By: Sabkikhabar
26-06-2018 08:03

किसी शख्स को भीड़ घेरे हुई है, उसे पत्थर मार रही है या लाठी-डंडों, जूतों से पिटाई कर रही है, यह दृश्य मध्ययुग में होता, तब आश्चर्य नहीं होता। फिल्म लैला-मजनूं याद कीजिए, जिसमें भीड़ मजनूं पर पत्थर बरसा रही है और लैला लोगों से उस पर रहम की अपील कर रही है। मध्यकाल से इस आधुनिक काल तक आते-आते हमने सभ्य होने का एक लंबा सफर तय किया है। लेकिन आज भी अगर भीड़ पत्थर बरसा कर किसी की जान लेने पर आमादा हो जाए और ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ती जाए, तो हमें अपने आप से ये सवाल पूछना होगा कि क्या हम वाकई सभ्य कहलाने लायक हुए हैं? क्या हमारे देश में लोकतंत्र बचा है? अभी कुछ दिनों पहले हापुड़ में गाय को मारने के इल्जाम में भीड़ ने दो लोगों को इतना पीटा कि उनमें से एक की मौत हो गई।

इसी तरह झारखंड के गोड्डा में भैंस चोरी के इल्जाम में दो लोगों की हत्या भीड़ ने कर दी। इसी राज्य में खजुमंडा गांव में मोबाइल चोरी के आरोप में एक युवक को भीड़ ने पीटा और जूते की माला पहनाकर घुमाया। किसी कमजोर पर अत्याचार हो रहा हो, किसी महिला से छेड़छाड़ हो रही हो, उसके विरोध में मदद करने के लिए भीड़ कभी नहीं जुटती, लेकिन किसी को मारना हो, अपनी ताकत का प्रदर्शन करना हो तो न जाने कैसे भीड़ इक_ा हो जाती है। इसमें सोशल मीडिया और अफवाहों की भी बड़ी भूमिका होती है। अभी कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के सरगुजा में अफवाह फैली कि कुछ लोग बच्चे चोरी करके, उनकी किडनी बेच देते हैं। इस अफवाह का शिकार एक युवक हो गया, जिसे भीड़ ने बच्चा चोर समझ कर खूब पीटा। इसी तरह जून के पहले सप्ताह में बच्चा चोरी के शक में ही असम के कार्बी आंगलांग में दो युवकों की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। दरअसल यहां पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर अफवाह चल रही थी कि सोपा धोरा यानी बच्चों को उठाने वाला गिरोह सक्रिय है। 

अभिजीत और नीलोत्पल नामक ये युवक गुवाहाटी से कार्बी आंगलांग आए हुए थे, वे यहां कंगथिलांगसु नाम की जगह में झरने से सुंदर मछलियों को पकड़ने आए हुए थे। इन दोनों के साथ कोई लोकल गाइड नहीं था और एक जगह इन्होंने ग्रामीणों से रास्ता पूछा था। जिससे ग्रामीणों को इनके बाहरी होने का शक हुआ। अफवाह में काली कार का जिक्र था, तो काले रंग की स्कार्पियो में सवार इन दोनों युवकों पर ग्रामीणों का शक और गहराया, जिसके बाद भीड़ इक_ा की गई और इनकी कार को रोककर उन्हें उतार कर पीटा गया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर चला, जिसमें दोनों युवक खुद को असमिया बताते हुए जान की भीख मांग रहे हैं, लेकिन भीड़ उन्हें मारना नहीं छोड़ रही।

इस हृदयविदारक घटना के बाद मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है। जून में ही पीएमओ ने गृहमंत्रालय को निर्देश दिए थे कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर अफवाह और आतंक फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाए जाएं। पीएमओ को यह हस्तक्षेप बच्चा चोरी की अफवाह, सांप्रदायिक तनाव और युवकों को बरगला कर आतंकवाद की ओर धकेलने की बढ़ती घटनाओं के बाद करना पड़ा था। पिछले महीने ही तमिनलाडु, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में बच्चा चोर गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह सोशल मीडिया पर फैली थी।

जिसके बाद कम से कम छह लोगों की अलग-अलग जगहों पर भीड़ ने हत्या कर दी। ऐसी अफवाहों का आसान शिकार अल्पसंख्यक और सामाजिक, आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही ज्यादा बनते हैं। अफवाहों का बाजार भारत में हमेशा ही गर्म रहता है। याद करें पिछले साल कैसे चोटी काटने की अफवाह चल पड़ी थी और उसके कारण कई लोगों को बेमौत मरना पड़ा था। गणेशजी के दूध पीने से लेकर बच्चा चोर गिरोह का झूठ फैलाने तक यह बात साबित हो चुकी है कि हिंदुस्तान जैसे सघन आबादी वाले देश में अफवाहें बड़ी आसानी से फैलाई जा सकती हैं, बस उसके लिए तगड़ा गिरोह और संचार के आधुनिक उपकरण होने चाहिए। पढ़ाई, खेलकूद, मनोरंजन, रोजगार इन सबसे वंचित एक बड़ी आबादी अपना काफी वक्त सोशल मीडिया पर बिता रही है और ऐसे में किसी भी बात को प्रचारित-प्रसारित करना बहुत आसान हो गया है। फिर चाहे वह बात कितनी भी झूठी और खतरनाक क्यों न हो।

मोदी सरकार डिजीटल इंडिया की बात करती है। लेकिन इसमें सुरक्षा का पहलू बिल्कुल ही नजरंदाज हो रहा है। सरकार कह रही है कि कानून कड़े करेगी, लेकिन यह कब और कैसे होगा, इसकी कोई रूपरेखा नजर नहीं आ रही। साइबर क्राइम रोकने का ककहरा जब तक हमारी पुलिस को सिखाया जाएगा, तब तक साइबर जगत के अपराधी कुछ और खतरनाक हो चुके होंगे। साइबर अपराधों पर पुलिस और रोक कैसे लगाएंगे, जब वे अफवाहों को ही नहीं रोक पा रहे हैं।
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