By: Sabkikhabar
18-06-2018 08:35

बेशक, इन चार सालों में नवउदारवादी नीतियों के बुलडोजर तले राज्यों के अधिकारों को और खोखला किए जाने के सिलसिले को नयी ऊंचाई पर पहुंचा दिया गया है। इसका सबसे बड़ा सबूत है, राज्यों के कराधान के अधिकार को ही खत्म करने वाली जीएसटी व्यवस्था का लागू किया जाना है। इसके ऊपर से, मौजूदा सरकार ने इन चार सालों में न सिर्फ राज्यपाल के पदों पर निरपवाद रूप से घोषित भाजपाइयों-संघ परिवारियों को बैठाया गया है, जिसने राज्यपाल के पदों पर राजनीतिक उद्देश्य से नियुक्तियों के पिछले सभी रिकार्डों को तोड़ दिया है, बल्कि 'अपने' राज्यपालों का इस्तेमाल कर दल-बदल के जरिए न सिर्फ अनैतिक बल्कि अवैध तरीके से मेघालय तथा उत्तराखंड में 'अपनी' सरकारें भी थोपी हैं, जिनके खिलाफ बाद में उच्च न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा है। इसके अलावा 'अपने' राज्यपालों की मदद से बहुमत न होते हुए भी गोवा, मणिपुर आदि में और एकदम हाल में कर्नाटक में 'अपनी' सरकारें बैठायी गयी हैं, वह अलग। 

बेशक, इसका अंदाजा तो आसानी से लगाया जा सकता था कि नीति आयोग की संचालन समिति की बैठक इस बार हंगामी होगी। फिर भी, कम से कम यह किसी ने नहीं सोचा था कि आयोग की संचालन समिति की इस चौथी बैठक पर, जिसमें एक ओर केन्द्र के तथा दूसरी ओर सभी राज्यों के शीर्ष प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं, केन्द्र-राज्य संबंधों का मुद्दा छा जाएगा। लेकिन, ठीक ऐसा ही हुआ है। और यह हुआ है दिल्ली में चल रहे राजनीतिक संकट के कारण और उससे भी बढ़कर, इस संकट के संदर्भ में दिल्ली की निर्वाचित सरकार के पक्ष खड़े होने के आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक तथा प. बंगाल के मुख्यमंत्रियों के फैसले से। इसने सत्तर तथा अस्सी के दशकों के उस दौर की याद ताजा कर दी है, जब ज्योति बसु की अगुआई में विपक्षी मुख्यमंत्रियों के कई सम्मेलन हुए थे और केन्द्र के बरक्स, राज्यों के  अधिकारों की रक्षा का मुद्दा, जनतंत्र की रक्षा के संघर्ष के एक प्रमुख मुद्दे के तौर पर सामने आया था। इस प्रक्रिया से उठी बहस के फलस्वरूप राज्यपाल के पद का दुरुपयोग कर, निर्वाचित सरकारों के खिलाफ केन्द्र के हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति पर, एक हद तक अंकुश भी लगा था।

योजना आयोग को भंग कर, मोदी सरकार द्वारा गठित किए गए नीति आयोग की संचालन समिति की चार साल में इस चौथी बैठक से, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंंत्री ने की है, जैसा कि बैठक की पूर्व-संध्या में जारी बयान बता रहे थे, केंद्र सरकार 2022 तक 'नया इंडिया' बनाने पर विचार के नाम पर, सपने बेचना जारी रखने की ही उम्मीद कर रही थी। लेकिन, इन चार सालों में अपने वादे पूरे करने में मौजूदा शासन की विफलताओं की पृष्ठïभूमि में, सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच बढ़ती दूरी और 2019 के पूर्वार्द्घ में प्रस्तावित आम चुनाव को नजदीक आता देखकर विपक्ष की बढ़ती एकजुटता को देखते हुए, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि इस बैठक में सरकार को तीखे सवालों का सामना करना पड़ सकता है। आखिर, मौजूदा हालात में विपक्ष-शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपने-अपने तरीके से ठोस सचाइयों से जुड़े मुश्किल सवाल उठाने में क्यों संकोच करते? फिर भी दिल्ली सरकार पर जिस तरह का राजनीतिक टकराव थोपा गया है, उसने केंद्र-राज्य संबंधों तथा विशेष रूप से निर्वाचित सरकार के अधिकारों के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है। इसने विपक्ष को मौजूदा सरकार के खिलाफ कुछ और गोला-बारूद तथा विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए सीमेंट दे दिया है। 

