By: Sabkikhabar
06-07-2018 08:30

दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में लोकतंत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार ही महत्वपूर्ण है। और उसके काम में दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। बीते कुछ ïवर्षों में दिल्ली सरकार और केेंद्र के बीच अधिकारों की खींचातानी चल रही थी। खासकर आम आदमी पार्टी की सरकार जब से बनी, तब से उपराज्यपाल पर यह आरोप वह लगाती रही कि वे केेंद्र के इशारों पर काम कर रहे हैं।

दिल्ली सरकार के कामकाज में अड़ंगा डाला जाता है, फाइलें अटकाई जाती हैं, अधिकारी बात नहीं सुनते हैं, ये सारी शिकायतें भी निरंतर होती रहीं। हालत यहां तक बिगड़ गई कि निर्वाचित सरकार होने के बावजूद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को धरने और आंदोलन का सहारा लेना पड़ा। हम दुनिया में अपने आपको सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर इतराते हैं, लेकिन राजधानी में ही जो हालात बने हुए हैं, वे लोकतंत्र की मर्यादा की धज्जियां उड़ाते हैं। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लोकतंत्र का ही तकाजा दिया है। दिल्ली सरकार के अधिकारों पर आम आदमी पार्टी की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि सबको संविधान के दायरे में रहकर काम करना चाहिए।

केंद्र और राज्य के बीच रिश्ते सौहार्द्रपूर्ण होने चाहिए। फैसले में साफ कहा गया है कि केवल पुलिस कानून व्यवस्था और जमीन के मामले एलजी के पास होंगे, अन्य सभी मामलों में चुनी हुई सरकार कानून बना सकती है। संविधान पीठ ने कहा है कि एलजी को मंत्रिमंडल की राय का सम्मान करना चाहिए और उसकी राय पर काम करना चाहिए। अगर दिल्ली सरकार और उप-राज्यपाल के बीच किसी विषय पर सहमति नहीं हो तो वह मामला निस्तारण के लिए राष्ट्रपति के पास भेजे जाने का प्रावधान है।

अदालत ने लगे हाथ नसीहत भी दे दी कि दिल्ली में अराजकता की कोई जगह नहीं है। एक मुहावरा है, रीड बिटविन द लाइन्स, यानी जो लिखा गया है, उसमें उस बात को भी समझ लेना, जो नहीं लिखी गई है। तो इस मुहावरे के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने आप सरकार के आंदोलन वाले रवैये की खिंचाई की है, साथ ही एलजी के माध्यम से केेंद्र सरकार को भी साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में एकतरफा शक्ति किसी के पास नहीं होती और शक्ति संतुलन में ही सबका हित है। कायदे से इस फैसले के बाद आप और भाजपा दोनों को खींचातानी खत्म करने की नेकनीयती दिखानी चाहिए थी। लेकिन फैसला आते ही, किसकी जीत हुई, और किसकी हार यह साबित करने का नया खेल शुरु हो गया।

भाजपा इस बात से खुश है कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे को अदालत ने नकार दिया है, तो आप इस बात का जश्न मना रही है कि अब उसके अधिकारों पर एलजी अडं़गा नहीं डाल पाएंगे। इनके बीच अधिकारियों का भी एक तबका है, जिस पर सरकार के निर्णयों को लागू करने की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे भी शायद लोकतंत्र से अधिक अपने अहम को दिखाने की चिंता है। अदालत के फैसले के बाद सर्विसेज विभाग अब एलजी नहीं बल्कि दिल्ली सरकार के अधीन है और नियुक्ति व तबादलों का अधिकार भी दिल्ली सरकार को मिल गया है। अगर एलजी या सर्विसेज विभाग दिल्ली सरकार के फैसलों को नहीं मानेंगे तो प्रशासनिक संकट खड़ा हो जाएगा। यानी कामकाज एक बार फिर ठप्प होगा और इसका खामियाजा आम जनता उठाएगी। लेकिल सर्विसेज विभाग के अफसरों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2016 में आई अधिसूचना के बारे में कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया है, जिसमें अफसरों की नियुक्ति और ट्रांसफर का हक एलजी को दिया गया था। लिहाजा अफसरों ने पुराने हिसाब के मुताबिक काम करने का फैसला किया है जिसमें ये विभाग एलजी के पास था। 

दिल्ली में आगामी तकरार की यह पहली झलक है, फिल्मी भाषा में कहें तो टीजर है, जो बता रहा है कि आगे क्या हो सकता है। जैसे पुलिस, केेंद्र के अधीन ही रहेगी और आप हमेशा की तरह शिकायत करने से बाज नहींआएगी। एलजी और सरकार में मतभेद होने पर एलजी उसे सुलझाने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजेंगे, यानी केेंद्र का दबदबा कायम रहेगा ही। तकरार और टकराव की इस नौबत में अहं को किनारे कर जनता के हितों को सर्वोपरि रखा जाएगा, ऐसी आदर्श स्थिति तो फिलहाल बनती नहीं दिख रही। बड़ा सवाल यह है कि आखिर दिल्ली पर कब्जे की लड़ाई कितनी लंबी चलेगी और कब तक जनता के अधिकार अहंकार की फाइलों में दफन रहेंगे। 
 

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