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क्या परवरिश मिल रही है बेटों को

By Sabkikhabar :02-07-2018 09:17


फिर वैसी ही हैवानियत की खबर, फिर वही पीड़िता के कभी न भरने वाले जख्म, फिर वही सोशल मीडिया पर निंदा का दौर, फिर वही राजनेताओं के पार्टी के झंडों-कार्यकर्ताओं के हुजूम के साथ दौरे, फिर वही दिलासा, सांत्वना, दोषियों को सजा मिलेगी जैसे वादे, फिर वही मुआवजे का खेल, फिर वही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और फिर वही सड़कों पर जनता का जुलूस। अब इस फिर वही को आप किसी भी संदर्भ में पढ़ लें। दिल्ली, उन्नाव, कठुआ, मंदसौर शहर कोई भी हो, अपराध एक जैसा ही है। दिल्ली-उन्नाव की शिकार युवतियां थीं, कठुआ-मंदसौर में सात-आठ साल की बच्चियां। शहर, उम्र, धर्म कोई भी हो, थी तो लड़कियां ही। वही लड़कियां, जिनकी बुनावट में प्रकृति ने शारीरिक संरचना के अलावा लड़कों से कोई अंतर नहीं रखा। उनके पास भी वही दिल और दिमाग है, जो लड़कों में होता है। वे भी वो सारे काम कर सकती हैं, जो लड़के करते हैं।

पहाड़ चढ़ना हो, या गाड़ी चलाना हो या कुश्ती लड़ना हो या युद्ध लड़ना हो, डाक्टर-इंजीनियर-अंतरिक्षयात्री बनना हो या ठेले पर सामान बेचना हो। लड़कों के लिए सुरक्षित-आरक्षित सारे काम लड़कियां कर सकती हैं और यह उन्होंने बार-बार सिद्ध किया है। लेकिन प्रकृति द्वारा दी गई इस बराबरी का अपमान करते हुए, लड़के-लड़कियों में भेद किया जाने लगा। उनके लिए घर-परिवार की चौखट, लक्ष्मण रेखा जैसे अतार्किक मिथक गढ़े जाने लगे। संस्कार, लज्जा, मर्यादा जैसे शब्दों का पहाड़ लड़कियों के सिर पर खड़ा कर दिया गया, ताकि उनका सिर-कंधे-गर्दन झुक ही जाएं, कभी उठे नहीं। लड़कियों को दबाकर पुरुष प्रधान समाज को अपनी प्रधानता बनाए रखने में सहूलियत होती है। अपनी सहूलियत को थोड़ा सभ्य दिखाने के लिए कुछ पाखंड भी रचे गए। जैसे आदर्श पुरुष, रक्षा का वचन देने वाला भाई और न जाने क्या-क्या?

गर्भवती सीता को जंगल में अकेले छोड़ देने वाले राम क्या तब मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं रहते, जब वे फिर से सिंहासन ठुकरा देते और कहते कि मैं भी सीता के साथ वन में जाऊंगा। आखिर सीता भी तो उनके साथ 14 साल वनवास पर रही थीं। क्या पत्नी का साथ देने से उनकी मर्यादा कम हो जाती? आश्चर्य है हम राम राज की कल्पना करते हैं, हर साल रावण का दहन भी करते हैं, लेकिन सतयुग में भी सीता को लड़की होने का दंड मिला था और 21वीं सदी में भी हालात वही हैं। रावण ने सीता को हरने का पाप किया था, लेकिन उन्हें इज्जत के साथ लंका में रखा था। पर क्या असल जीवन में भी खलनायक रावण जैसे होते हैं? वो तो अपने दस चेहरे दुनिया को दिखाता था, यहां हर चेहरे के पीछे कितने भेड़िए छिपे हैं, यह नजर ही नहींआता। समाज की मानसिकता इन चेहरों को छिपाने में मददगार साबित होती है। 

दिल्ली से लेकर मंदसौर तक, बलात्कार की घटनाओं पर मोमबत्ती लेकर निकलने वाले समाज को अब अपनी मानसिकता पर भी विचार करना चाहिए। सरकारें आती-जाती रहती हैं, इसलिए सरकार से सुरक्षा की उम्मीद बेकार है। आज के हुक्मरान कहींमामा बनकर लड़कियों के हितैषी बने हैं, तो कहीं 56 इंच की छाती जैसे भद्दे वाक्य बोलकर अपनी वीरता का मौखिक प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या केवल जनप्रतिनिधि और सत्ता में होने के नाते इन पर यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे आम जनता की हिफाजत करें, इसके लिए पुरुषवादी संवाद बोलकर क्या ये पुरुषप्रधान समाज को ही बढ़ावा नहीं दे रहे हैं? इसके बाद भी तो बेटियां असुरिक्षत हैं, दिल दहलाने वाले हादसे हो रहे हैं। जिन घटनाओं के बारे में पढ़कर-तस्वीरें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, उनकी पीड़िताओं पर क्या बीतती होगी, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन हैरत है कि इन भयावह घटनाओं पर भी राजनीति के खेल चालू हैं।

सवाल उठाए जा रहे हैं कि कठुआ की पीड़िता के लिए बोलने वाले अब कहां हैं? क्या वाकई एक समाज के रूप में हमारा इतना पतन हो चुका है कि अब राजनीति हमारी भावनाओं के साथ खुला खेल खेलने लगी है और हमने अपना जमीर उसके हाथों गिरवी रख दिया है? क्या बलात्कार की घटना में हिंदू-मुस्लिम के भेदभाव की गुंजाइश होनी चाहिए? क्या वहां धर्म से ऊपर उठते हुए पीड़िता के साथ पूरे समाज को खड़ा नहीं होना चाहिए और क्या अपराधी को सख्त सजा नहीं मिलनी चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म का हो? भारत लड़कियों के लिए दुनिया का सबसे असुरक्षित देश है, इस रिपोर्ट पर भी आत्ममंथन की जगह राजनीति से प्रेरित सवाल उठाए जा रहे हैं। सवाल तो समाज को अब अपने आप से करना चाहिए कि कब तक हम एक बेटा तो होना ही चाहिए वाली मानसिकता में जिएंगे? मांएं सोचें कि वे अपने राजा बेटा को किस तरह की परवरिश दे रही हैं? कहीं उनकी आंखों का तारा, किसी के लिए दु:स्वप्न तो नहीं बन रहा? बलात्कार जैसे अपराध केवल कानून से नहीं समाज की मानसिकता बदलने से रोके जा सकते हैं। कृपया समाज खुद को बदलने के लिए मोमबत्ती का जुलूस निकाले। 
 

Source:Agency