बेशक, इन चार सालों में नवउदारवादी नीतियों के बुलडोजर तले राज्यों के अधिकारों को और खोखला किए जाने के सिलसिले को नयी ऊंचाई पर पहुंचा दिया गया है। इसका सबसे बड़ा सबूत है, राज्यों के कराधान के अधिकार को ही खत्म करने वाली जीएसटी व्यवस्था का लागू किया जाना है। इसके ऊपर से, मौजूदा सरकार ने इन चार सालों में न सिर्फ राज्यपाल के पदों पर निरपवाद रूप से घोषित भाजपाइयों-संघ परिवारियों को बैठाया गया है, जिसने राज्यपाल के पदों पर राजनीतिक उद्देश्य से नियुक्तियों के पिछले सभी रिकार्डों को तोड़ दिया है, बल्कि 'अपने' राज्यपालों का इस्तेमाल कर दल-बदल के जरिए न सिर्फ अनैतिक बल्कि अवैध तरीके से मेघालय तथा उत्तराखंड में 'अपनी' सरकारें भी थोपी हैं, जिनके खिलाफ बाद में उच्च न्यायालयों को हस्तक्षेप करना पड़ा है। इसके अलावा 'अपने' राज्यपालों की मदद से बहुमत न होते हुए भी गोवा, मणिपुर आदि में और एकदम हाल में कर्नाटक में 'अपनी' सरकारें बैठायी गयी हैं, वह अलग। लेकिन, इस सब पर उठे सारे विरोध के बावजूद, मौजूदा सरकार के चार साल के शासन में यह पहली बार है, जब इतने धारदार तरीके से केंद्र सरकार द्वारा एक राज्य  के अधिकारों के अतिक्रमण का मुद्दा उठा है और पांच मुख्यमंत्रियों ने इसे 'जनतंत्र पर हमला' करार दिया है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, अपने सहयोगी दो अन्य मंत्रियों के साथ एक हफ्ते से लगातार दिल्ली के लैफ्टीनेंट गवर्नर के कार्यालय में धरने पर बैठे होने चलते, नीति आयोग की इस बैठक में भाग नहीं ले पाए। इसकी विडंबना खुद ब खुद जाहिर है कि दिल्ली के निर्वाचित मुख्यमंत्री को, केंद्र द्वारा नियुक्त किए गए लैफ्टीनेंट गवर्नर से मुलाकात का समय लेने के लिए, उसके कार्यालय में हफ्ते भर धरना देना पड़ा है। और यह भी कम विडंबनापूर्ण नहीं है कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार की लैफ्टीनेंट गवर्नर से मुख्य मांग यही है कि वह दिल्ली में कार्यरत वरिष्ठï नौकरशाहों की चार महीने से जारी हड़ताल या निर्वाचित सरकार के बायकॉट को खत्म कराए। याद रहे कि इसी साल फरवरी के महीने में मुख्यमंत्री निवास पर हुई एक वरिष्ठï अधिकारी के साथ कथित बदसलूकी की घटना के बाद से, जिसका मामला अदालत में विचाराधीन है, अधिकारीगण ने मंत्रियों की बुलायी बैठकों में आने से लेकर, मंत्रियों के साथ फील्ड में जाने तथा मंत्रियों के फोन उठाने तक, सब से पूर्ण असहयोग कर रखा है। इन अधिकारियों की नियुक्ति, तैनाती, तबादले, पदोन्नति के अधिकार, केंद्र के प्रतिनिधि के नाते चूंकि लैफ्टीेनेंट गवर्नर के पास ही हैं, इस बहिष्कार को खत्म कराने में उसकी भूमिका केंद्रीय हो जाती है। 

अगर दिल्ली की निर्वाचित सरकार का वरिष्ठ नौकरशाहों द्वारा यह बहिष्कार, जो अपने आप में भारतीय नौकरशाही के इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना है, पूरे चार महीने से जारी है और लैफ्टीनेंट गवर्नर इसके लिए अधिकारसंपन्न होने के बावजूद इस संकट को खत्म कराने के लिए हस्तक्षेप नहीं कर रहा है, तो यह केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष इशारे के बिना संभव नहीं है। खबरों का तो कहना यह भी है कि नीति आयोग की संचालन समिति की बैठक की पूर्व-संध्या में चंद्रबाबू नायडू, कुमारस्वामी, ममता बैनर्जी तथा पिनरायी विजयन ने, लैफ्टीनेंट गर्वनर के  दफ्तर में धरने पर बैठे दिल्ली के मुख्यमंत्री से मिलने के लिए जब लिखित रूप से इजाजत मांगी, केंद्र के इशारे पर ही लैफ्टीनेंट गवर्नर ने इन चार मुख्यमंत्रियों के अनुरोध को ठुकराया था। खैर, इतना तो तय है कि दिल्ली के नौकरशाह यह अभूतपूर्व आंदोलन इसी से आश्वस्त होकर चलाए जा रहे हैं कि अपनी सेवा शर्तों का इस तरह खुल्लमखुल्ला उल्लंघन करने की उन्हें कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी, उल्टे इसके लिए नियोक्ता के नाते केंद्र सरकार उन्हें पुरस्कृत भी कर सकती है।

