सदस्यों ने निस्वार्थ भाव से केवल बच्चों को बचाने के उद्देश्य से अपनी जान जोखिम में डालकर इस काम को पूरा किया है। इस तरह की घटनाएं यह साबित करती हैं कि दुनिया में स्वार्थी लोग हिंसा, आतंकवाद और लालच की चाहे जितनी अंधेरी गुफाएं बना लें, इन गुफाओं से मासूमों को बाहर निकालने वाले लोग हमेशा जीतेंगे। 

वैसे थाइलैंड में प्रकृति के बंधक बने बच्चे न अंधेरे से डरे, न सामने दिख रहे खतरों से विचलित हुए। जबकि भारत में अक्सर बच्चों को अनदेखे खतरों से अकारण डराया जाता रहता है। कभी अंधेरे का, कभी साधुबाबा के पकड़ लेने का तो कभी भूत-प्रेत का डर बचपन से बिठा दिया जाता है। थाइलैंड की इस घटना से भारतीय समाज को सीख लेने की जरूरत है, ताकि बच्चे काल्पनिक खतरों से भयभीत रहने की जगह वास्तविक खतरों से निपटना सीखें। 

और आखिर में एक बात, इधर थाइलैंड से बच्चों को बाहर निकालने की खबर आई, उधर भारत की राजधानी दिल्ली में एक स्कूल में फीस न देने पर 59 बच्चियों को बंधक बनाने की खबर आई। भूख-प्यास, गर्मी से बेहाल इन बच्चियों ने जब घंटों बाद अपने मां-बाप को देखा तो वे बिलख उठीं। दो पड़ोसी देशों में बच्चों से व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर इन घटनाओं से समझा जात सकता है। 

Source:Agency