By: Sabkikhabar
28-06-2018 08:10

भाजपा की यह जानी-पहचानी कार्यशैली है कि जब कोई गंभीर मुद्दा उसे परेशान करे तो जनता का ध्यान भटकाने के लिए फौरन नया शिगूफा छोड़ दो। इसका एक ताजा उदाहरण उत्तरप्रदेश से सामने आया है, जहां मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) और जामिया मिलिया इस्लामिया (जेएमआई) में दलितों को आरक्षण दिए जाने का सवाल उठाया है। भाजपा शासित प्रदेशों में दलित उत्पीड़न की घटनाएं काफी बढ़ी हैं, खासकर गुजरात, उत्तरप्रदेश में। दलितों के सम्मान और सुरक्षा के लिए तो सरकार कुछ नहीं कर पाई, अलबत्ता कुछ समय पहले उत्तरप्रदेश के भाजपा नेताओं, मंत्रियों की दलितों के घर खाना खाने की तस्वीरें खूब सामने प्रसारित हुईं। बाद में इन पर सवाल उठे और इस नाटक का पर्दा उठने लगा तो इस प्रदर्शन को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। दरअसल दलितों के मामले में भाजपा सरकार का रवैया हाथी के दांत की तरह है, खाने के और दिखाने के और।

एस सी एस टी एक्ट में बदलाव के बाद जब दलितों की नाराजगी बढ़ी, कई दलित सांसदों ने भी इसका विरोध किया तो अध्यादेश लाने की बात मोदी सरकार ने कही थी, लेकिन अब तक उस मामले में कुछ नहीं हुआ। 2015 के बिहार चुनाव से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा का मुद्दा उठाया था, जिसका खामियाजा भाजपा को बिहार में भुगतना पड़ा तो अब भाजपा ने आरक्षण के मुद्दे पर संघ की सोच से दिखावटी दूरी बना ली है। फिर भी उसकी सोच का असर उत्तरप्रदेश के उपचुनावों पर पड़ा, जहां सपा-बसपा ने मिलकर उसे हरा दिया। इसलिए अब योगीजी को राम के साथ शबरी की याद भी आ रही है।

उन्होंने न केवल इन दो मुस्लिम शैक्षणिक संस्थाओं में दलित आरक्षण का मुद्दा उठाया, बल्कि कांग्रेस पर ही सवाल दाग दिया कि एक प्रश्न यह भी उनसे पूछा जाना चाहिए कि जो कह रहे हैं कि दलितों का अपमान हो रहा है कि आखिर दलित भाइयों को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया इस्लामिया में भी आरक्षण देने का लाभ मिलना चाहिए. वे इस बात को उठाने का कार्य कब करेंगे? कहां तो भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत की बात करती है और मानती है कि भविष्य में कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं रहेगा और कहां योगीजी कांग्रेस से सवाल उठाने की अपेक्षा रख रहे हैं।

विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस केवल सवाल ही कर सकती है, कार्य को करने का दायित्व तो भाजपा सरकार पर ही है। रहा सवाल अल्पसंख्यक संस्थानों मेंं दलितों के आरक्षण का, तो इसके लिए आदित्यनाथ योगी को संविधान के पन्ने पलटने चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और चलाने की अनुमति देता है। चूंकि अल्पसंख्यक राज्यों के मुताबिक परिभाषित होते हैं, इसलिए उत्तरप्रदेश के हिंदीभाषी अगर तमिलनाडु में हिंदी माध्यम का शैक्षणिक संस्थान खोलें तो उसे अल्पसंख्यक संस्थान का ही दर्जा मिलेगा।

अल्पसंख्यक संस्थानों में अगर दलित आरक्षण भी होगा तो इसका असर सामान्य श्रेणी की सीटों पर ही पड़ेगा, जिसके लाभार्थी सवर्ण तबके के लोग होते हैं, जाहिर है योगीजी ऐसा कतई नहीं चाहेंगे कि सवर्णों को कोई तकलीफ हो। वैसे भी दलित आरक्षण की बात उठाने के पीछे उनका मकसद केवल धु्रवीकरण करना है। संविधान का अनुच्छेद 15 (5), अनुच्छेद 30 के तहत स्थापित अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को आरक्षण के दायरे से बाहर करता है। 2005 में 93वें संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया गया था। तब 381 सांसदों में से 379 ने इस संशोधन का समर्थन किया था। 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान अल्पसंख्यकों की जरूरतों को ही पूरा करते हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर रखने से समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है।

वैसे योगीजी की जानकारी के लिए जेएमआई में 50 प्रतिशत सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित हैं बाकी 50 प्रतिशत सीटें सामान्य आवेदकों के लिए हंै, जिनमें पांच प्रतिशत सीट दिव्यांगों के लिए आरक्षित हैं। इसी तरह एएमयू में आंतरिक और बाहरी, दो तरह का आरक्षण है। आंतरिक में वे विद्यार्थी आते हैं जो पहले एएमयू से पढ़े हों और जबकि पहली बार एएमयू में दाखिला लेने वाले बाहरी कहलाते हैं, और दोनों के लिए 50 प्रतिशत- 50 प्रतिशत निर्धारित है। यहां हिंदू-मुस्लिम, एससी-एसटी आदि के लिए यानी धर्म या जाति के आधार पर कोई आरक्षण नहीं है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के तहत आने वाले श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज में सिख अल्पसंख्यकों के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं, बाकी 50 प्रतिशत सीट को सामान्य श्रेणी के लिए रखा गया है। इसी तरह डीयू के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में 50 प्रतिशत सीट ईसाई अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं और 50 प्रतिशत सामान्य के लिए हैं। भाषा और धर्म के आधार पर बने देश के कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में 50 प्रतिशत आरक्षण है लेकिन बाकी के 50 प्रतिशत सीट में दलितों और पिछड़ों के लिए कोई आरक्षण नहीं है। तो केवल जेएमआई और एएमयू ही योगीजी के ध्यान में क्यों आए, समझना कठिन नहीं है।

वैसे सनद इस बात की भी रहे कि सरकारी विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी के 7.5 प्रतिशत आरक्षण की सरकार की नीति है। लेकिन 2016 के आंकड़े बताते हैं कि 14 लाख शिक्षकों में केवल 1 लाख 2 हजार ही दलित थे। अगर योगीजी सचमुच दलित आरक्षण के हिमायती हैं तो पहले अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाले सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में दलितों के लिए आरक्षित रिक्त पदों को भरने की पहल करें। जिम्मेदारी कभी खुद को भी निभानी पड़ती है, हमेशा दूसरों को दोष देने से बात नहीं बनती।
 

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