यह संयोग ही नहीं है कि लैफ्टीनेंट गवर्नर की संस्था, शुरू से ही मौजूदा दिल्ली सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करने में लगी रही है। बेशक, पंद्रह साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रही गलत नहीं कहती हैं कि केंद्र और राज्य में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होने के बावजूद, हमेशा दिल्ली की निर्वाचित सरकार और लैफ्टीनेंट गवर्नर के बीच इस तरह छत्तीस का आंकड़ा नहीं रहा। लेकिन, यह उस समय के लैफ्टीनेंट गवर्नरों की नियोक्ता सरकारों की नीयत के बारे में ही बताता है। फिलहाल तो स्थिति यह है कि नरेंद्र मोदी के राज में इस पद पर बैठाए गए व्यक्ति तो बदले हैं, पर इस पद की भूमिका नहीं बदली है। किसी न किसी रूप में लैफ्टीनेंट गवर्नर, निर्वाचित आप सरकार के प्रति केंद्र सरकार की शत्रुता का ही हथियार बना रहा है।

जाहिर है कि दिल्ली के मामले में, जो कि एक केंद्र शासित प्रदेश है, इस तरह की समस्या, निर्वाचित सरकार और लैफ्टीनेंट गवर्नर के अधिकारों तथा उनकी सीमाओं के संबंध में बनी हुई अस्पष्टïता के चलते और बढ़ जाती है। यह कोई संयोग ही नहीं है कि मोदी सरकार द्वारा नियुक्त किए गए लैफ्टीनेंट गवर्नर, निर्वाचित सरकार को अपने आधीन मानकर चलते रहे हैं। दिल्ली की ही तरह, पुदुच्चेरी का भी ऐसा ही किस्सा है, जहां दिल्ली के चुनाव के भाजपा के पराजित मुख्यतंत्री चेहरे, किरण बेदी ने निर्वाचित कांग्रेसी सरकार के खिलाफ लगातार युद्घ छेड़ा हुआ है। यह वाकई कांग्रेस की अदूरदर्शिता तथा सिद्घांतहीनता है कि वह दिल्ली के मामले में लैफ्टीनेंट गवर्नर के आचरण की अलोकतांत्रिकता देखने के लिए ही तैयार नहीं है। 

बेशक, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। वास्तव में वह अन्य केंद्र शासित राज्यों से भी अलग है क्योंकि दिल्ली देश की राजधानी भी है, जहां विदेशी दूतावासों समेत अनेक केंद्रीय प्रतिष्ठïान हैं। लेकिन, इन तमाम सचाइयों से जुड़ी जटिलताओं के बावजूद, एक जनतांत्रिक व्यवस्था में कम से कम इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है कि केंद्र द्वारा नियुक्त किया गया लैफ्टीनेंट गवर्नर या गवर्नर, जनता द्वारा निर्वाचित सरकार से ऊपर नहीं हो सकता है। कम से कम देश के पांच मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री के सामने जनतंत्र का यह बुनियादी सवाल उठा दिया है। आने वाले दिनों में यह आवाज और तेज हो सकती है। नरेंद्र मोदी की सरकार क्या जनतंत्र की एक और कसौटी पर फेल होना झेल सकती है?

Related News
64x64

 गंगा जी में जहां जो काम करने की जरूरत है, वहां वो काम नहीं होता है। आज गंगा जी का सारा पैसा स्मार्ट सिटी के तहत एसटीपी बनाने और घाटों…

64x64

नवाज शरीफ अपने विपरीत आए फैसले से भागना नहीं चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि वह पाकिस्तान वापस जाएंगे और जेल की सजा का सामना करेंगे। लोकप्रिय बने रहने के…

64x64

पार्टी सर्वे में मप्र के आधे से ज्यादा भाजपा सांसद की परफार्मेँस खराब

 

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनाव की तैयारियों की साथ-साथ लोकसभा चुनाव की जमावट शुरू कर…

64x64

जहां तक धर्म और मान्यताओं का सम्बन्ध है, इसका अवतरण विभिन्न युगों और कालों में होता रहा है। उसमें होने वाले परिवर्तन भी समाज की आवश्यकताओं पर निर्भर रहे हैं।…

64x64

घुप्प अंधेरे में, चारों ओर पानी से घिरी गुफा में, बिना सुविधाओं के 17 दिनों तक रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है, लेकिन थाइलैंड के खिलाड़ी बच्चों और उनके…

64x64

देश में कमजोर, अल्पसंख्यकों, दलितों का एक बड़ा तबका लगातार खौफ के साए में जी रहा है। उनके खान-पान, पहनावे, शिक्षा, परंपराओं हर किसी पर टेढ़ी नजर रखी जा रही…

64x64

दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल मामले में लोकतंत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार…

64x64

लोकतंत्र में राजतंत्र की घुसपैठ किस तरह से करवाई जा सकती है, इसकी मिसाल जनता दरबार जैसे आयोजनों में देखी जा सकती है। दरबार शब्द किसी नजरिए से लोकतांत्रिक शब्द…