By: Sabkikhabar
20-06-2018 08:38

नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की चौथी बैठक रविवार को संपन्न हुई। प्रधानमंत्री के साथ 24 मुख्यमंत्री जिस बैठक में शामिल हों, उसमें देश के कई जरूरी मुद्दों पर नीतियां, योजनाएं बनाई जा सकती थीं या कम से कम उनकी रूपरेखा तैयार हो सकती थी। लेकिन अफसोस कि इस मंच से भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की ही बात की, दूसरों की बातों, मशविरों, मांगों पर गौर नहीं फरमाया। 2022 का न्यू इंडिया, लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना और किसानों की आय दोगुना करने जैसी घिसी-पिटी बातें ही इसमें हुईं, जिनका कोई तात्कालिक नतीजा नहीं निकलना है।

क्या मोदीजी के लिए रेडियो, लालकिला, चुनावी रैली और नीति आयोग इन सब में कोई फर्क ही नहीं है कि वे हर मंच से एक जैसी बातें करते हैं। उनकी बातें सुनकर मुंगेरीलाल के हसीन सपने याद आने लगते हैं, जो हकीकत से परे सपनों की दुनिया में ही खोया रहता था। अभी मोदीजी का कार्यकाल मात्र एक साल का ही बचा है, उसके बाद चुनाव होंगे और तब तय होगा कि देश में सरकार किसकी बनेगी, लेकिन मोदीजी 2014 में भी 2022 की बात करते थे और 2018 में भी 2022 की ही बात कर रहे हैं। 4 साल बाद देश किस मुकाम पर होगा, उसकी राह तो अभी बनानी पड़ेगी न।

नीति आयोग का गठन भी तो मोदी सरकार ने इसीलिए किया था। नीति का फुलफार्म है- नेशनल इंस्टीट्यूशन आफ ट्रांसफार्मिंग इंडिया। यह योजना आयोग की जगह बना था, तो नीति के साथ आयोग भी जुड़ गया। पं. नेहरू ने योजना आयोग का गठन किया था, ताकि पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा देश का सुगठित आर्थिक, औद्योगिक, संस्थागत विकास हो सके और इसमें ग्रामों से लेकर राज्यों तक की भागीदारी हो।

दरअसल 1937 के कांग्रेस राष्ट्रीय अधिवेशन में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने राष्ट्रीय योजना समिति के गठन का प्रस्ताव रखा था। उनका मानना था कि अब तक सरकारें लोगों से केवल राजस्व वसूलती हैं, उनके सर्वांगीण विकास की फिक्र नहीं करतीं। इसलिए स्वतंत्र भारत में विकास का ऐसा ढांचा बनना चाहिए जो प्रत्येक नागरिक के जीवन स्तर को ऊपर उठा सके। ऐसा तभी हो सकता है जब योजनाबद्ध तरीके से सुगठित, समयबद्ध विकास की रूपरेखा बने। आजाद भारत में योजना आयोग ने इसी विचार पर काम किया। पंचवर्षीय योजनाएं कितनी कारगर रहीं, कितनी नाकाम रहीं, इनका विश्लेषण हो सकता है, पर इनसे कम से कम जनता को यह तो पता होता था कि पांच सालों में विकास का वास्तविक लक्ष्य क्या है?

आजादी के वक्त भारत कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान-तकनीकी हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ था। लेकिन फिर लक्ष्यों को निर्धारित किया गया, केन्द्र और राज्यों ने मिलकर उन पर काम करना शुरु किया और नतीजा यह निकला कि औद्योगिक विकास का आधारभूत ढांचा तैयार हुआ, सार्वजनिक उपक्रम के अंतर्गत कारखाने लगे, उच्च शिक्षण संस्थानों की स्थापना हुई, शोध कार्यों को बढ़ावा मिला, बड़े सरकारी अस्पताल खुले और शिक्षा, रोजगार सबकी सुविधा बढ़ी। न जाने मोदी सरकार को योजना आयोग में ऐसी क्या खामी नजर आई जिसे दूर करना उनके लिए संभव नहीं हुआ और उसकी जगह नीति आयोग बन गया। जिसमें 15 साल का रोडमैप, सात साल का विजन डाक्यूमेंट और 3 साल का एक्शन प्लान तैयार करने की बात कही गई। अब नयी संस्था गठित की, तो उसके जरिए काम भी करके दिखाना चाहिए। लेकिन अब भी सरकार चार साल बाद के सपने ही दिखा रही है। गिरती जीडीपी, बढ़ती महंगाई, व्यापार घाटा, कृषि घाटा, मानव विकास सूचकांक में भारत का पिछड़ना इन सबमेें सुधार के लिए उसके पास क्या योजनाएं हैं, उनका खुलासा देश के सामने नहीं कर रही है।  

नीति आयोग की बैठक में मोदीजी ने एक साथ चुनाव कराने की बात क्यों उठाई, यह समझ से परे है, क्योंकि यह राजनीतिक मसला है, जिसमें सबकी सहमति चाहिए। आंध्रप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों ने विशेष दर्जे की जो मांग उठाई, उस पर कुछ बात आगे नहीं बढ़ी। ममता बनर्जी आदि ने दिल्ली में चल रहे संवैधानिक गतिरोध की बात की, वह भी टाल दी गई। कुल मिलाकर नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल की बैठक का कोई बड़ा या सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। बैठक की औपचारिकता थी, जो निभा ली गई। बाकी मोदीजी सपनों के सौदागर बने हुए हैं, चाहते हैं कि जनता मुंगेरीलाल बन जाए।
 

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